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कला और संस्कृति: शागिर्द के भाव वाला उस्ताद

समारोह में परिवार परंपरा और गुरु शिष्य परंपरा की झलक बखूबी दिखी। बिरजू महाराज ने बैठक का भाव दिखाया। भाव मुद्राओं, हस्तकों, चेहरे और आंखों के जरिए एक-एक भाव को पेश करना, उनकी खासियत है।

सुर सागर सोसायटी आॅफ दिल्ली घराना की ओर से आयोजित समारोह में पंडित बिरजू महाराज ने बैठक अंदाज में भाव पेश कर समां बांध दिया।

कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज की उपस्थिति से ही समारोह की गरिमा बढ़ जाती है। कमानी सभागार में उस्ताद चांद खां संगीत समारोह के दौरान माहौल कुछ ऐसा ही था। सुर सागर सोसायटी आॅफ दिल्ली घराना की ओर से आयोजित समारोह में पंडित बिरजू महाराज ने बैठक अंदाज में भाव पेश कर समां बांध दिया। पंडित बिरजू महाराज ने कहा कि एक उम्र के बाद आप कला को समझने में गहरे उतर पाते हैं। जैसे-जैसे तजुर्बा होता है, फिर तालीम देते-देते, हमारी खोज बंद नहीं होती। लगातार सीखते रहने से कला के प्रति गंभीरता आती है। लेकिन, थोड़ा सीखकर, जो लोग गुरु बन जाते हैं, वह खतरनाक है। सच्चे कलाकार को हमेशा शागिर्द बने रहना चाहिए। आगे बढ़ने के लिए सीखना जरूरी है। ध्यान, एकाग्रता, लय, छंद में ‘सम’ हो जाना ही। सम यानी शून्य से ही एक नई शुरुआत होती है।

समारोह में परिवार परंपरा और गुरु शिष्य परंपरा की झलक बखूबी दिखी। बिरजू महाराज ने बैठक का भाव दिखाया। भाव मुद्राओं, हस्तकों, चेहरे और आंखों के जरिए एक-एक भाव को पेश करना, उनकी खासियत है। उन्होंने रचना ‘मैं ना मानूं बरजोरी पकड़ी कलाई’ और ‘छोड़ दे मोरी बइयां संवरिया’ का चयन किया था। उनके सुपुत्र व शिष्य दीपक महाराज ने बहुत मधुर सुर में रचनाओं को भाव प्रवणता से गाया।

महाराजजी ने उतने ही मनोयोग से नायिका और कृष्ण के भावों को निरूपित किया। दीपक महाराज ने लखनऊ घराने की बानगी को अपने नृत्य में पेश किया। उन्होंने शिव स्तुति से नृत्य आरंभ किया। तीन ताल में शुद्ध नृत्य को पिरोया। थाट, तिहाई, आमद, परण, चक्रदार तिहाई की प्रस्तुति खास रही। उन्होंने प्रभावकारी पैर के काम से अपनी प्रस्तुति को जानदार बना दिया। वहीं, रचना ‘जाने मैका सुनो सजनवा’ पर भाव को चित्रित किया। उनकी प्रस्तुति में परिपक्वता और नजाकत दिखी। बिरजू महाराज की एक अन्य शिष्या नीलिमा बेरी ने कुंवर श्याम की ठुमरियों पर भावों को दर्शाया। उन्होंने अपने नृत्य की शुरुआत कृष्ण वंदना से की। रचना ‘कस्तूरी तिलकम्ललाट पटले’ में कृष्ण के रूप को हस्तकों और भंगिमाओं से दिखाया।

कुंवर श्याम की ठुमरी ‘बाट चलत चुनरी रंग डारी’ पर राधा के भावों को दर्शाया। नीलिमा कई सालों से कलाश्रम के कलाकारों के साथ सामूहिक नृत्य में हिस्सा लेती रही हैं। पर, एकल प्रस्तुति में उनका आत्मविश्वास देखते बन पड़ा। कथक की इन प्रस्तुतियों में संगत कलाकारों में पखावज पर पंडित जयकिशन महाराज, तबले पर प्रांशु चतुरलाल, सारंगी पर गुलाम वारिस, गायन पर जकी खान, सितार पर सलीम खां। समारोह में दिल्ली घराने के उस्ताद इकबाल अहमद और इमरान खान ने गायन पेश किया। पंडित विश्वमोहन भट्ट, सलिल भट्ट, अदान खां, पंडित अतुल उपाध्याय व तेजस उपाध्याय ने अपने-अपने वाद्यों का वादन किया।

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