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पश्चिम बंगाल: माटी कहे कुम्हार से, अब यह धंधा छोड़

कौशल्या प्रजापति नामक एक महिला कुम्हार ने जनसत्ता को बताया कि मिट्टी के साधारण दीए ग्राहकों को पसंद नहीं आते और डिजाइनर व रंगीन दीए अब महंगे होते जा रहे हैं, इसलिए इनकी मांग भी कम होती जा रही है।

Author October 31, 2018 3:40 AM
बीते 10-15 सालों के दौरान चाक की धार जितनी कम हुई है, कुम्हारों की दिक्कतें उतनी ही बढ़ी है।

शंकर जालान

जलाओ दीए पर रहे ध्यान इतना।
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।।
रोशनी के पर्व दीपावली से प्रेरित हो इस कविता को रचने वाले कवि को क्या पता था कि वे जिस दीए की बात कर रहे हैं, वह आधुनिक युग में लगभग बाजार से गायब ही हो जाएगा। कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि जिस मिट्टी के दीए यानी दीपक के बगैर रोशनी के पर्व दीपावली की कल्पना नहीं की जा सकती, बदलते वक्त में उसी के निर्माताओं यानी कुम्हारों के घर में छाया अंधेरा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। बीते एक-डेढ़ दशक के दौरान ज्यों-ज्यों चीन से आयातित बिजली के बल्ब और टुन्नी लाइटों का बाजार बढ़ा है, त्यों-त्यों दीपक की लौ से होनी वाली रोशनी मंद पड़ती गई है। चाहे वैज्ञानिक युग की मार कहें या फिर आधुनिक युग की चकाचौंध। बीते 10-15 सालों के दौरान चाक की धार जितनी कम हुई है, कुम्हारों की दिक्कतें उतनी ही बढ़ी है। लिहाजा कुम्हारों की नई पीढ़ी ने अपने पुश्तैनी कारोबार से करीब-करीब तौबा करने का मन बना लिया है।

पंडित मधुसूदन शर्मा बताते हैं कि प्राचीन परंपरा के तहत दीपावली पर लोग दीपक जलाकर चारों तरफ प्रकाश करते थे। उस दौर में पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली आतिशबाजी नहीं होती थी। त्रेता युग में भगवान श्रीराम 14 साल के वनवास की अवधि पूरी कर जब वापस अपनी राजधानी अयोध्या लौटे थे, तब लोगों ने उनके (श्रीराम) के स्वागत में दीए जलाकर अपने घरों को रोशन किया था। दीपो ज्योति: परं ब्रह्मा दीपो ज्योतिर्जनादर्न, दीपो हरतु मे पापं सांध्यदीप! नमोस्तु ते।। उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यता के साथ ही दीपावली मनाने का वैज्ञानिक पहलू भी है। इससे हम अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ करते हैं। आतिशबाजी के शोर-शराबों से दूर जब सामूहिक रूप से दीए जलाए जाते हैं तो उसके प्रकाश से निकलने वाली किरणें वातावरण में फैले रोगाणुओं व कीटाणुओं को नष्ट कर देती हैं।

इन दिनों बिजली और बैटरी से रोशन होने वाले दीयों से बाजार पटा पड़ा है। भले ही बिजली चालित दीए से अंधेरा दूर और घर रोशन होता हो, लेकिन दीए व बाती के धंधे से जुड़े लोगों का घर अंधेरे में डूबता जा रहा है। इस साल देशभर में सात नवंबर को दीपावली का पर्व मनाया जाएगा। कुछ सालों पहले तक दीपावली पर मिट्टी से बने दीए जलाने का चलन था। दीए और उसमें भरे तेल या घी के बीच रुई की बत्ती की लौ देखते ही बनती थी और लोग दीपावली पर्व को रोशन करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ दीए की जगह चीन निर्मित छोटे (टुन्नी) बल्बों ने ले ली है। रोशनी की चकाचौंध और कम खर्च को देखते हुए लोग इन आधुनिक टुन्नी बल्बों व झालरों का ही उपयोग अधिकाधिक करने लगे हैं। इससे मिट्टी के दीए बनाने वाले कुम्हारों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ गई है।

मिट्टी और सरसों तेल, घी की कीमत में वृद्धि को देखते हुए दीए की मांग धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इससे इन कुम्हारों को आर्थिक नुकसान उठाने के अलावा बेरोजगारी का दंश भी झेलना पड़ रहा है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कोलकाता शहर में हजारों की संख्या में ऐसे कुम्हार हैं, जो मिट्टी के दीए, कलश, गमले और टब बनाकर अपना जीवन-यापन करते हैं। कौशल्या प्रजापति नामक एक महिला कुम्हार ने जनसत्ता को बताया कि मिट्टी के साधारण दीए ग्राहकों को पसंद नहीं आते और डिजाइनर व रंगीन दीए अब महंगे होते जा रहे हैं, इसलिए इनकी मांग भी कम होती जा रही है। संकुचित होते बाजार के कारण अब वे अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं लाना चाहती। वहीं, कुम्हारों के बच्चों का कहना है कि केवल कला के जुड़ाव के कारण इस शिल्प से जुड़े रहना समझदारी का काम नहीं हैं। क्योंकि इसके भरोसे परिवार का पालन संभव नहीं।

हम अब नए व्यवसाय में जाने की सोच रहे हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि मिट्टी के दीए व अन्य सामग्रियों के निर्माण में लगे असंख्य लोग अपनी जीविका चलाते थे, लेकिन वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में हस्तशिल्प की यह कला अब लुप्त होने की कगार पर है, जबकि कभी ये हमारी पारंपरिक कुटीर उद्योग के आधार हुआ करते थे। आधुनिकता की मार से कुम्हार के चाक की धार धीरे-धीरे कम होती चली जा रही है। मिट्टी के दीए बेचने वाले अरुण कुमार ने बताया कि पहले लोग सैकड़ों की संख्या में दीए खरीदते थे, वहीं अब महज दर्जन भर ही दीए खरीदते हैं। वहीं, ग्राहकों का कहना है कि दीपावली के मौके पर जगमगाते हुए दिखने वाले मिट्टी के दीए अब लगभग अतीत की बात लगने लगी है। एक वक्त था जब वे लोग दीपावली के कई दिनों पहले से बाजारों में मिट्टी के दीपक खरीदा करते थे, लेकिन आज आधुनिक युग में स्थिति पूरी तरह बदल गई है।

 

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