अनूठा है हस्तिनापुर का सियासी मिजाज

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने हस्तिनापुर का प्राचीन गौरव लौटाने का सपना देखा था।

मेरठ जिले के हस्तिनापुर की कहने को तो इतनी खूबियां हैं पर विकास की कसौटी पर यह बेहद पिछड़ा इलाका माना जाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने हस्तिनापुर का प्राचीन गौरव लौटाने का सपना देखा था। इस ग्रामीण कस्बे के विकास और पुनर्वास के लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए। हस्तिनापुर के पुनर्वास और चंडीगढ़ शहर को बसाने का शिलान्यास नेहरू ने एक ही दिन किया था। चंडीगढ़ देश के विकसित और शहरीकरण के तमाम मापदंडों पर बेहतरीन शहर के नाते विश्वव्यापी पहचान बना चुका है। जबकि हस्तिनापुर में कोई बदलाव नहीं आया। रामविलास पासवान जब रेलमंत्री थे तो उन्होंने मेरठ से वाया हस्तिनापुर, बिजनौर तक रेल मार्ग विकसित करने का एलान किया था। पर उनका सपना भी अधूरा ही रह गया।

किदवंती है कि हस्तिनापुर को द्रौपदी का श्राप है। इसी प्राचीन नगरी में भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ था। नेहरू ने यहां पूर्वी बंगाल के विस्थापितों को बसाया था और सूत मिल भी स्थापित कराई थी। पर हस्तिनापुर फिर भी पिछड़ा ही रहा। जहां तक हस्तिनापुर विधानसभा सीट का सवाल है, यह 1956 में बनी थी। बाद में 1967 से इसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। मेरठ जिले का इलाका होने के बावजूद हस्तिनापुर विधानसभा 2009 से बिजनौर लोकसभा सीट के अंतर्गत आती है।

तीन लाख मतदाताओं वाला हस्तिनापुर विधानसभा क्षेत्र बेशक अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है पर यहां सबसे ज्यादा तादाद में गुर्जर मतदाता हैं। सिख और जाट भी काफी हैं। पिछले चुनाव में यहां भाजपा के दिनेश खटीक ने बसपा के योगेश वर्मा को करीब 36 हजार वोट से हराया था। तेज तर्रार दलित नेता दिनेश खटीक योगी आदित्यनाथ की सरकार में इस समय मंत्री हैं। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करें तो बिजनौर के बसपा उम्मीदवार मलूक नागर को भाजपा के भारतेंद्र सिंह पर यहां खासी बढ़त हासिल हुई थी। पर तब सपा और बसपा का गठबंधन था।

1957 में सामान्य सीट थी तो कांग्रेस के बिशंबर सिंह गुर्जर यहां से विजयी हुए थे। इसके बाद 1962 के चुनाव में भी कांगे्रस के पीतम सिंह जीते थे। अगली बार यानी 1967 में सीट आरक्षित हो गई तो कांगे्रस के ही डाक्टर रामजी लाल सहायक यहां से जीतकर प्रदेश सरकार में मंत्री बने थे। शुरू के चारों चुनावों के बाद कांगे्रस का ही लगातार सूबे में शासन रहा। अगले चुनाव में 1969 में भारतीय क्रांति दल के आशाराम इंदु जीते थे। भारतीय क्रांति दल की 1969 में तो नहीं पर अगले साल जरूर सूबे मे सरकार बन गई थी और चौधरी चरण सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे।

यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। जब 1974 में कांगे्रस के रेवती शरण मौर्य जीते और सरकार भी कांग्रेस की बनी। पर आपातकाल के बाद मौर्य ने पाला बदल लिया। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और उसी के टिकट पर फिर जीत गए। सरकार भी जनता पार्टी की ही बनी। इसे केंद्र की सत्ता में वापसी के बाद इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दिया और 1980 में सूबे में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हुए। सरकार भी कांगे्रस की बनी और हस्तिनापुर में भी जीते कांगे्रस के झग्गड़ सिंह ही। अगले चुनाव में 1985 में कांग्रेस ने हरशरण जाटव को उम्मीदवार बनाया तो वे भी जीत गए। सत्ता में वापसी भी कांगे्रस की ही हुई। लेकिन 1989 में यहां झग्गड़ सिंह जनता दल के उम्मीदवार बने और जीते। इस बार सरकार जनता दल की बनी और मुख्यमंत्री हुए मुलायम सिंह यादव।

राम लहर में 1991 में यहां भाजपा के गोपाल काली जीते। सरकार भी कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की ही बनी। फिर 1996 में भाजपा के अतुल खटीक जीते तो चुनाव के कुछ माह बाद फिर सरकार कल्याण सिंह की ही बनी। 2002 में जीत सपा के प्रभु दयाल बाल्मीकि के खाते में आई और 2003 में मुख्यमंत्री भी मुलायम सिंह यादव ही बने और 2007 तक पद पर रहे। अगले चुनाव में 2007 में मायावती ने पहली बार अपने बूते सरकार बनाई तो हस्तिनापुर में भी जीत उन्हीं के उम्मीदवार योगेश वर्मा की हुई। जो 2012 में सपा के प्रभु दयाल बाल्मीकि से हार गए। हस्तिनापुर में सपा जीती तो सूबे के मुख्यमंत्री भी अखिलेश यादव बने। अब 2022 का हस्तिनापुर सीट का चुनावी परिणाम इस सियासी संयोग को कायम रखेगा या परंपरा टूटेगी, देखना दिलचस्प होगा।

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