भाजपा में चुप कराने की संस्कृति हावी

हिमाचल प्रदेश में उपचुनावों में चारों सीटें हार जाने के बाद प्रदेश की जयराम सरकार, उनके मंत्रियों और प्रदेश भाजपा की ओर से चार साल में अपनाए गए तौर तरीकों की समीक्षा के लिए राजधानी में भाजपा ने तीन दिवसीय कार्यसमिति की बैठक तो बुला ली है लेकिन इसमें असल में जमीनी हकीकत को लेकर मंथन होगा ही यह अभी तय नहीं है।

जय राम ठाकुर।

ओमप्रकाश ठाकुर
हिमाचल प्रदेश में उपचुनावों में चारों सीटें हार जाने के बाद प्रदेश की जयराम सरकार, उनके मंत्रियों और प्रदेश भाजपा की ओर से चार साल में अपनाए गए तौर तरीकों की समीक्षा के लिए राजधानी में भाजपा ने तीन दिवसीय कार्यसमिति की बैठक तो बुला ली है लेकिन इसमें असल में जमीनी हकीकत को लेकर मंथन होगा ही यह अभी तय नहीं है।

भाजपा के भीतर अब लोकतंत्र नाम की चीज ज्यादा नहीं रह गई है। अब तमाम निर्देश ऊपर से यानी संघ परिवार से पहले ही आ जाते हंै और सब कुछ उन्हीं निर्देशों के मुताबिक होता चला जाता है। भाजपा में पहले भीतर से आवाज मुखर होती थी, लेकिन अब वह आवाज अंदर ही अंदर कहीं गुम हो जाती है और गुबार उपचुनावों जैसे मौकों पर निकल जाता है। नतीजा चार-शून्य हो जाता है। अगर भाजपा के भीतर सुलग रही इस आग की आहट को कार्यसमिति की बैठक में भी सुना नहीं गया तो जाहिर है यह आहट 2022 के चुनावों में जरूर आलाकमान को अलग तरीके से सुना दी जाएगी।
यह प्रदेश भाजपा के बड़े नेता भी मानते हंै कि कुछ नेताओं ने सरकार व संगठन में सब कुछ हथिया लिया है। इनको आलाकमान से जुड़े चंद नेताओं की पूरी शह है। ऐसे में कार्यसमिति की बैठक में कुछ ठोस निकल आएगा इसकी उम्मीद कम ही है।

याद रहे उप चुनावों से पहले भी राजधानी ही नहीं, धर्मशाला में भी भाजपा कार्यसमिति की बैठकें हुई थी। इन बैठकों में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह भी मौजूद रहे थे और संघ के नुमाइंदे बीएल संतोष भी। इसके अलावा सरकार और संगठन को लेकर तमाम रपटें आलाकमान के सिरहाने पहुंचा दी गई थी। खुफिया एजंसियों की रपटें अलग से केंद्र सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री अमित शाह के पास पहले से रहती हंै। बावजूद इसके सरकार व संगठन के स्तर पर किसी भी तरह का कोई बदलाव देखने को नहीं मिला। उपचुनावों के हार जाने के बाद भी न तो सरकार व संगठन में बैठे नेताओं का दंभ कम हुआ और न ही इनके कदम जमीन पर पड़ते कहीं नजर आ रहे हैं।

आलम यह है कि उपचुनावों में हार की नैतिक जिम्मेदारी लेने तक की किसी ने जहमत नहीं उठाई। न तो सरकार के मुखिया ने और न ही संगठन के मुखिया ने। जाहिर है सियासी विनम्रता तक को हाशिए पर धकेल दिया गया है। सत्ता के दरबार में यह नई संस्कृति पनपी है। बेशक सरकार और संगठन मंहगाई को हार के लिए जिम्मेदार मानती हो, लेकिन शासन और प्रशासन चलाने में जिस तरह की कारगुजारियों को अंजाम दिया गया है उसे बेशक कार्यसमिति में शामिल होने वाले नेता नजरअंदाज कर दें, लेकिन जनता उसे नजरअंदाज नहीं कर पाएगी। उसने नजरअंदाज किया भी नहीं। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर ठेकेदारी तक और नौकरशाहों से लेकर पुलिस महकमे तक की कारगुजारियां प्रदेश की जनता ने चार सालों में देखी-समझी है। तभी तो मंडी जो मुख्यमंत्री का अपना जिला था वहीं पर ज्यादा कुछ नहीं हो पाया।

भाजपा के नेताओं का मानना है कि यह सब संभवत: कार्यसमिति की बैठक में सामने न आए। वहां पर अगर कोई आवाज उठाता है तो उसे कभी कोई मंत्री चुप करा देता है तो कभी कोई और। भाजपा में यह चुप कराने की संस्कृति ज्यादा ही हावी हो गई। चाहे वह फिर पार्टी के भीतर के नेता हो, मीडिया या जनता में से कोई और आवाज उठाने वाला हो। नई भाजपा सबको चुप करा देती है। तभी तो चार-शून्य होता है। पार्टी के नेताओं का मानना है कि अब 2022 में मतदाता ही बोलेंगे और वही सरकार व संगठन की असली समीक्षा करेंगे जैसी समीक्षा उन्होंने उप चुनावों में की है।

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