ताज़ा खबर
 

यूपी: स्वयंसेवकों की मदद से दुरुस्त की जाएगी बुनियादी शिक्षा!

स्वयंसेवकों को इसके लिए प्रमाणपत्र और प्रशस्तिपत्र भी दिया जाएगा। विज्ञापन में स्वयंसेवकों के साथ सेवानिवृत्त शिक्षकों को भी इस कार्य के लिए आवेदन के योग्य बताया गया है। ओमकार राणा कहते हैं कि यह एक तरह का अनूठा प्रयोग है जो जिलाधिकारी के आदेश के बाद निकाला गया है। यह एक सकारात्मक सोच है।

Author October 10, 2018 2:52 AM
बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस दौरान पांच हजार से अधिक लोगों के आवेदन आ चुके हैं। इनकी जांच का काम चल रहा है।

गजेंद्र सिंह

भगवान बुद्ध से जुड़े उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में बुनियादी शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए स्वयंसेवकों की मदद लेने का फैसला किया गया है। ये स्वयंसेवक बिना किसी शर्त और मानदेय के बच्चों को पढ़ाएंगे। यह अनूठा प्रयोग स्थानीय जिला प्रशासन की ओर से किया गया है ताकि लोग शिक्षकों के बिना चल रहे स्कूलों में आकर बच्चों को ज्ञान दे सकें। हालांकि इस बाबत आवेदन का विज्ञापन निकलने के बाद से ही यह पहल विवादों में घिर गई है। सोशल मीडिया पर भी इस विज्ञापन को साझा किया जा रहा है। 22 सितंबर से चार अक्तूबर तक आवेदन मांगे गए थे। बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस दौरान पांच हजार से अधिक लोगों के आवेदन आ चुके हैं। इनकी जांच का काम चल रहा है। दो से तीन माह में सत्यापन व अन्य प्रक्रियाओं के बाद स्वयंसेवक स्कूल में तैनात किए जाएंगे।

देवीपाटन मंडल के तहत आने वाला श्रावस्ती जिला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 170 किलोमीटर दूर है। जिले में 1280 परिषदीय विद्यालय हैं, जिनमें 2600 शिक्षक हैं। इन स्कूलों में 1316 शिक्षामित्र भी हैं। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 1.35 लाख से अधिक है। जिले में कुछ ऐसे विद्यालय भी हैं जिनकी हालत बेहद खराब है। पिछले दिनों जिले में आई बाढ़ में एक स्कूल के बह जाने की खबर भी स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई थी। स्वयंसेवकों की भर्ती के लिए जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी ओमकार राणा की ओर से 20 सितंबर को अखबारों में विज्ञापन जारी किया गया था। इसके तहत परिषदीय विद्यालयों में अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग देने के लिए मांगे गए आवेदन कुछ शर्तें दी गई हैं जिसमें लिखा है कि आवेदनकर्ता को अपना पूरा पता देना होगा। 18 साल से ज्यादा की उम्र के लोग ही इसके लिए आवेदन कर सकेंगे। मूल दस्तावेजों के साथ 10 रुपए के स्टॉम्प पेपर पर यह लिखकर देना होगा कि नियमितीकरण और मानदेय के साथ किसी तरह की धनराशि नहीं मांगेंगे।

स्वयंसेवकों को इसके लिए प्रमाणपत्र और प्रशस्तिपत्र भी दिया जाएगा। विज्ञापन में स्वयंसेवकों के साथ सेवानिवृत्त शिक्षकों को भी इस कार्य के लिए आवेदन के योग्य बताया गया है। ओमकार राणा कहते हैं कि यह एक तरह का अनूठा प्रयोग है जो जिलाधिकारी के आदेश के बाद निकाला गया है। यह एक सकारात्मक सोच है। इसके तहत भर्ती किए गए लोग आधे से एक घंटे तक बच्चों को पढ़ा-लिखा और सिखा सकते हैं।

कितना सही है यह कदम
श्रावस्ती के जिलाधिकारी दीपक मीणा बताते हैं कि इस प्रयोग के तहत ज्यादा लोगों को भर्ती नहीं किया जाएगा क्योंकि ज्यादा लोगों की निगरानी करना और उन्हें संभालना आसान नहीं होगा। इस पहल से केवल 30-40 लोग ही जुड़ेंगे और उनका पूरा सत्यापन कराया जाएगा। शिक्षामित्रों की तरह विवाद की स्थिति न बने इसलिए इनसे पहले ही शर्तों पर हस्ताक्षर करवा लिया जाएगा। राणा बताते हैं कि यह नितांत स्वैच्छिक कार्य है, इसलिए विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। जिले के सिरसिया ब्लॉक में एक सामाजिक संस्था ‘नन्ही कलियां’ नाम से एक कार्यक्रम भी चला रही है, जिसमें विद्यालय की कमजोर छात्राओं को स्कूल के समय के बाद पढ़ाया जाता है। जिलाधिकारी इसे भी ऐसा ही कार्यक्रम बता रहे हैं।

स्थायी तौर पर लोगों को जोड़ना ज्यादा बेहतर
लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग की प्रोफेसर अमिता बाजपेयी कहती हैं कि यह सोच तो अच्छी है, लेकिन ऐसे लोग भी तो मिलने चाहिए जो निस्वार्थ भाव से इस पहल से जुड़ना चाहते हों। अमिता कहती हैं कि शिक्षामित्रों की परिकल्पना भी गांव में स्कूलों को खाली होने से बचाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन आज उसका क्या हश्र हो गया। जो स्वयंसेवक पढ़ाने आएंगे उनकी जिम्मेदारी कैसे तय होगी यह भी एक बड़ा सवाल है।

विभाग के ही एक अन्य प्रोफेसर डॉ अरुण कुमार कहते हैं कि स्वयंसेवकों के साथ काम करना ज्यादा समय तक नहीं चल सकता क्योंकि जिन लोगों को स्वेच्छा से काम करना है वे सरकार की सहायता के बिना भी काम कर ही रहे हैं। इसलिए इससे अच्छा यह होगा कि योग्य लोगों को स्थायी रूप से जोड़ा जाए। प्रदेश स्तर पर शिक्षामित्रों के संगठन की अगुआई करने वाले दीनानाथ दीक्षित बताते हैं कि शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत केवल टीईटी पास लोग ही शिक्षण कार्य कर सकते हैं तो इस तरह के फैसले क्यों लिए जाते हैं जिसमें नियम-कायदे अलग हो जाते हैं। गांव के लोगों को अगर ऐसे शिक्षण कार्य से जोड़ेंगे तो स्थानीय स्तर पर राजनीति शुरू हो जाएगी। दीनानाथ दीक्षित इसे गलत कदम बताते हुए कहते हैं कि इस नेक काम से समाज को जोड़ना अच्छी बात है, लेकिन आप के पास जब स्टाफ है तो पहले उनसे काम लीजिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App