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बदला जमाना- अतर्रा की लाई मंडी: वह एक बाजार था, जो कभी गुलजार था

किसी जमाने में अतर्रा कस्बे में आचार्य विनोबा भावे, सुचेता कृपलानी, पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी, पद्म विभूषण निर्मला देशपांडे, पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता समेत देश के बड़े-बड़े गांधीवादी रहा करते थे। इन विभूतियों ने भूदान आंदोलन के दौरान लंबा प्रवास किया। लाई-चना, नमक खाकर पूरे बुंदेलखंड का दौरा किया।

देश की सबसे बड़ी लाई मंडी अतर्रा का बाजार और उसके उत्पाद।

वह एक जमाना था, जब बांदा जिले के अतर्रा की लाई मंडी में 130 भाटियों में रोज 150 कुंटल धान से लाई बनती थी। इसमें 1034 मजदूर लाई मंडी में कार्यरत थे। परंपरागत लाई का व्यापार एक साजिश के तहत तबाह कर दिया गया। इस बारे में सर्वोदय कार्यकर्ता उमा शंकर पांडे ने देश की सबसे बड़ी लाई मंडी के खत्म होने की पूरी दास्तान सिलसिलेवार ढंग से बताई।

वे बताते हैं कि वे भी क्या दिन थे, जब हजारों लोग अतर्रा पहुंचते थे। यहां एक बड़ा मोहल्ला है लाई गली। यहां पहले लाई बाजार था। किसी को भी प्रसाद के लिए, बीमारी के लिए, दवा के लिए, लढुईया बनाने के लिए, भेल पूरी खाने के लिए उच्च गुणवत्ता की देसी मुरमुरे लाई चाहिए होती थी तो अतर्रा की इसी मंडी से लेकर जाते थे। बड़े बड़े मंदिरों में प्रसाद के रूप में लाई ले जाना लोग शुभ मानते हैं चित्रकूट, मैहर, कालिंजर, प्रयागराज (इलाहाबाद), बनारस सहित भारत के प्रत्येक मंदिर में प्रसाद के तौर पर लाई, नारियल, शक्कर के इलायची दाना पवित्र माने जाते हैं। बीमारी में इसे सुपाच्य भोजन कहा गया है। धान से चावल बनता है और चावल से लाई बनती है।

देशी लाई की दुकानेॆ मात्र इसलिए बंद हो गईं कि चीन से लाई बनाने की मशीने भारत आ गईं। बड़ी-बड़ी मशीनों से बनी नकली चावल की सस्ती लाई से बाजार भरे पड़े हैं। ना तो किसी को मेलों में, धार्मिक स्थलों में इन नकली लाई को देखने की फुर्सत है और न ही अतर्रा की बंद पड़ी लाई भाटियों को चलाने की जरूरत महसूस हो रही है। किसी समय बैद्यों द्वारा बीमार व्यक्ति को दवा के रूप में लाई दी जाती थी। लाई-चना, लाई के लड्डू, गरीबों का प्रिय मिष्ठान था, आज भी है। हर गरीब व्यक्ति बाजार से अपने घर बच्चों के लिए बाजार से लाई-लडडू ले जाता है, क्योंकि सस्ते हैं। भारत में आपको कहीं भी लाई गली, लाई मंडी, भुंजवा मंडी नहीं मिलेगी। यह केवल बांदा की अतर्रा में है। लाई बनाने वाले पुराने लोगों ने अपना परंपरा का धंधा छोड़ दिया। राजनीतिक नेताओं ने कभी सरकार इनकी मदद नहीं करवाई।

अतर्रा की एकमात्र देसी भट्टी में लाई बनाने वाले जुगल किशोर गुप्ता बताते हैं कि एक जमाने में बड़े-बड़े व्यापारी यहां लाई खरीदने के लिए आते थे। अतर्रा की लाई उच्च गुणवत्ता वाली होती थी। अब मैं स्वयं इस धान का बीज 9 नंबर किसान को देता हूं। 4 गांव के किसान मात्र लाई बनाने वाली धान पैदा करते हैं। धान का रेट बढ़ गया। लकड़ी के रेट बढ़ गए हैं। जिस रेहू मिटटी से लाई बनती है उस मिट्टी का रेट ₹4000 प्रति ट्रैक्टर हो गया है।

बाजार में मशीनों द्वारा बनाई गई लाई से देसी लाई महंगी बनती है हर व्यक्ति सस्ता माल चाहता है देसी लाई पूरी तरीके से भारतीय पद्धति में बनती है। लकड़ी, बुरादा, मिट्टी नमक मजदूरी सब कुछ महंगा हो गया जो लाई सरकारी अस्पतालों में मंदिर मेला में बड़ी मात्रा में खरीदी जाती थी।

अब लोग नकली मशीनों द्वारा बनी गई लाई खरीदते हैं ना तो राजनेताओं को फुर्सत है, न ही सरकार को। न आज तक किसी ने पूछा कि लाई मंडी, जहां पहले हजारों व्यक्ति काम करते थे क्यों बंद हो गई, कैसे बंद हो गई, उन्हें कैसे चलाई जाए जिनकी लाई से लड्डू, भेलपुरी, पकवान, खीर बनती थी। बच्चे, बूढ़े, नौजवान, माताएं, बहनें सभी लोग दिन रात मेहनत कर अतर्रा के लाई मंडी को गुलजार किए हुए ते। व्यापारियों का बड़ा उद्योग था। वह अब चौपट हो चुका है। इस काम को करने वाले सब लोग पलायन कर गए। कोई जबलपुर, कोई सतना, कोई दिल्ली, कोई लखनऊ, कोई भोपाल चले गए। हंसराज दुला, शक्ति दीन, भुजा, कल्लू गुप्ता आदि लाई के बड़े व्यापारी थे।

किसी जमाने में अतर्रा कस्बे में आचार्य विनोबा भावे, सुचेता कृपलानी, पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी, पद्म विभूषण निर्मला देशपांडे, पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता सहित देश के बड़े-बड़े गांधीवादी रहा करते थे। इन विभूतियों ने भूदान आंदोलन के दौरान लंबा प्रवास किया। लाई चना, नमक खाकर पूरे बुंदेलखंड का दौरा किया। अतर्रा की लाई स्वास्थ्य की दृष्टि से सुपाच्य थी। देखते देखते यह व्यापार भी एक दशक में चौपट हो गया यदि प्रयास किया जाए तो इस व्यापार को बचाया जा सकता है।

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