आप की एकतरफा जीत से कांग्रेस में भूचाल, शीला दीक्षित ने चुनाव प्रचार की रणनीति पर उठाए सवाल

मनोज मिश्र दिल्ली विधानसभा के मध्यावधि चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की हुई एकतरफा जीत के बात विरोधी दलों -कांग्रेस और भाजपा में भूचाल आ गया है। भाजपा के कम असरदार नेता खुल कर बोलने के लिए आगे आने लगे हैं तो दूसरी ओर दिल्ली में 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने […]

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शीला दीक्षित ने अजय माकन से लेकर प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह की चुनाव में भूमिका पर सवाल उठाएं।

मनोज मिश्र

दिल्ली विधानसभा के मध्यावधि चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की हुई एकतरफा जीत के बात विरोधी दलों -कांग्रेस और भाजपा में भूचाल आ गया है। भाजपा के कम असरदार नेता खुल कर बोलने के लिए आगे आने लगे हैं तो दूसरी ओर दिल्ली में 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने चुनाव प्रचार की रणनीति और उसमें लगे नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाकर कांग्रेस में भी हंगामें की शुरुआत कर दी है। दीक्षित के बयान से चुनाव अभियान समिति के प्रमुख रहे अजय माकन से लेकर प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह की चुनाव में भूमिका पर सवाल उठा दिया। इस पर माकन ने अपनी सफाई दी।

साथ ही प्रदेश अध्यक्ष ने सफाई में यह दी कि वे दीक्षित से मिल कर यह जानना चाहेंगे कि इससे अधिक कैसे सक्रिय रहा जा सकता है। उन्होंने अजय माकन से मतभेद के आरोप को गलत बताया। सिंह ने कहा कि उन्होंने चार सौ सभाएं कीं। अनुकूल नतीजे न निकलने पर हर स्तर पर समीक्षा कर पार्टी को ज्यादा मजबूत करने के प्रयास किए जाएंगे। चुनाव नतीजों के बाद माकन और प्रभारी पीसी चाको ने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी।

कभी दीक्षित के करीबी और सालों से उनके विरोधी अजय माकन की हैसियत पार्टी नेतृत्व में काफी बड़ी हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष उनके बेहद करीबी थे। कहा जा रहा था कि वे चाहते थे कि प्रचार अभियान की बागडोर माकन को सौंपी जाए।

कांग्रेस में किसी को भी मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की परंपरा नहीं रही है। दूसरे, जो हालात हैं उसमें पार्टी के बेहतर करने की उम्मीद तो की जा सकती है कांग्रेस को सत्ता की दौड़ में नहीं माना जा सकता है। नाम तय होने से पहले ही दीक्षित ने एक निजी चैनल से बातचीत में कह दिया कि किसी को बहुमत न आने पर कांग्रेस तो भाजपा के साथ नहीं जाएगी, आप के साथ मिल कर सरकार बना सकती है। पूरी बातचीत में उन्होंने कहीं भी आप का समर्थन नहीं किया था। लेकिन उसी को आधार बनाकर प्रदेश के नेताओं ने दीक्षित को प्रचार अभियान की कमान देने का विरोध किया। दीक्षित पूरे चुनाव प्रचार में गिनती के इलाकों में गईं और ज्यादातर समय निजामुद्दीन के फ्लैट में रहीं। चुनाव में वे वहीं गईं, जहां उम्मीदवार ने उन्हें बुलाया।

पार्टी के नेताओं ने शीला दीक्षित को कहीं नहीं बुलाया। उन्हें कार्यक्रमों की सूचना तक नहीं दी गई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पहली फरवरी की बदरपुर की सभा में उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष के कहने पर बुलाया गया था लेकिन उसमें उन्हें बोलने तक का मौका नहीं दिया गया। लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं दीक्षित अपने ही लोगों की चुनाव में उपेक्षा से आहत हैं। उनका कहना था कि चुनाव का संचालन ही ठीक नहीं रहा। जिन नारों का सहारा चुनाव में लिया गया, उनको जनता ने स्वीकार नहीं किया। खुद प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह के उम्मीदवार घोषित होने के बाद चुनाव नहीं लड़ने के फैसले का भी लोगों में गलत असर गया। पार्टी नेतृत्व को चुनाव की विफलता के बारे में बताने के सवाल पर दीक्षित का कहना था कि पार्टी नेतृत्व खुद आकलन कर ही है। आगे उन्हें पार्टी की ओर से जो भूमिका दी जाएगी, वैसा वे करने को तैयार हैं लेकिन 24.50 फीसद के औसत से 9.7 पर आने का संकेत कम खतरनाक तो नहीं है।

2013 के विधानसभा चुनाव में महज आठ सीट लेने वाली कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में अपने सारे दिग्गजों को चुनाव मैदान में उतारा। बावजूद इसके कांग्रेस महज 15 फीसद वोट ही हासिल कर पाई। इस चुनाव में तो वह रसातल में पहुंच गई है। कांग्रेस को न केवल एक भी सीट नहीं आई बल्कि 70 में से केवल आठ जगह ही जमानत बचा पाई। 30 से ज्यादा उम्मीदवारों को दस हजार से कम वोट मिले। इसमें कई-कई बार चुनाव जीतने वाले कांग्रेस के अनेक दिग्गज शामिल हैं।

इस तरह के नतीजे कांग्रेस के दिल्ली की राजनीति में लंबे समय तक हाशिए पर जाने का खतरा हो गया है। कांग्रेस का यह हाल एक दिन में नहीं हुआ और पार्टी हाई कमान के स्तर पर इस हालात को बदलने का उपक्रम होता भी नहीं दिखा। पार्टी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने कुल तीन सभा और रोड शो करके अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली। अभी तक बड़े पैमाने पर इन नतीजों की समीक्षा होने की जानकारी नहीं मिली है। अलबत्ता प्रभारी महासचिव पीसी चाको, अजय माकन और अरविंदर सिंह ने चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की थी।

यह हाल कांग्रेस का एक दिन में नहीं हुआ है। शीला दीक्षित विरोधी माने जाने वाले रामबाबू शर्मा के 2007 में निगम चुनाव की हार के बाद हटने से जय प्रकाश अग्रवाल प्रदेश अध्यक्ष बने। 2008 के विधानसभा चुनाव में अग्रवाल और दीक्षित में गजब का तालमेल दिखा और कांग्रेस अप्रत्याशित तरीके से लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीत गई।

2009 के लोकसभा चुनाव में अग्रवाल दिल्ली के सबसे पिछड़े दिल्ली उत्तर पश्चिम से उम्मीदवार क्या बने, उनकी दीक्षित से सीधी लड़ाई शुरू हो गई। लड़ाई में कई बार मर्यादाओं का खुलेआम उल्लंघन हुआ और हाई कमान मूक दर्शक बना रहा। सरकार और संगठन के बीच की संवादहीनता ने ही नए दल आम आदमी पार्टी (आप) को मजबूत किया, जिसने महज दो विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हाशिए पर ला दिया। 2013 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पूरी पार्टी हताशा में आ गई थी। दिसंबर में नए बने प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह ने प्रदेश की कमेटी भंग करके सभी नेताओं को एक साथ करने की कोशिश की। वह कमेटा आज तक नहीं बनी। प्रदेश अध्यक्ष ने पत्रकारों को बताया कि जल्दी ही नई कमेटी बन जाएगी।

लोकसभा चुनाव में वैसे तो कांग्रेस के वोट घट कर सबसे निचले औसत पर आ गए और इससे माहौल फिर बिगड़ने लगा। उसी दौरान दिल्ली में कांग्रेस के कुछ विधायकों के सहयोग से भाजपा और आप के नेता सरकार बनाने लगे। सरकार तो नहीं बनी लेकिन कांग्रेस में नई गुटबाजी शुरू हो गई। केरल के राज्यपाल पद को छोड़ कर लौटी शीला दीक्षित को बागी नेता पार्टी की कमान देने की मांग करने लगे और जो प्रदेश अध्यक्ष और उनके लोग दीक्षित के करीबी थे, वे विरोधी हो गए। दीक्षित ने चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी लेकिन वे चुनाव प्रचार के लिए तैयार हैं।

अरविंदर सिंह के लिए भी सुविधाजनक होता कि दीक्षित के पास चुनाव प्रचार की कमान होती। एक कांग्रेस दिल्ली की अपनी सरकार की 15 साल की उपलब्धियों पर चुनाव लड़ रही है, जो दीक्षित की अगुआई में ही हासिल हुई थी। यह भी तय-सा था कि दीक्षित किसी रूप में भी मुख्यमंत्री की उम्मीदवार नहीं होती, दूसरे उससे प्रदेश अध्यक्ष की अहमियत अपनी जगह बनी रहती।

नतीजे तब भी शायद इसी तरह के होते लेकिन माहौल अलग होता। अब तो कांग्रेस को एक साथ कई मोर्चों पर मुकाबला करना होगा। यह चुनौती आसान नहीं है। इसमें हर स्तर के नेता और कार्यकर्त्ता को शामिल करना पड़ेगा लेकिन जो सवाल पूर्व मुख्यमंत्री दीक्षित ने उठाए हैं उससे नया ही विवाद शुरू हो जाने का खतरा भी है।

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