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बिहार का दही-चूड़ा भोज: राजनैतिक घरानों के लिए सियासी खेल तो लालू प्रसाद के कुनबे में मायूसी

असल में 2019 के लोकसभा चुनाव तक समां बनाए रखना सभी राजनैतिक दलों की मजबूरी है। वैसे बिहार में दही चूड़ा के भोज की अपनी खास अहमियत है। मगर दो साल से राजद कुनबे में मायूसी छाई है।

ये तस्वीर 14 जनवरी 2017 की है, तब लालू यादव की पार्टी बिहार में सत्ता में थी और उनके घर में धूमधाम से दही-चूड़ा पार्टी का आयोजन किया गया था। (Photo:PTI)

बिहार की राजनैतिक फिजां में दही चूड़ा चीनी के मिश्रण का भोज काफी मायने रखता है। यह भोज हरेक साल मकर संक्रांति यानि 14 जनवरी को राजनीति के माहिर व दल अपने अपने हिसाब से आयोजित करते है। बीते 2017 में मिश्रण का रंग बिल्कुल अलग था। राजद , जदयू और कांग्रेस (दही-चूड़ा-चीनी) एक साथ थी। मगर बीते साल से और इस दफा इनकी दशा और दिशा बदली है। सीटों के बंटवारे का सिरफुटववल महागठबंधन में दही चुड़ा खाने के बाद ही होगा। तो एडीए के घटक में भी कौन किस सीट पर लड़ेगा की खींचातानी भी मकर संक्रांति के बाद होनी है। अभी मकर संक्रन्ति तक दिन शुभ नहीं माना जाता। मसलन दही चुड़ा खाकर सितन की खिचड़ी बंटेंगी।

जानकार बताते है जदयू 1999 से यह आयोजन पटना में करता आ रहा है। बीते साल नाव हादसे की वजह से मकर संक्राति का भोज टाला गया था। तो अबकी राजद सुप्रीमो लालूप्रसाद के चारा घोटाला में सजा होने से जेल में बंद होने और उनकी बड़ी बहन के परलोक सिधार जाने की वजह से राजद कुनबे का भोज नहीं हुआ। अबकी लालूप्रसाद की जमानत अर्जी खारिज होने से लालू कुनबा मायूस है। वैसे लालूप्रसाद भी 1990 के बाद से ही दही चूड़ा का भोज अपने आवास पर देते रहे है। कांग्रेस भी आयोजन करती है। मगर इन दोनों जैसी भव्यता नहीं होती और न ही हरेक साल ऐसे भोज करने का कांग्रेस में रिवाज है।

अबकी दफा लोजपा के रामविलास पासवान भी 14 जनवरी को पटना पार्टी दफ्तर में जोरशोर से दावत का आयोजन कर रहे है। इसके लिए वे दो रोज पहले ही पटना पहुंच चुके है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को भी दावत का न्यौता दिया गया है। बताते है कि रामविलास पासवान 25 साल से यह आयोजन करते आ रहे है। अबकी दफा उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा एनडीए कुनवे से अलग है। मांझी का हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा भी नदारत है। मगर 2017 का आयोजन महागठबंधन के अगवा राजद सुप्रीमों लालूप्रसाद के लिए जितना उमंग भरा था उतना ही दो साल से संक्राति मायूसी भरी है। यहां बताना जरूरी है कि बीते दो साल पहले 10 सर्कुलर रोड के आवास पर हुए आयोजन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शरीक हुए थे। और छोटे भाई (नीतीश कुमार) को बड़े भाई (लालूप्रसाद) ने दही का टीका लगा महागठबंधन की अटूटता का संकेत दिया था। मगर यह यकीन टिकाऊ साबित नहीं हुआ। और महागठबंधन टूट गया। इसके बाद से लालूप्रसाद और उनके परिवार की मुश्किलें ज्यादा बढ़ गई।

जदयू का जलसा उनके प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह ने आयोजित किया है। जिसमें एनडीए के घटक दल समेत दस हजार लोग शरीक होने की उम्मीद है। भागलपुर जद(एकी) के जिला अध्यक्ष विभूति गोस्वामी बताते है कि खासकर जदयू और भाजपा के तमाम सांसद, विधायक और पार्षद को न्यौता भेजा गया है। कार्यकर्ता भी शरीक होंगे। जिसमें भागलपुर का कतरनी चुड़ा अपनी खुशबू बिखेरेगा। राजनीति के माहिर भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष नरेश चंद्र मिश्रा कहते है कि दरअसल बिहार में दही चूड़ा के ऐसे आयोजन कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने और सक्रियता बनाए रखने के लिए सभी दलों के लिए जरूरी है। यह दीगर है कि भागलपुर में ऐसे आयोजन की शुरुआत हो चुकी है। भाजपा के एमएलसी एनके यादव ने यह भोज दे दिया है। असल में 2019 के लोकसभा चुनाव तक समां बनाए रखना सभी राजनैतिक दलों की मजबूरी है। वैसे बिहार में दही चूड़ा के भोज की अपनी खास अहमियत है। मगर दो साल से राजद कुनबे में मायूसी छाई है। युवा राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष व भागलपुर के सांसद शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल कहते है यह क्षणिक बात है। राजद की ताकत और बढ़ी है। हम तेजस्वी यादव के नेतृत्व में काफी मजबूत हुए है। हमारे कार्यकर्ता एकजुट है।

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