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उत्तराखंड: जंगलों में भी महफूज नहीं बाघ और गुलदार

उत्तराखंड के जंगलों में बाघों की गिनती के लिए बाघ आंकलन 2018 के अंतर्गत 1200 कैमरे जंगलात विभाग द्वारा लगाए जा रहे हैं। जिम कार्बेट और टाईगर रिजर्व पार्कों के अलावा 12 वन प्रभागों को 9 खंडों में बांटा गया है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बाघों की गिनती बरसात के बाद की जाएगी।

उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव संरक्षक डीबीएस खाती का कहना है कि बाघों और गुलदारों की मौत प्राकृतिक कारणों के अलावा आपसी संघर्षों के कारण भी होती है।

उत्तराखंड के जंगलों में बाघ और गुलदार सुरक्षित नहीं है जबकि वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए राज्य और केंद्र सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है और उत्तराखंड में बाघों के संरक्षण के लिए तो राजाजी राष्ट्रीय पार्क और जिम कार्बेट पार्क को टाइगर रिजर्व पार्क के रूप में आरक्षित किया हुआ है। पिछले सात सालों में उत्तराखंड के विभिन्न जंगलों में 130 बाघ मारे जा चुके हैं और बीते तीन महीनों में सूबे में 29 गुलदारों की मौत हो चुकी है। बाघों और गुलदारों की मौत के विभिन्न कारण हैं। माना जा रहा है कि पौड़ी गढ़वाल जिले के लैंसडॉन वन प्रभाग ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए शुरू की गई सफारी मानव और वन्य जीवों के लिए आपसी संघर्ष इसकी मुख्य वजह है। लैंसडॉन वन प्रभाग की कोटडी रैंज टाइगर रिजर्व पार्क के बफर जोन में आती है। परंतु यहां शुरू की गई सफारी के लिए पार्क के नियम कायदों का ढंग से पालन नहीं हो पा रहा है, जिससे यह सफारी वन्य जीवों के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है और वन्य जीवों का व्यवहार इस क्षेत्र में मानव दखल के कारण चिड़चिढ़ा सा हो गया है। यही हालत सूबे के अन्य जंगलों में भी वन्य जीवों के साथ हो रही है। उनके व्यवहार में लगातार बदलाव आ रहा है और वन्य जीव जंगलों से सटे गांवों में हमला कर रहे हैं। इससे मानव और वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ रही है।

वहीं बीते एक साल में एक दर्जन बाघों की मौत विभिन्न कारणों से हो चुकी है। जबकि बीते सात सालों में 130 बाघों की मौत हुई है। सबसे ज्यादा बाघ 2011 में 18 की तादाद में मारे गए। जबकि सबसे कम बाघ 2010 में छह की तादाद में मरे। बाघों और गुलदारों की मौत के मुख्यत: नौ प्रमुख कारण रहे हैं। बीते सात सालों 62 बाघों की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से, 23 बाघ आपसी संघर्ष में, 15 बाघ सड़क हादसे में, 6 बाघ शिकारियों के कारण, 2 बाघ जंगलों में आग लगने के कारण, 1 बाघ सांप के डसने के कारण मौत के मुंह में समाया। चार बाघों को जंगलात विभाग ने नरभक्षी होने के कारण मौत के घाट उतारा। 13 बाघों की मौत का कारण जंगलात विभाग पता नहीं लगा सका। एक बाघ की मृत्यु खेतों में लगे तारों की बाड़ में फंसने के कारण हुई। राज्य में बाघों की संख्या 362 दर्ज की गई है।

वन्य जीव विशेषज्ञ राजीव मेहता का कहना है कि राज्य के जंगलों खासकर जिम कार्बेट पार्क और टाइगर रिजर्व पार्क में बाघों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है, परंतु जंगलों में बाघों की बढ़ती संख्या के हिसाब से उनके भोजन का बंदोबस्त जंगलात विभाग ने नहीं किया है। उत्तराखंड के जंगलों में बाघों की गिनती के लिए बाघ आंकलन 2018 के अंतर्गत 1200 कैमरे जंगलात विभाग द्वारा लगाए जा रहे हैं। जिम कार्बेट और टाईगर रिजर्व पार्कों के अलावा 12 वन प्रभागों को 9 खंडों में बांटा गया है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बाघों की गिनती बरसात के बाद की जाएगी।

उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव संरक्षक डीबीएस खाती का कहना है कि बाघों और गुलदारों की मौत प्राकृतिक कारणों के अलावा आपसी संघर्षों के कारण भी होती है। राज्य में बाघों और गुलदारों की सुरक्षा के लिए विभाग ने कई कड़े कदम उठाए हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रोग्राम कोआर्डिनेटर टीटो जोजेफ का कहना है कि बाघ और गुलदारों के अलावा अन्य वन्य जीव जन्तुओं को सबसे ज्यादा खतरा शिकारियों से है। राज्य सरकार को शिकार रोकने के लिए कई कड़े कदम उठाने होंगे। शिकारियों के ऊपर शिकंजा और अधिक कसने की जरूरत है। न्यायालय में बहुत कम शिकारियों को सजा हो पाती है। राज्य में वन विभाग में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों की बहुत दुर्दशा है। राज्य बनने के बाद से सूबे के जंगलात विभाग के दरोगाओं और सुरक्षाकर्मियों की कई मांगे सालों से लटकी हुई है। इस समय फायर सीजन सिर पर है और सूबे के तीन हजार वन्य सुरक्षाकर्मी हड़ताल पर हैं।

तीन महीने में 29 गुलदार मारे गए

उत्तराखंड के जंगलों में सबसे चौंकाने वाले आंकड़े बाघों और गुलदारों को लेकर हैं। इस साल उत्तराखंड में जनवरी से लेकर मार्च महीने तक 29 गुलदार मारे जा चुके हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। मारे गए अधिकांश गुलदारों की उम्र 9 से 12 साल के बीच है। गुलदार की आयु तकरीबन 12 साल मानी जाती है। 9 साल के बाद गुलदार कमजोर होने लगता है। और उसे शिकार करने में परेशानी होती है। ऐसे में वे भूख या अन्य जानवरों के साथ संघर्ष में मारे जाते हैं।

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