तेरी-मेरी मेट्रो

कहा जाता है कि देश में जो विकास होता है वो नागरिकों के कर से आए पैसे से होता है।

कहा जाता है कि देश में जो विकास होता है वो नागरिकों के कर से आए पैसे से होता है। लेकिन उसका विकास के लिए उपयोग करने पर राजनीतिक पार्टियों में श्रेय लेने की ऐसी होड़ मचती है जैसे विकास किसी गुप्त खजाने को खोज कर किया गया हो। अब दिल्ली मेट्रो के विस्तार को लेकर श्रेय लेने की छीना-झपटी ऐसे चल रही है जैसे दो बिल्लियों के बीच रोटी के बंटवारे को लेकर। दो दिन पहले मेट्रो ने ग्रामीण इलाकों को जोड़ लिया है। इस एक स्टेशन को लेकर अब दो पार्टियों के नेताओं के बीच जुबानी जंग छिड़ गई। जहां एक पार्टी इसे अपनी केंद्रीय योजना का हिस्सा बता रही है, वहीं राज्य की पार्टी इसे अपना प्लान बताकर प्रचार कर रही है। बेदिल को पता चला है कि यह सेवा नजफगढ़ जैसे दूरदराज के इलाकों को जोड़ रही है, जो एक बड़ा वोट बैंक है। इसलिए कोई पार्टी ‘तेरी-मेरी’ के झगड़े को खत्म कर अपना नुकसान नहीं करना चाहती।
राजनीति अपनी-अपनी
प्रदेश की सत्ता संभाल रही पार्टी को विपक्ष भले ही मुफ्त योजना देकर वोट बटोरने वाली पार्टी कहे लेकिन वे अपने आप को राजनीति बदलने वाली पार्टी करार देते हैं। अब अगले साल पांच राज्यों में चुनाव होने है। इन राज्यों में चुनाव को लेकर भाजपा व कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी भी अपना दमखम दिखाने के लिए पूरी कोशिश में जुटी है। अब भाजपा और कांग्रेस पर आम आदमी पार्टी उनके राज्यों में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर घेर रही है। पार्टी ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके चुटकी ली कि हम राजनीति बदलते हैं और भाजपा-कांग्रेस मुख्यमंत्री।
बेअसर हुई अपील
बीते दिनों ‘हिंदी दिवस’ के मौके पर दिल्ली पुलिस का गजब का हिंदी प्रेम दिखा। विभाग के मुखिया ने एक संदेश जारी कर अपील की कि हिंदी भाषा के प्रसार और प्रचार के लिए हर अधिकारी को अपने स्तर पर प्रयास करना चाहिए। इस अपील का असर भी हिंदी दिवस के मौक पर शाम होते-होते दिखने लगा। अंग्रेजी भाषा में हमेशा जानकारी साझा करने वाले जिला पुलिस के अधिकारियों ने हिंदी में भी जानकारी साझा की। दुर्भाग्यवश हिंदी के प्रति प्रेम और बड़े साहब की अपील का असर कुछ दिनों तक ही दिखा। कई जिलों के अधिकारियों ने फिर से वही पुराना तरीका अपना लिया और उसी ढर्रे पर चले गए। अब केवल अंग्रेजी भाषा में ही जानकारी साझा कर रहे हैं। हालांकि, कुछ जिला पुलिस के अधिकारी का हिंदी प्रेम दिख रहा है। पर देखने वाली बात यह है कि यह हिंदी प्रेम कब तक जारी रहता है। कई ऐसा ना हो कि निजाम बदलने के साथ अधिकारी भी अपने पुराने ढर्रे को अपना लें। हालांकि, यह तो भविष्य के गर्त में है।
दिल से ईमानदार
ईमानदारी दिल से आती है। उसे थोपा नहीं जा सकता। हालांकि ईमानदारी को लेकर लोगों की राय सरकारी विभागों को लेकर थोड़ी कड़वी होती है। इसमें पुलिस जोड़ दिया जाए तो लोग अपनी नाक और भौं भी सिकुड़ लेते हंै। लेकिन पिछले दिनों बेदिल ने दिल्ली परिवहन निगम की बस में जो देखा उसकी तो वहां बैठे हर आदमी ने तारीफ की। दरअसल, बेदिल को एक पुलिस का जवान बस में मिल गया। वे बावर्दी टिकट ले रहे थे। हर वर्दीधारी से ‘स्टाफ’ सुन-सुनकर कंडक्टर भी उनके ऊपर ध्यान नहीं देते हैं तो ऐसे में किसी पुलिसकर्मी को टिकट लेते देख उससे रहा नहीं गया और बोल पड़ा, साहब-आप दिल्ली पुलिस में हैं। तो उस जवान ने भी डटकर कहा कि हां मैं दिल्ली पुलिस में हूं और ईमानदारी की खाता हूं। मुझे फोकट का सफर अच्छा नहीं लगता। तभी पीछे से किसी ने उन्हें शाबाशी देते हुए कहा-‘जरूरत से ज्यादा ईमानदार हूं मैं, इसलिए सबकी नजरों में गुनहगार हूं मैं।’
बिन मेहनत फल
वैसे तो राजनीतिक पार्टियां चुनाव आता देख अपनी विरोधी पार्टियों को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहती जिससे उन्हें कोई मुद्दा मिले। लेकिन दिल्ली में तो सत्तारूढ़ पार्टी को बिना मेहनत के जैसे फल मिल गया। निगम चुनाव से पहले भाजपा ने अपने तीनों निगमों से एक-एक पार्षद को छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। निष्कासन भी ऐसे मुद्दे पर कि विरोधी दलों को चुनाव मुद्दा मिल गया। दरअसल, इन तीनों भाजपाई पार्षदों को क्षेत्र में उगाही, भ्रष्टाचार की एक के बाद एक आ रही शिकायतों के बाद निष्कासित किया गया है। निगम में विपक्ष के एक पार्षद ने चुटकी ली कि अब मुद्दे ढूंढने नहीं पड़ेंगे पार्टियां खुद मुद्दे दे रही हैं।
जांच की आंच
दिल्ली से सटे नोएडा में सुरपटेक बिल्डर की एमराल्ड कोर्ट परियोजना मामले पर चल रही एसआइटी की जांच से प्राधिकरण के विभागों में हर कर्मचारी और अधिकारी सकते हैं। कब किसके नाम की पर्ची सामने आ जाए कोई भरोसा नहीं। अभी तक मामला केवल नियोजन विभाग से जुड़ा माना जा रहा था लेकिन अब इंजीनियरिंग से लेकर उद्यान विभाग के अधिकारी भी लपेटे में आ रहे हैं। परियोजना में किस-किस ने अपने हाथ जलाएं हैं इसको लेकर अब विभागों में कानाफूसी शुरू हो गई है। मामला इतना गंभीर है कि लोग अपना नाम आने से पहले ही दस्तावेजी काट तैयार कर लेना चाहते हैं ताकि आरोपों से बच सकें।
हिंदी की अनदेखी!
लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले निर्वाचन आयोग के निर्देश पर दिल्ली चुनाव अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय में बना ‘स्थायी मीडिया सेल’ में हिंदी की अनदेखी इन दिनों मीडिया वालों के बीच चर्चा का केंद्र बनी हुई है। बीते दिनों निर्वाचन आयोग के निर्देश पर दिल्ली सहित सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के सभी सीईओ कार्यालयों में स्थायी मीडिया सेल स्थापित करने का काम शुरू हुआ। दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी ने तुरंत इस पर अमल किया। स्थायी मीडिया सेल बना दी गई। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी को इसका जिम्मा भी दे दिया गया। सात सितंबर से 17 सितंबर तक दनादन कई प्रेस रिलीज जारी हुई। लेकिन केवल अंग्रेजी में! यहां तक कि सितंबर में जब सभी सरकारी महकमों में हिंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है, तब भी एक भी प्रेस रिलीज हिंदी में जारी नहीं की गई। कहना न होगा कि 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ और एक सितंबर से 15 सितंबर तक हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। किसी ने ठीक ही कहा-चुनाव आयोग का उद्देश्य तबतक पूरा नहीं हो सकता तब तक मीडिया सेल में हिंदी और स्थानीय भाषाओं की अनदेखी यहां खत्म न हो। चौथा स्तंभ की मजबूती की यह पहल अपने मूल उद्देश्य में तब तक कामयाब नहीं होगा जब तक वहां अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी व राज्यवार भाषाओं को तरजीह न मिले।
मौसम की चाल
दिल्ली में बारिश की खबरों की सटीकता को लेकर इस बार भी मौसम विभाग चूका। इसक ो लेकर विभाग अपने को बचाने के लिए -मौसम बेइमान, जुमले का सहारा लेता रहा है। ठीकरा मौसम के सिर ही फूटता, लेकिन विभाग अपनी सूचना प्रणाली में देने वाली विविध सूचनाओं में तालमेल भी नहीं कर पाता। हालत ये है कि हवा का रुख न केवल दिल्ली का मौसम बदल देता है बल्कि मौसम विभाग की वेबसाइट पर भी असर डालता है। हुआ यूं कि एक ही वेबसाइट के अलग-अलग खिड़कियों में दी जाने वाली सूचनाएं भी एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं। एक दिन खबरनवीस ने इसी को लेकर एक अधिकारी से सवाल दाग दिया। अधिकारी महोदय भी मौसमी मिजाज को भांपते हुए बोले ‘ऐसा है कि हम एक खिड़की पर सूचना डालते हैं और दूसरी तक पहुंचते-पहुंचते हवा के रुख से मौसम चाल बदल लेता है। बेदिल ने किसी खबरनवीस ने सुना आजकल मौसम विभाग भी मौसम की तरह ही रंग बदलता है।
-बेदिल

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