…तो नौजवान बनाएंगे अगली सरकार!

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा के चुनाव जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरण को ध्यान में रखकर लड़ने वाले राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल का सबब बनने जा रहे हैं।

सांकेतिक फोटो।

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा के चुनाव जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरण को ध्यान में रखकर लड़ने वाले राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल का सबब बनने जा रहे हैं। विकास और रोजगार की सही तस्वीर खींचने वाले राजनीतिक दल को उत्तर प्रदेश में अधिक तरजीह मिलनी तय है। मतदाताओं का ह्रदय परिवर्तन होने की बड़ी वजह उनकी एक खास बिरादरी है, जिसका फीसद 56.17 है। ये वे मतदाता हैं जिनकी उम्र 39 वर्ष या उससे कम है। लाजिम है, मतदाता की इस जमात को रोजगार और विकास चाहिए न की दशकों से दोहराई जा रही राजनीति की दकियानूसी कहानी।

उत्तर प्रदेश को अपने सियासी लाभ के लिहाज से हांकने वाले राजनीतिक दलों को वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और उसके बाद से लगातार मतदाता सबक सिखाता रहा है। 2007 में मायावती ने 206 सीटें जीत कर जमाने बाद प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उस वक्त उनकी सरकार बनने का श्रेय सोशल इंजीनियरिंग को दिया गया और युवा मतदाताओं को ध्यान में रख कर योजना बनाने में सियासी हिचकिचाहट दिखाई। नतीजनत बहुजन समाज पार्टी को विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत देने वाला युवा मतदाता कांग्रेस के पाले में जा खड़ा हुआ। जिसके कारण केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी।

2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी से पूरी तरह खफा हो चुके युवा मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी को मतदान इसलिए किया क्योंकि अखिलेश यादव की शक्ल में उन्हें अपना प्रतिनिधित्व करता हुआ कोई युवा नेता नजर आया। लेकिन दो बरस के भीतर यहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। अखिलेश यादव को भी सिर्फ दो बरस के भीतर जनता के बीच अपनी पकड़ का पूरा अहसास हो चुका था।

यही वजह थी कि उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के सिर्फ पांच सांसद ही जीत पाए। इस बीच अखिलेश यादव ने लैपटाप बांटे। बावजूद इसके 2017 के विधानसभ चुनाव में अपनी सरकार के रिपोर्ट कार्ड का भरोसा छोड़ बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन करना पड़ा। सियासत के दो विपरीत ध्रुव सियासी लाभ के लिए एक हो गए। उसके बाद भी दोनों की सियासी नैया डूब गई।

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक बहुमत की सरकार बनाई। इस सरकार के दो साल पूरे हों, उसके पहले ही 2019 के लोकसभा चुनाव आ गए। इस चुनाव में भाजपा सरकार का जनता को रिपोर्ट कार्ड देना था। उसने भारतीय जनता पार्टी के 70 सांसद जिताए। 2022 में फिर विधानसभा चुनाव हैंं। इस चुनाव में युवाओं का मिजाज कैसा होग? इसको समझने के पहले युवाओं की बतौर मतदाता शक्ति का भी अंदाजा कर लीजिए। प्रदेश के मतदाताओं की आधी से अधिक आबादी यानी 55.17 फीसद की उम्र 39 साल या उससे कम है।

उत्तर प्रदेश में इस वक्त 18 से 19 वर्ष के मतदाताओं की संख्या करीब 11 लाख, 20 से 29 वर्ष के मतदाता साढ़े तीन करोड़ और 30 से 39 साल के मतदाताओं की संख्या पौने चार करोड़ के करीब है। युवा मतदाताओं की इस भीड़ में पहले 11.3 फीसद बेरोजगार थे जो अब घट कर दस फीसद से कम हैं। यानी 50 लाख के करीब।

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