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अनोखा स्कूल: दाखिला लेने वालों को मिलेंगे सोने के सिक्के और 5000 रु कैश

स्कूल की शुरुआत साल 1996 में हुई थी। उस वक्त स्कूल में 165 बच्चों ने दाखिला लिया था, हालांकि कुछ ही दिनों बाद स्कूल अपनी चमक खोने लगा। गांव के बहुत से लोग खेती के कारणों से दूसरी जगह शिफ्ट होने लगे, जिसके कारण स्कूल में बच्चों की संख्या में कमी आते गई।

तस्वीर का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो)

तमिलनाडु के एक स्कूल ने दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए बेहद ही खास तरीका अपनाया है। कोयंबटूर के अन्नूर के पास स्थित कोनारपलायम गांव में ग्रामीणों ने एक प्राइमरी स्कूल में बच्चों को दाखिला लेने के लिए उत्साहित करने के मकसद से एक अनोखा तरीका अपनाया है। इस स्कूल में दाखिला लेने वाले पहले दस बच्चों को पांच हजार रुपए कैश, एक ग्राम सोने का सिक्का और दो सेट यूनिफॉर्म के फ्री दिए जाएंगे। स्कूल के हेडमास्टर राजेश चंद्रकुमार का कहना है कि इस तरीके ने काम करना भी शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि तीन बच्चों ने स्कूल में एडमिशन ले लिया है और तीन अन्य बच्चों ने भी अपनी रुचि दिखाई है।

स्कूल की शुरुआत साल 1996 में हुई थी। उस वक्त स्कूल में 165 बच्चों ने दाखिला लिया था, हालांकि कुछ ही दिनों बाद स्कूल अपनी चमक खोने लगा। गांव के बहुत से लोग खेती के कारणों से दूसरी जगह शिफ्ट होने लगे, जिसके कारण स्कूल में बच्चों की संख्या में कमी आते गई। कुछ सालों बाद स्कूल में बच्चों की संख्या महज 10 रह गई और इंग्लिश मीडियम का क्रेज बढ़ने के कारण यह संख्या भी घटकर 5 पर पहुंच गई। राजेश ने बताया, ‘मैंने जब पांच साल पहले स्कूल ज्वाइन किया था, मैं सिर्फ छह बच्चों का दाखिला करा सका था।’ इसी बीच राज्य सरकार ने फैसला लिया कि जिस स्कूल में 10 से कम बच्चे पढ़ रहे हैं, उसे बंद किया जाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक गांव में अब केवल 65 परिवार रहते हैं, जिसके कारण स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या भी कम है।

राजेश ने गांव वालों के साथ एक मीटिंग की, जिसके बाद बच्चों का दाखिला बढ़ाने के लिए यह आइडिया उनके दिमाग में आया। गांव के एक व्यापारी शेखर ने एक ग्राम के सोने के सिक्के को देने का प्रस्ताव रखा तो वहीं गांव के हेड सेल्वराज ने पहले दस स्टूडेंट को 5 हजार रुपए देने की बात कही। गांववालों ने शिक्षा विभाग से इस बारे में बात की, विभाग से भी उन्हें मंजूरी मिल गई। सेल्वराज ने कहा, ‘हम नहीं चाहते थे कि स्कूल बंद हो जाए। पड़ोस के गांव में भी स्कूल हैं, जहां बच्चों की अच्छी खासी संख्या है। गांव में स्कूल होना गर्व की बात है। इसलिए किसी भी कीमत पर हम स्कूल को बचाना चाहते हैं।’

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