बिहार के ऐतिहासिक सिन्हा पुस्तकालय को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने NDA सरकार को झटका दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने बिहार सरकार द्वारा बनाए गए श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट एवं सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी (रेक्विजीशन एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2015 को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है।
संपत्ति लेना संविधान के खिलाफ
अदालत ने कहा कि यह कानून मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 300ए (संपत्ति का अधिकार) का उल्लंघन करता है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बिना उचित प्रक्रिया और पर्याप्त मुआवजे के किसी ट्रस्ट से उसकी संपत्ति लेना संविधान के खिलाफ है। यह लाइब्रेरी बिहार की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संस्थाओं में से एक मानी जाती है।
बता दें कि इसकी स्थापना वर्ष 1924 में प्रसिद्ध शिक्षाविद और संविधान सभा के प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी पत्नी राधिका सिन्हा की स्मृति में की थी। उन्होंने अपनी पत्नी की पैतृक संपत्ति बेचकर मिले पैसों से इस लाइब्रेरी की शुरुआत की थी। समय के साथ यह संस्था एक बड़े सार्वजनिक पुस्तकालय के रूप में विकसित हुई। जिसमें करीब 1.8 लाख किताबों का संग्रह है।
संपत्ति अपने हाथ में लेने का प्रयास किया
वर्ष 1955 में बिहार सरकार और ट्रस्ट के बीच हुए एक समझौते में ट्रस्ट के स्वामित्व को मान्यता दी गई थी और सरकार ने वित्तीय सहायता देने की भी बात कही थी। लाइब्रेरी को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश पहली बार 1983 में की गई थी। जब बिहार सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया था। हालांकि बाद में यह अध्यादेश खत्म हो गया और मामला अदालत में चला गया। इसके बाद 2015 में नीतीश सरकार ने नया कानून बनाकर लाइब्रेरी के प्रबंधन को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया।
इस कानून को ट्रस्ट की ओर से अदालत में चुनौती दी गई थी। पहले पटना हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई हुई और बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून रद्द होने के बाद लाइब्रेरी का पूरा प्रबंधन और अधिकार फिर से ट्रस्ट को सौंप दिया जाए।
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