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चुनावी साल में याद आई ‘प्रतिद्वंद्वी’ की सालगिरह

राजनीति के जानकार धूमल के साथ जयराम की राजनीतिक दुश्मनी का एक पुराना किस्से भी अक्सर ही दोहराते हैं।

सुभाष मेहरा

हिमाचल में विधानसभा चुनाव के दरमियान किसी अनजाने खौफ से भयभीत जयराम ठाकुर की सरकार सोमवार को हमीरपुर में प्रेम कुमार धूमल के दरबार में दंडवत रही। मौका था धूमल की 50वीं वैवाहिक सालगिरह का और मंत्रियों की फ ौज लेकर आशीर्वाद लेने जयराम दिल्ली से सीधे धूमल और शीला धूमल के चरणों में नतमस्तक थे। अलबत्ता एक चौकीदार के तबादले को लेकर भूतकाल के मुख्यमंत्री धूमल की सिफ ारिश को रद्दी के टोकरे के हवाले करने वाले मुख्यमंत्री जयराम की उनसे अंदरूनी रार बहुत पुरानी है। जाहिर है, सालगिरह के जरिए धूमल की महफि ल के पुररौनक होने का भान होने के बाद जयराम ने धूमल के दरबार में सलाम पेश करने का यह ‘दूरदर्शी’ फै सला किया।

राजनीति के जानकार धूमल के साथ जयराम की राजनीतिक दुश्मनी का एक पुराना किस्से भी अक्सर ही दोहराते हैं। 2013 में सत्ता हाथ से चले जाने के बाद धर्मशाला में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम रोज नेता प्रतिपक्ष के नाते धूमल विपक्षी कक्ष में मीडिया में बतिया रहे थे। लिहाजा विदाई के हाथ जोड़कर रुख्सत होते वक्त विपक्षी विधायकों के बीच तमाम शिष्टाचार को दरकिनार कर जयराम तब धूमल को बिना मिले ही निकल लिए थे। जाहिर है, मिशन रिपीट के बज रहे भाजपाई नगाड़े के बीच नेतृत्व को लेकर नड्डा के एकाएक जयराम के एलान के बाद मुख्यमंत्री के सामने धूमल के साथ पत्नी शीला के भी पांव छूने की नौबत आ गई है।

असल में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान तमाम तरह के कई कयासों और लंबे इंतजार के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने प्रचार अभियान के बीच सिरमौर जिले के पच्छाद में पार्टी रैली के दौरान नेतृत्व को लेकर धूमल के नाम का एलान किया था, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाह से आगे जाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते छह महीने पहले ही नड्डा जयराम को पार्टी का चुनावी चेहरा घोषित कर चुके हैं। हालांकि प्रदेश के निचले इलाकों में भाजपा की अंदरूनी सेहत किसी से छिपी भी नही है। हालांकि पराजय के तीसरे रोज से सियासत में सक्रिय धूमल अभी विश्राम के लिए कतई तैयार नहीं और चुनावी जंग में उतरने के लिए उनकी दंडबैठकें जारी हैं।

इस बीच केंद्रीय आलाकमान ने कर्नाटक, उतराखंड, त्रिपुरा समेत चार प्रदेशों के मुख्यमंत्री हटा दिए, मगर कई एजंसियों, संघ और संगठन के सर्वेक्षणों में पार्टी की चिंताजनक हालत के बावजूद हमीरपुर के इस राजनीतिक परिवार का मटियामेट करने पर आमादा कुछ लोगों के मंसूबे जयराम सरकार की कुर्बानी से ज्यादा धूमल को ठिकाने लगाने के हैं। इस लिहाज से बगैर धूमल के दिसंबर की चुनावी जंग निपट गई तो इसके बाद भाजपा का सबसे बड़ा क्षत्रप खुद ब खुद दंगल से बाहर हो जाएगा।

कहा जा रहा है कि पार्टी के सर्वोच्च ओहदे पर बैठने के बाद मुख्यमंत्री के सिंहासन से दूर हुए नड्डा के इरादे भी प्रदेश वापसी को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर की नाकाबंदी करने के हैं। कहा जा रहा है कि धूमल परिवार की कीमत पर प्रदेश में नया नेतृत्व खड़ा करने की कसरत में जुटे नड्डा ने इसी हसरत के कारण पार्टी और सरकार की गिरती साख के बीच जयराम के नाम की घोषणा कर दी है।

नतीजन तिरछी नजर से देखने वाले जयराम वजीरों संग धूमल के दरवाजे पर थे। बहरहाल अनुराग की तासीर पर नजर रखने वाले लोग इस छोटे ठाकुर को बड़ा खुंदकी नेता मानते हैं। अब केंद्रीय संर्पकों के बूते अनुराग पार्टी मुखलिफ ों से कैसे निपटते हैं? यह देखना दिलचस्प होगा।

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