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पंडित मदन मोहन मालवीयः BHU के लिए कर दिया था नवाब की जूती बेचने का ऐलान, यूं हार गए थे हैदराबाद के निजाम

पंडित मदन मोहन मालवीय की जिंदगी में कई ऐसी रोचक घटनाएं हुईं जिन्हें आज भी याद किया जाता है। बीएचयू के लिए चंदा जुटाने के दौरान भी ऐसे ही कुछ वाकये हुए थे।

पंडित मदन मोहन मालवीय (फोटोः फाइनेंशियल एक्सप्रेस)

महामना की उपाधि हासिल करने वाले भारत के पहले और आखिरी शख्स पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम रोचक किस्सों की एक लंबी फेहरिस्त है। ऐसे ही कुछ किस्से आज भी काफी चर्चित हैं। 1920 के दशक में मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखी थी। इसे विकसित करने के लिए वे देशभर में दौरे कर रहे थे। इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात एक नवाब से हुई। उन्होंने मदद की मांग की। लेकिन नवाब ने उन्हें इनकार कर दिया। तो उन्होंने रोचक अंदाज में सबक सीखाया और बड़ी रकम दान में ली।

नवाब की जूती नीलाम करने का किया ऐलान

महामना मालवीय मिशन की वेबसाइट पर एक रोचक किस्से का जिक्र है। इसके मुताबिक नवाब ने चंदा देने से इनकार करते हुए कहा, ‘मैं चन्दा नहीं दे सकता।’ इस दौरान मालवीय के चंदे का प्रस्ताव दो लाख रुपए से कम होकर घटते-घटते 10 रुपए तक जा पहुंचा। लेकिन नवाब ने वो भी देने से इनकार कर दिया। मालवीय आसानी से हार मानने वालों में नहीं थे। उन्होंने निवेदन किया और कहा, ‘मैं कहीं से खाली हाथ नहीं लौटा हूं आपसे अनुरोध है कुछ तो दे दीजिए।’ ऐसा कहते हुए उन्होंने एक सफेद कपड़ा नवाब के सामने फैला दिया। नवाब ने तुरंत अपनी जूती उतारी और मालवीय के कपड़े में डाल दी। मालवीय निराश नहीं हुए और जूती को काशी ले आए। यहां उन्होंने समाचार पत्र में नवाब की जूती की नीलामी का विज्ञापन छपवा दिया। यह खबर जब नवाब तक पहुंची तो वह शर्मिंदा हुआ और माफी मांगकर अपनी जूती बड़ी रकम देकर वापस लिया।

यूं शर्मिंदा हुए हैदराबाद के निजाम

हैदराबाद का ही एक और किस्सा काफी मशहूर हुआ। बताया जाता है कि मालवीय जब निजाम के महल से बाहर आए तो एक किसी बड़े सेठ की शवयात्रा गुजर रही थी। इस दौरान गरीबों को पैसा बांटा जा रहा था। मालवीय ने भी हाथ बढ़ा दिया। किसी ने पूछ लिया कि आपको देखकर तो लगता नहीं कि आपको इस पैसे की जरूरत है। इस पर मालवीय ने जवाब दिया, ‘क्या करूं? तुम्हारे निजाम ने तो कुछ दिया नहीं। खाली हाथ लौटा तो काशी में क्या कहूंगा कि हैदराबाद के निजाम ने कुछ दिया नहीं। ये रुपए विश्वविद्द्यालय के लिए हैदराबाद के नाम से जमा किये जाएंगे।’ यह खबर जब निजाम तक पहुंची तो वे काफी शर्मिंदा हुए और उन्होंने मालवीय को महल में बुलाकर काशी विश्वविद्यालय के लिए बड़ी रकम दान में दी।

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