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पश्चिम बंगाल: चाय के प्याले में तूफान का अंदेशा

मजदूर यूनियनें अपनी मांगों के समर्थन में रोजाना धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। इससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है। चाय बागान मालिकों के संगठन इंडियन टी एसोसिएसन (आइटीए) का दावा है कि बीते साल के मुकाबले चाय के उत्पादन में लगभग नौ फीसद की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।

चाय बागान मालिकों ने भी मजदूर यूनियनों ने हड़ताल का फैसला वापस लेने की अपील की है।

चाय बागान मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के मुद्दे पर राज्य के चाय उद्योग में असंतोष खदबदा रहा है। तमाम मजदूर यूनियनों ने अपनी मांगों के समर्थन में 23 से 25 जुलाई तक तीन दिवसीय हड़ताल का एलान किया है। इससे पहले से ही बदहाली के शिकार इस उद्योग को और झटका लगने का अंदेशा है। राज्य सरकार ने हालांकि न्यनूतम मजदूरी तय करने के मुद्दे पर एक समिति का गठन कर दिया है। बावजूद इसके मजदूरों की नाराजगी कम नहीं हुई है। दूसरी ओर, चाय बागान मालिकों ने भी मजदूर यूनियनों ने हड़ताल का फैसला वापस लेने की अपील की है। लेकिन इस सवाल पर गतिरोध लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

दरअसल पड़ोसी असम में चाय मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ने के बाद बंगाल के चाय मजदूरों ने भी इसकी मांग उठाई है। असम की भाजपा सरकार ने हाल में इन मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 30 रुपए बढ़ा कर 167 रुपए प्रति दिन कर दी है। लेकिन बंगाल के मजदूरों को रोजाना 150 रुपए ही मिलते हैं। राज्य सरकार ने अंतरिम राहत के तौर पर इस साल पहली मई से इन मजदूरों की दैनिक मजदूरी 17.50 रुपए बढ़ा कर 150 रुपए कर दी थी। राज्य के चाय बागानों में पहले सरकार, प्रबंधन व यूनियनों के बीच तितरफा बातचीत के आधार पर मजदूरी तय होती थी। लेकिन यूनियनें अब इस प्रथा को खत्म कर न्यूनतम मजदूरी अधिनियम लागू करने की मांग कर रही हैं। इस मुद्दे पर न्यूनतम मजदूरी सलाहकार समिति की 10 बैठकों के बावजूद गतिरोध जस का तस है।

मजदूर यूनियनें अपनी मांगों के समर्थन में रोजाना धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। इससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है। चाय बागान मालिकों के संगठन इंडियन टी एसोसिएसन (आइटीए) का दावा है कि बीते साल के मुकाबले चाय के उत्पादन में लगभग नौ फीसद की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। उत्तर बंगाल के चाय बागानों में सक्रिय 28 यूनियनों ने ज्वायंट फोरम के बैनर तले एकजुट होकर इस महीने तीन दिनी के हड़ताल की नोटिस दी है। इसके अलावा बीती दो जुलाई से तमाम बागानों में धरना व प्रदर्शन जारी है। आइटीए की दलील है कि चाय उद्योग के मजदूरों की मजदूरी आपसी बातचीत के जरिए तय होती रही है और एक अप्रैल, 2014 को इस मुद्दे पर तीन साल के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। दूसरी ओर, आइटीए ने एक बयान में कहा है कि बीते कई वर्षों से चाय की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं जबकि उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। इससे संगठित क्षेत्र में चाय उद्योग पर भारी वित्तीय बोझ पड़ रहा है। संगठन का कहना है कि अब मजदूरों के आंदोलन व हड़ताल के फैसले से उद्योग को भारी नुकसान का अंदेशा है। आइटीए अध्यक्ष अजम मोनेम ने चाय उद्योग के लिए एक ठोस नीति बनाने की मांग की है। उनका कहना है कि भारत के निर्यात में आर्थोडॉक्स व ग्रीन टी का हिस्सा 60 फीसद है। इनके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को इंसेटिव की रकम बढ़ानी चाहिए।

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