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खुलासाः स्थायी शिक्षकों की कमी, लेकिन वकीलों की फौज

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में स्थायी शिक्षकों की भले ही कमी हो और पढ़ाई से लेकर दाखिले व परीक्षा सत्र तक के ज्यादातर काम तदर्थ शिक्षकों के सहारे चल रहे हों, लेकिन विश्वविद्यालय के पास वकीलों की भारी फौज मौजूद है।

Author नई दिल्ली | Updated: January 7, 2017 1:45 AM
दिल्ली यूनिवर्सिटी

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में स्थायी शिक्षकों की भले ही कमी हो और पढ़ाई से लेकर दाखिले व परीक्षा सत्र तक के ज्यादातर काम तदर्थ शिक्षकों के सहारे चल रहे हों, लेकिन विश्वविद्यालय के पास वकीलों की भारी फौज मौजूद है। डीयू ने अपने अदालती कामकाज देखने के लिए 36 वकीलों को रखा है और हर साल इन पर 80-90 लाख रुपए तक खर्च किए जा रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सवाल यह उठता है कि डीयू लड़ाई का अखाड़ा है या शिक्षण संस्थान? दिल्ली विश्वविद्यालय ने बीते चार सालों में अपने वकीलों का पौने चार करोड़ रुपए से ज्यादा का भुगतान किया है। डीयू के पैनल में कई ऐसे वकील हैं जो सालों से बदले नहीं गए हैं। विश्वविद्यालय ने हालांकि इस बाबत मांगी गई जानकारी में से आधी जानकारी देना जरूर नहीं समझा, लेकिन जो भी तथ्य सामने आए उनसे साफ है कि विश्वविद्यालय वकीलों पर खर्च ‘मेंटेनेंस फंड’ से कर रहा है। जानकारों का कहना है विश्वविद्यालय के पास इसका अलग फंड नहीं है।

सामाजिक कार्यकर्ता और स्वराज नागरिक मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार पासवान ने कहा कि किसी ने सोचा नहीं था कि पठन-पाठन को समर्पित रहने वाले विश्वविद्यालय के निर्णय अदालत में तय होंगे और एकतरफा निर्णय के चलते विश्वविद्यालय को अपनी साख बचाने के लिए वकीलों की फौज रखनी होगी। यही वजह है कि इस बाबत किसी स्थायी मद की व्यवस्था तब के शिक्षाविदों ने नहीं की, लेकिन बीते सालों में दिल्ली विश्वविद्यालय के कई फैसलों को अदालतों में चुनौती दी गई। कई में विश्वविद्यालय को मुंह की भी खानी पड़ी। बकौल राजकुमार, आरटीआइ कानून के तहत मांगी गई सूचनाओं में से कई जवालों के जवाब विश्वविद्यालय ने नहीं दिए। मसलन उन्होंने नहीं बताया कि किस वकील को कितना भुगतान हुआ? डीयू 2010 से अभी तक कितने मामले सिविल कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहा है। मुकदमों के क्या नतीजे निकले? उनके मुताबिक डीयू ने अपने पैनल के वकीलों की दो सूची मुहैया कराई, जिसमें बताया गया है कि 2006 में 29 वकीलों के पैनल को कार्यकारी परिषद ने मंजूरी दी थी और 2012 में 36 वकीलों का पैनल बनाने की मंजूरी दी गई थी। अन्य सवालों को विश्वविद्यालय ने यह कह कर टाल दिया है कि वे इससे संबंधित नहीं हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों की मानें तो डीयू के दर्जनों ऐसे मामले अदालतों में गए जिन्हें रोका जा सकता था। हाल के विवादों में विधि संकाय के आधारभूत ढांचे को लेकर बार एसोसिएशन के विवाद का मसला, गैर शैक्षणिक कर्मचारियों का विवाद, रोस्टर को लागू करने को लेकर विवाद, दाखिला (फेस्ट फोर), नतीजों (परीक्षा परिणाम) से जुड़े विवाद और डूसू चुनाव से जुड़े विवाद आदि को शामिल किया जा सकता है। बता दें कि ज्यादातर मामलों में विश्वविद्यालय को अदालत से निर्देश मिलते रहे हैं। इतना ही नहीं, बीते दिनों एक दिव्यांग छात्र के पक्ष में आए फैसले का जिक्र यहां गैरवाजिब नहीं होगा। दिव्यांग छात्र को शोध में दाखिला न देने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू को न केवल फटकार लगाई बल्कि 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। बता दें कि विश्वविद्यालय ने 77 फीसद दिव्यांग छात्र मेधावी कृष्ण को दाखिला देने से मना कर दिया था। मेधावी कृष्ण ने कहा, ‘हालांकि लड़ाई मैंने जीती, लेकिन समय बीत गया। यह गैर-जरूरी था। विश्वविद्यालय ने तो वकील को सरकारी पैसे दिए होंगे, लेकिन आम छात्र के लिए संसाधन जुटाना भी मुश्किल कार्य है’। कृष्ण ने मई 2016 में बौद्ध अध्ययन विभाग में पीएचडी के लिए आवेदन किया था, जिसमें चयनित 47 उम्मीदवारों में वे एकमात्र दिव्यांग थे। कृष्ण ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि जरूरी योग्यता होने के बावजूद उन्हें दाखिला नहीं दिया गया। इसके बाद अदालत ने विश्वविद्यालय को फटकार लगाई। मेधावी कृष्ण जैसे और भी मामले हैं जिसे विश्वविद्यालय अदालतों में लड़ता रहा है, अपनी भारी-भरकम वकीलों की फौज के बल पर।

इस बाबत एक शिक्षक ने कहा कि नतीजा चाहे जो हो खर्च आम जनता का ही होता है। 2012 से डीयू अब तक 3,83,88,074 रुपए खर्च कर चुका है। ये रुपए ‘मेंटेनेंस ग्रांट’ से खर्च किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इतने रुपयों में तो 500 बिस्तरों वाला एक हॉस्टल बन जाता और जो बच्चे डीयू कैंपस से सटे इलाकों मसलन नेहरू विहार, मुखर्जी नगर और क्रिश्चियन कालोनी में भारी-भरकम किराया देने या पीजी में रहने को मजबूर हैं, उन्हें मदद मिल जाती।

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