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बिहार: जमीन के पेच में फंसा केंद्रीय विश्वविद्यालय

भागलपुर के जिलाधीश प्रणब कुमार बताते है कि दो सौ एकड़ के तीन भूखंड का चयन कर प्रस्ताव बना भेजा गया है। इनमें से जो भूखंड इस लायक समझा जाएगा उसे स्थांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हालांकि इस प्रस्ताव को भेजे भी दो महीने से ज्यादा बीत गए हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमा। (फोटो सोर्स नीतीश कुमार)

भागलपुर में प्रस्तावित केंद्रीय विश्वविद्यालय का मामला जमीन के पेच में फंस गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में पुरातत्व धरोहर विक्रमशिला की विश्व स्तर पर पहचान बनाने के ख्याल से वहां केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। इसके लिए पांच सौ करोड़ रुपए केंद्र सरकार ने आवंटित भी किए। मगर शर्त यह लगाई कि बिहार सरकार 500 एकड़ जमीन अपने स्तर पर दिलाए। बस इसी पेच में मामला लटका पड़ा है और तीन साल गुजर जाने के बाद भी कुछ नहीं हो पाया है।

भागलपुर के जिलाधीश प्रणब कुमार बताते है कि दो सौ एकड़ के तीन भूखंड का चयन कर प्रस्ताव बना भेजा गया है। इनमें से जो भूखंड इस लायक समझा जाएगा उसे स्थांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हालांकि इस प्रस्ताव को भेजे भी दो महीने से ज्यादा बीत गए हैं। अभी भी मामला राज्य सरकार के पास विचाराधीन है। ध्यान रहे कि इसी साल आठ फरवरी को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भागलपुर डिवीजन के विकास कामों की समीक्षा करने आए थे। इसमें कहलगांव के विधायक सदानंद सिंह ने यह मुद्दा उठाया तो जमीन मुहैया कराने में दिक्कत की बात सामने आई। मुख्यमंत्री ने कहा कि 500 एकड़ जमीन के मुआवजे के लिए 1500 करोड़ रुपए चाहिए। केंद्र सरकार जमीन दे दे, विश्वविद्यालय बिहार सरकार बनवा लेगी।

जाहिर है राज्य सरकार की नजर में मांगी गई 500 एकड़ जमीन बेमतलब है। फिर भी मुख्यमंत्री ने कहा था कि कम जमीन में केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए केंद्र सरकार को राजी किया जाएगा। उन्होंने जिलाधीश को इस बाबत जमीन का प्रस्ताव भेजने को कहा था। वैसे उस वक्त के जिलाधीश आदेश तितमारे के मुताबिक जमीन के तीन प्रस्ताव भेजे गए थे। ऐसे में कब और कैसे का सवालिया निशान लगा है। और विक्रमशिला के पुरातत्व अवशेष के अवलोकन से ही संतोष करना पड़ रहा है। इसी अवलोकन की कड़ी में बिहार के पूर्व राज्यपाल सतपाल मलिक भी फरवरी में ही यहां आए थे और ऐतिहासिक पुरातत्व धरोहर विक्रमशिला को देख गदगद हुए। वे बोले कि प्राचीन शिक्षा केंद्र रहे विक्रमशिला महाविहार स्थल की महत्ता को देखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई जाएगी। इसके गौरव को फिर से स्थापित करने के लिए हरेक स्तर पर कोशिश की जाएगी। बिहार के राज्यपाल बनने के बाद यह इनका पहला दौरा था। इसी क्रम में पत्रकारों से भीे उन्होंने बातचीत की थी।

उन्होंने कहा था कि प्राचीन भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में शामिल विक्रमशिला महाविहार के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व सामाजिक महत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। महामहिम मलिक ने कहा था कि मै विश्वास दिलाता हूं कि इस महाविहार के समग्र विकास के लिए भरसक मदद मिलेगी। कयोंकि हर दृष्टिकोण से यह स्थल महत्त्वपूर्ण है। साथ ही यहां पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इस सिलसिले में वे संबंधित एजेंसी को कहेंगे। लेकिन इस बीच, उन्हें जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया। ध्यान रहे कि बीते साल अप्रैल में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी विक्रमशिला आकर अपने को धन्य बताया था। उस वक्त उनके साथ राज्यपाल की हैसियत से रामनाथ कोविंद भी आए थे। यहां के लोगों को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री की घोषणा पर जल्द काम शुरू होगा। हालांकि देरी होने की वजह से कहलगांव और भागलपुर में अनशन, धरना, प्रदर्शन होने लगे हैं। विक्रमशिला मीडिया ग्रुप भी बना है जो तरह-तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

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