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हर बार क्यों बेदखल रहा महिला आरक्षण विधेयक

लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से आई मोदी सरकार मई में दो साल पूरे कर लेगी, लेकिन महिला आरक्षण विधेयक पर कोई विमर्श या कोशिश नहीं दिख रही। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा लगाने वाली सरकार की नीयत बेटियों को संसद तक पहुंचाने में वाकई में कितनी ईमानदार है, इस मुद्दे पर माकपा नेता वृंदा करात कहती हैं, ‘यह तो बिल्कुल उनके एजंडे से बाहर है, पिछली सरकार के दौरान राज्यसभा में विधेयक पारित होने पर भाजपा के लोगों ने ही कहा था कि हमारी सरकार होती तो दोनों सदनों में पारित करा लेते। दो साल भाजपा के हो गए।

Author नई दिल्ली | March 8, 2016 4:47 AM
सुषमा स्वराज के साथ मकपा नेता वृंदा करात

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस, महिलाओं के सशक्तीकरण का उत्सव है, लेकिन हमारे देश में महिलाएं क्या वाकई में सशक्त हो पाई हैं, उन्हें घर से लेकर देश के मुद्दों में फैसले का अधिकार मिल पाया है? अगर ऐसा होता तो महिला आरक्षण विधेयक इस साल अपने अस्तित्व की लड़ाई का बीसवां साल नहीं पूरा कर रहा होता। पहली बार 12 सितंबर, 1996 को लोकसभा के पटल पर रखा गया महिला आरक्षण विधेयक अभी तक विधान का रूप नहीं ले पाया है, हालांकि राज्यसभा से विधेयक को 2010 में हरी झंडी मिल चुकी थी लेकिन पंद्रहवें लोकसभा के भंग होने के साथ ही महिला आरक्षण विधेयक पूरी तरह से दम तोड़ चुका है।

विशेषज्ञों के मुताबिक अब सरकार को नए सिरे से यह विधेयक लाना पड़ेगा और दोनों ही सदनों में इसे दोबारा पास कराना होगा। लेकिन महिला संगठनों और महिला राजनेताओं का आरोप है कि महिलाओं के सशक्तीकरण का यह मुद्दा मोदी सरकार के एएंडे में शामिल ही नहीं है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से आई मोदी सरकार मई में दो साल पूरे कर लेगी, लेकिन महिला आरक्षण विधेयक पर कोई विमर्श या कोशिश नहीं दिख रही। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा लगाने वाली सरकार की नीयत बेटियों को संसद तक पहुंचाने में वाकई में कितनी ईमानदार है, इस मुद्दे पर माकपा नेता वृंदा करात कहती हैं, ‘यह तो बिल्कुल उनके एजंडे से बाहर है, पिछली सरकार के दौरान राज्यसभा में विधेयक पारित होने पर भाजपा के लोगों ने ही कहा था कि हमारी सरकार होती तो दोनों सदनों में पास करा लेते। दो साल भाजपा के हो गए।

यूपीए का बहाना था कि संसद बाधित होगा, इन्हें तो दो तिहाई बहुमत लोकसभा में है, जो कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी है, लेकिन इनकी मंशा ही नहीं है। यह सरकार जनवादी अधिकारों के खिलाफ है, हरियाणा सरकार के पंचायत चुनाव संबंधी संशोधन से यह स्पष्ट है कि इन्होंने गरीबों और महिलाओं के खिलाफ जंग छेड़ दी है।’

ज्वाइंट वूमन प्रोग्राम की डा ज्योत्स्ना चटर्जी ने कहा, ‘हम महिला संगठनों ने सरकार के समक्ष इस संबंध में अपनी बातें रखी हैं, लेकिन सरकार कोई चर्चा करना नहीं चाह रही है। लोकसभा स्पीकर, कानून मंत्री, गृह मंत्री, से मुलाकात की है, लेकिन उनका जवाब है कि कई समस्याएं हैं। इसलिए इसे अभी प्राथमिकता नहीं दे पा रहे।’

सरकार की खामोशी के साथ ही महिला संगठनों के बीच भी यह मुद्दा दम तोड़ता नजर आ रहा है। हालांकि, आॅल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमन की जगमति सांगवान ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि लड़ाई हार गए, लेकिन हां फिर से शुरुआत की कोशिश की जा रही है, सरकार को विधेयक की प्रक्रिया भी एक बार फिर से शुरू करनी होगी, संसद के दोनों सदनों से पास करवाना होगा। सरकार के घोषणापत्र में यह मुद्दा तो है, लेकिन हमारे आग्रह के बावजूद इसे वे संसद के एजंडा सूची में नहीं ला पाए हैं।

नई सरकार को एक-दो साल तो देना पड़ता है, लेकिन हम फिर से गोलबंद हो रहे हैं और लड़ाई को और व्यापक करने और राज्य स्तर और स्थानीय स्तर तक ले जाने की कोशिश में हैं।’ सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी ने कहा कि हमने सभी सांसदों को महिला आरक्षण पर पत्र लिखा है और उनका आश्वासन है कि मानसून सत्र में इसे एजंडे में रखा जाएगा। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष शोभा ओझा ने कहा कि सरकार की मंशा ही नहीं है कि महिला आरक्षण कानून बने, हमने राज्यसभा में पास करवा लिया था, तभी भाजपा अगर साथ देती तो लोकसभा में भी पास हो जाता।
मसला देश की आधी आबादी को देश के मुद्दों में निर्णय लेने और विधान तैयार करने का अधिकार सौंपने का है। मुद्दे पर तमाम महिला संगठनों और राजनीतिक दलों की महिलाओं ने कई बार एका दिखाई, लेकिन पुरुष वर्चस्व के सामने टिक नहीं पार्इं और महिला अधिकारों का यह विधेयक बार-बार दम तोड़ता रहा।

इस विधेयक के पिछले 19 सालों की यात्रा पर नजर डालें तो जब-जब विधेयक को सदन के पटल पर रखा गया तब-तब कुछ पुरुष सांसदों ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया, पेपर छीनाझपटी से लेकर लैंगिग रूप से असंवेदनशील टिपण्णियां तक देखने को मिलीं। पहली बार 12 सितंबर 1996 को देवगौड़ा सरकार में विधेयक को लोकसभा के पटल पर रखा गया, प्रेसाइडिंग आॅफिसर के हाथ से पेपर छिने गए। फिर 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान लोकसभा में पेश करने की कोशिश हुई तब आरजेडी सांसद ने स्पीकर जीएमसी बालयोगी से पेपर छीना। 1999, 2002 और 2003 में एनडीए सरकार ने फिर लोकसभा में विधेयक को उन्हीं विरोधों के बीच पेश किया, लेकिन विधेयक पास नहीं करवाया जा सका। उसके बाद यूपीए सरकार के दौरान 2008 में विधेयक को राज्यसभा में तमाम हंगामे के बीच पेश किया।

अंतत: 2010 में विधेयक राज्यसभा से पास हो पाया। डा ज्योत्स्ना चटर्जी ने कहा, ‘सबकी कोशिश यह है कि महिलाएं फैसले लेने की प्रक्रिया में आए ही नहीं।’ पूरे मसले पर जनता दल (यूनाइटेड) के राष्टÑीय अध्यक्ष शरद यादव की विवादास्पद टिपण्णी डा चटर्जी की आशंका सही ठहराती है। शरद यादव ने महिला आरक्षण बिल पर संसद में कहा था, ‘इस विधेयक के जरिए क्या आप परकटी औरतों को सदन में लाना चाहते हैं।’ गौरतलब है कि शरद यादव 2012 में ‘उत्कृष्ट सांसद’ का पुरस्कार जीत चुके हैं। राजनीतिक रूप से तीन प्रतिद्वंद्वी नेताओं सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज और बृंदा करात की एका, इन टिपण्णियों के सामने कारगर नहीं हो पाई, विधेयक राज्यसभा तक ही सिमट कर रह गया।

महिला आरक्षण विधेयक, संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसद सीटों पर आरक्षण की वकालत करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे कानून का स्वरूप देने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत है और दो तिहाई राज्यों के विधानसभाओं से मंजूरी और अंत में राष्टÑपति की मंजूरी अपेक्षित है। पंचायतों में महिलाओं को बराबरी के प्रतिनिधित्व का अधिकार तो मिल रहा है, लेकिन पुरुष प्रधान समाज नहीं चाहता कि महिलाएं कानून बनाएं, निर्णय लें।

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