सोशल इंजीनियरिंग की आड़ में जातियों की गोलबंदी का राजनीतिक दांव

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी है। छोटी बड़ी सभी पार्टियों ने अपने मोहरे चलने भी शुरू कर दिए हैं।

Uttar Pradesh
अखिलेश यादव। फाइल फोटो।

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी है। छोटी बड़ी सभी पार्टियों ने अपने मोहरे चलने भी शुरू कर दिए हैं। चुनाव में अब सात महीने का फासला ही बचा है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इसी रविवार को लखनऊ गए तो थे सरकारी कार्यक्रम में। पर उन्हीं योगी आदित्यनाथ की सार्वजनिक रूप से पीठ थपथपा आए जिनसे नाराजगी के कारण उनके जन्मदिन पर उन्हें बधाई तक नहीं दी थी। अमित शाह ने न केवल अगली बार भी सत्ता में योगी की ही वापसी की भविष्यवाणी भी कर दी बल्कि उन्हें सूबे का अब तक का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री होने का प्रमाणपत्र भी दे डाला। बेशक नारायण दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा और कल्याण सिंह को सूबे के सफलतम मुख्य मंत्रियों में गिना जाता है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल में पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सात सांसदों को मंत्री बनाने के कदम को भाजपा ने विधानसभा चुनाव में भुनाने की रणनीति बनाई है। हालांकि पिछड़े वर्ग के एक मंत्री संतोष गंगवार को हटाया भी था। जो बनाए गए हैं, सभी राज्यमंत्री ठहरे। एक ब्राह्मण है तो तीन दलित और पिछड़े। दलित वोटों के लिए इस बार भी सियासी दलों में ज्यादा मारामारी नहीं है। वजह यही है कि इनमें तीन चौथाई जाटव हैं जो पूरी तरह मायावती के साथ लामबंद हैं। गैर जाटव जातियों बाल्मीकि, खटीक, पासी, धोबी, कोइरी आदि के लिए जरूर सारी पार्टियां दम लगा रही हैं। पर असली गोलबंदी पिछड़ों, अति पिछड़ों और ब्राह्मण वोटों को लेकर जारी है।

इस बार भाजपा और कांग्रेस को छोड़ बाकी सभी पार्टियों ने जातीय जनगणना की मांग अलग उछाल दी है। जातीय जनगणना अंगे्रजी राज में 1931 में हुई थी। हालांकि 2011 की जनगणना में भी जातीय आधार का ब्योरा सरकार के पास है। पर सरकार ने उसका खुलासा नहीं किया है। जनता दल (एकी) ने दिल्ली की अपनी कार्यकारिणी की बैठक में बाकायदा इस बाबत प्रस्ताव ही पारित कर दिया। सतीश मिश्र ने भी कह दिया कि बसपा तो शुरू से ही कहती रही है कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। अखिलेश यादव ने भी यह मांग उठाई है। इन सभी दलों को आर्थिक आधार पर कमजोर सवर्णों को भी 10 फीसद आरक्षण देने के भाजपा के फैसले से यह डर सता रहा है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर जारी दलितों और पिछड़ों के आरक्षण को भाजपा खत्म कर सकती है।

उधर सवर्णों में वैश्यों और राजपूतों की तरह ब्राह्मण मतदाता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण अभी मोटे तौर पर भाजपा के साथ दिखते हैं। यह बात अलग है कि सूबे की योगी सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियों को लेकर उनमें असंतोष है। इसी असंतोष को उभारने का अभियान बसपा की तरफ से सतीश मिश्र ने छेड़ा है। वे अयोध्या के बाद मथुरा में भी ब्राह्मण सम्मेलन कर ब्राह्मणों को 2007 की तरह बसपा से जुड़ने का निमंत्रण दे रहे हैं। जब उन्हें 403 में से पार्टी ने 80 टिकट दिए थे। बसपा के ब्राह्मण उम्मीदवारों में से 45 जीते भी थे। मंत्री पद भी आधा दर्जन से ज्यादा ब्राह्मणों के हिस्से आए थे। मिश्र ने तो फर्जी मुठभेड़ों में ब्राह्मणों की हत्या कराने तक का आरोप भाजपा और योगी सरकार पर लगाया है। भाजपा की तरह बसपा भी परोक्ष रूप से इस बार हिंदुत्व कार्ड खेलने के मूड में लग रही है।

उधर बसपा से अति पिछड़ी जातियों का मोह भंग हुआ है। इन जातियों के कई कद्दावर नेता बसपा छोड़कर या तो सपा में जा रहे हैं या भाजपा में। मुसलमान वोट के लिए कोई भी पार्टी आक्रामक नहीं है। हालांकि तस्वीर साफ है कि ये वोट इस बार सपा के साथ लामबंद होने की संभावना प्रबल है। मुसलमानों की इसी सियासी अनदेखी और उनके भीतर सक्षम नेतृत्व के अभाव को देख असददुदीन ओवैशी की एआइएमआइएम भी बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतारने के लिए तैयार है। यह बात अलग है कि सपा के नेता मुसलमानों को समझा रहे हैं कि बिहार में अगर मुसलमानों ने ओवैशी को वोट न दिए होते तो भाजपा-जद (एकी) की सरकार नहीं बनती।

अखिलेश यादव ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी के रालोद के साथ तालमेल जारी रखने का भी एलान कर दिया है। किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट मतदाता भाजपा से खफा है। जिसका संकेत पंचायत चुनाव के नतीजों में सामने आ चुका है।
पिछले चुनाव में रालोद को एक सीट पर सफलता मिली थी। छपरौली का एकमात्र पार्टी विधायक भी बाद में भाजपा में चला गया था। पर इस बार जयंत चौधरी को विधानसभा चुनाव से सियासी संजीवनी की आस है। भाजपा को जाट मतदाताओं का नुकसान तो उठाना पड़ ही सकता है, मुसलमानों और जाटों के बीच 2013 के मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद पैदा हुई खाई पट जाने का भी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

साइकिल सवारी के लिए अति पिछड़ों पर निगाहें

राजभर, बिंद, निषाद, मल्लाह, प्रजापति, नाई व कश्यप जैसी अति पिछड़ी जातियों को अपने साथ लाना अखिलेश यादव की रणनीति दिख रही है। हालांकि मल्लाह बिरादरी पर बिहार के मंत्री मुकेश सहनी की भी नजर है। बिहार में वे जद (एकी) के साथ हैं पर उत्तर प्रदेश में किसके साथ जाएंगे, अभी साफ नहीं है। इस बीच सूबे के विधानसभा अध्यक्ष रह चुके बसपा के कद्दावर नेता सुखदेव राजभर ने अखिलेश यादव को पत्र लिखकर अपने पुत्र कमलकांत राजभर का ख्याल रखने का आग्रह किया है।

इन दिनों अस्वस्थ चल रहे मायावती के विधायक होकर भी राजभर अखिलेश यादव की सार्वजनिक सराहना कर रहे हैं। वे आजमगढ़ के असरदार नेता हैं। अखिलेश यादव भी आजमगढ़ से ही लोकसभा सदस्य हैं। अखिलेश ने एलान किया है कि वे छोटे दलों को तो साथ लेंगे पर लोकसभा चुनाव की तरह बसपा से तालमेल नहीं करेंगे। लोधी, कुर्मी, शाक्य व मौर्या जैसी संपन्न और खेती करने वाली पिछड़ी जातियों के भाजपा से जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए ही अखिलेश ने अपना फोकस यादव और मुसलमानों के अलावा अति पिछड़ी जातियों पर केंद्रित किया है। अपने ब्राह्मण नेताओं के सहारे और परशुराम व जनेश्वर मिश्र का नाम लेकर ब्राह्मण मतदाताओं पर डोरे वे भी डाल रहे हैं। राजपूत तो इस बार योगी के कारण भाजपा के साथ ही दिख रहे हैं। कुल मिलाकर हर पार्टी जातिवाद की सियासत से दूरी का दम भर रही है पर सबकी गोलबंदी है जातियों को लेकर।

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