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गुरुग्राम में बनेगा ‘सूर्यपुत्र देशों’ का मुख्यालय, 75 देशों ने किए हस्ताक्षर

सूर्यपुत्र की कार्ययोजना पर अब तक 75 सदस्य देश हस्ताक्षर कर चुके हैं और इनमें से 54 देशों की संसद से इसे मंजूरी भी मिल गई है। आइएसए के कामकाज का संचालन राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान स्थित संगठन के अस्थायी सचिवालय से किया जा रहा है।

Author नई दिल्ली | Published on: July 1, 2019 6:27 AM
आधुनिक भवन निर्माण कला का विशिष्ट नमूना पेश करने वाली इस इमारत के आसपास कुछ कृत्रिम जलाशयों के अलावा इमारत की छत पर एक बगीचा (रूफ गार्डन) भी बनाया जाएगा।

गुरुग्राम में बनने वाला 100 से ज्यादा ‘सूर्यपुत्र’ देशों का मुख्यालय पूरी तरह से हरित भवन होगा। इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आइएसए) की इस चार मंजिला इमारत में ऊर्जा एवं जल संरक्षण सहित पर्यावरण संरक्षण के सभी मानकों का पालन किया जाएगा। दो साल में यह बनकर तैयार हो जाएगी। आइएसए के मुख्यालय की भवन निर्माण कार्ययोजना के मुताबिक विशेष आकार वाली इसकी इमारत पृथ्वी की तरह होगी जिसे चारों ओर से सदस्य देशों के हाथों की एक आकृति का सहारा दिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आइएसए के सदस्य देशों को ‘सूर्यपुत्र’ का नाम दिया। आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के अंतर्गत केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) को इसकी भव्य इमारत बनाने का काम सौंपा गया है। मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने ‘सौर भवन’ की परियोजना रिपोर्ट को मंजूरी प्रदान कर दी है।

ऐसी होगी भवन संरचना
इमारत को पृथ्वी की तरह गोल आकार देने के लिए स्टील के कुछ पाइप से घेरा जाएगा। ये पाइप स्प्रिंकलर के रूप में रूफ गार्डन में सिंचाई के काम भी आएंगे। इसकी कार्ययोजना के मुताबिक समूचे भूभाग को ऐसा स्वरूप प्रदान किया जाएगा इससे यह दूर से सूरजमुखी के फूल की तरह दिखेगी। इसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की बैठक एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए विभिन्न आकार के सभागार और पर्यावरण प्रयोगशालाओं का निर्माण किया जाएगा। इसमें सभी सदस्य देशों के वैज्ञानिक निरंतर शोध एवं प्रशिक्षण के काम को कर सकेंगे। इसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों एवं प्रशिक्षुओं के लिए एक आवासीय परिसर भी बनाया जाएगा।

क्या है सूर्यपुत्र की कहानी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर सौर ऊर्जा की प्रचुर संभावना वाले 121 देशों ने आइएसए का नवंबर 2015 में गठन किया था। अंतरसरकारी संगठन के रूप में गठित आइएसए का मकसद कर्क एवं मकर रेखा के आसपास स्थित सदस्य देशों में सौर ऊर्जा का अधिकतम दोहन कर जीवाश्म ईंधन पर ऊर्जा की निर्भरता में कमी लाना है। मोदी ने आइएसए के सदस्य देशों को ‘सूर्यपुत्र’ का नाम दिया था। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण संबंधी पेरिस समझौते के तहत 2030 तक सौर ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने के लिए 1000 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश लक्ष्य की प्राप्ति में सूर्यपुत्र देशों के संयुक्त प्रयासों को आइएसए के माध्यम से फलीभूत बनाना है।

75 देशों ने हस्ताक्षर किए
सूर्यपुत्र की कार्ययोजना पर अब तक 75 सदस्य देश हस्ताक्षर कर चुके हैं और इनमें से 54 देशों की संसद से इसे मंजूरी भी मिल गई है। आइएसए के कामकाज का संचालन राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान स्थित संगठन के अस्थायी सचिवालय से किया जा रहा है।

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