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तमिलनाडुः आदिवासियों से लेकर ट्रांसजेंडर, जानिए कैसे प्रोजेक्ट मोमेंटम गरीब तबके तक पहुंचा रहा कोविड वैक्सीन

जनार्दन कौशिक की इस रिपोर्ट के मुताबिक ये लोग वैक्‍सीन से बचने के ल‍िए जंगलों में छ‍िप जाते थे और तरह-तरह के बहाने बनाते थे। इन्‍हें टीका लेने के ल‍िए मनाना काफी चुनौतीपूर्ण था।

तमिलनाडुः आदिवासियों से लेकर ट्रांसजेंडर, जानिए कैसे प्रोजेक्ट मोमेंटम गरीब तबके तक पहुंचा रहा कोविड वैक्सीन
प्रोजेक्ट मोमेंटम के तहत लोगों को जागरूक करती हेल्थ वर्कर। (एक्सप्रेस फोटो)

कोविड 19 का प्रकोप बढ़ने के बाद सरकार ने जब वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरू किया तो तमिलनाडु में उसे सबसे ज्यादा परेशानी हुई। हाशिए पर मौजूद समुदाय वैक्सीन से बचने के लिए जंगलों में जा छिपते थे। वो हेल्थ वर्करों से पैसे की डिमांड भी करते थे। हालांकि कोरोना का प्रकोप 2022 में पहले से कम है लेकिन इन गरीब लोगों को डर था कि वैक्सीन लेने से कहीं वो बीमारी की चपेट में न आ जाए या फिर इससे उनकी मौत न हो जाए।

इस तरह के लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए मोमेंटम रूटीन इम्युनाइजेशन ट्रांसफारमेशन एंड इक्विटी (M-RITE) प्रोजेक्ट को भारत में जॉन स्नो इंडिया प्रा. लि. ने लागू किया है। USAID का इसे सपोर्ट है। भारत सरकार ने भी प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी दी है। प्रोजेक्ट का ध्येय सरकार की उन लोगों तक पहुंचने में सहायता करना है जो वैक्सीन लेने से हिचकते हैं। हाशिए पर मौजूद इन लोगों को देश के 18 सूबों में वैक्सीन दी जानी है।

सूत्रों का कहना है कि आशा और आंगनवाड़ी वर्करों की मशक्कत के बाद भी ये लोग वैक्सीन लेने से हिचक रहे हैं। उन लोगों तक पहुंचने के लिए ज्यादा से ज्यादा हाथ जुटाने के लिए सरकार ने M-RITE को प्रोजेक्ट से जोड़कर योजना बनाई है। प्रोजेक्ट के एक अधिकारी पी कबीला का कहना है कि उन्हें ये देखना है कि कौन से लोगों ने वैक्सीन की पहली या दूसरी डोज नहीं ली है।

covid vaccination in Tamilnadu
गांवों में जागरूकता फैलाने के लिए डोर टू डोर कैंपेन चलाया जा रहा है। (एक्सप्रेस फोटोः गोकुल सुब्रमण्यम)

कूथांदवर के मंदिर उत्सव से ट्रांसजेंडरों पर निशाना

उनका कहना है कि ट्रांसजेंडरों में जागरूकता पैदा करने के लिए फरवरी में इस प्रोजेक्ट को Kallakurichi से शुरू कराया गया। कूथांदवर के मंदिर उत्सव को इसके लिए चुना गया। इसके लिए ऐसे लोगों की सहायता ली गई जो ट्रांसजेंडरों को समझते हैं। उनके जरिए उन लोगों तक पहुंच बनाई गई। उनका कहना है कि ये लोग उत्सव के दौरान शराब के साथ दूसरे ड्रग्स भी लेते हैं। उन्हें डर था कि वैक्सीन लेंगे तो शौक पूरे नहीं होंगे।

LED स्क्रीनों के साथ 4 हजार हैंडबिलों के जरिये इन लोगों को समझाया गया कि वो अगर हारमोनल टेबलेट लेते भी हैं तो उन्हें वैक्सीन लेने से कोई खतरा नहीं है। कूवागम पंचायत के अध्यक्ष नागालक्ष्मी मुरुगन का कहना है कि मंदिर उत्सव में 50 हजार से ज्यादा ट्रांसजेंडर आते हैं। 18 दिनों के उत्सव के आखिरी दो दिनों में 15 ट्रांसजेंडरों को वैक्सीन की डोज दी गई। उत्सव के दौरान इन लोगों में जागरूकता पैदा करने के तमाम प्रयास हुए।

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ट्रांसजेंडरों में जागरूकता पैदा करने के लिए फरवरी में इस प्रोजेक्ट को Kallakurichi से शुरू कराया गया। कूथांदवर के मंदिर उत्सव को इसके लिए चुना गया। (एक्सप्रेस फोटोः गोकुल सुब्रमण्यम)

40 साल की ट्रांसजेंडर अंबिका का कहना है कि वो पहले समझती थी कि वैक्सीन लेने से नुकसान है। लेकिन अब वो दोनों डोज ले चुकी है। उसने दूसरे सदस्यों को भी इस बारे में बताया है। उसका कहना है कि लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। कबीला कहते हैं कि जून तक उन्होंने 16 हजार पांच सौ लोगों को वैक्सीन दी। इनमें बंजारों के साथ ट्रांसजेंडर और आदिवासी शामिल हैं। फिलहाल अभी तक 25 हजार 582 लोगों को वैक्सीन दी जा चुकी है।

बंजारे नहीं तैयार होते वैक्सीन के लिए

प्रोजेक्ट से जुड़े लोग मानते हैं कि सबसे ज्यादा कठिन काम बंजारों को वैक्सीन लेने के लिए तैयार करना है, क्योंकि ये लोग ऐसी जगहों पर जाकर छिप जाते हैं जहां इन्हें तलाश करना मुश्किल होता है। प्रोजेक्ट ऑफिसर सरस्वती का कहना है कि इन्हें वैक्सीन देने के लिए पहले नरीकरावा कालोनी से शुरुआत की गई। यहां तकरीबन 70 बंजारे रहते हैं। उनके मुखिया से संपर्क करके बंजारों को वैक्सीन देने का प्रोग्राम बनाया गया। पहले प्रयास में 15 ऐसे लोगों को वैक्सीन की डोज दी गई, जो ज्यादा हिचक रहे थे।

48 साल की राधा का कहना है कि वो पहले वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट महसूस करती थीं। लेकिन अब उन्हें कोई परेशानी नहीं है। वो दूसरी डोज ले चुकी हैं। उनका कहना है कि टीवी पर देखा कि जो वैक्सीन ले चुके हैं उनकी भी कोरोना से मौत हो रही है तो वो घबड़ा गई थीं। 58 साल की लता के भी ये ही कहना है।

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बंजारों को वैक्सीन के लिए तैयार करने के लिए नरीकरावा कालोनी से शुरुआत की गई। (एक्सप्रेस फोटोः गोकुल सुब्रमण्यम)

आदिवासियों को वैक्सीन के नाम से ही चिढ़

प्रोजेक्ट के ऑफिसर एजुमलाई का कहना है कि सबसे ज्यादा कठिन काम आदिवासियों को वैक्सीन देने का था। कालवर्यान हिल तकरीबन 171 गांव हैं। इन लोगों को भरोसे में लेना सबसे ज्यादा मुश्किल था। उनका मानना है कि वो पहाड़ी इलाके में रहते हैं तो उन्हें कोविड का खतरा कैसा। बुजुर्गों का मानना था कि अब जिंदगी ही कितनी बची है जो कोरोना उन्हें मारेगा। लेकिन सिलसिलेवार तरीके से इन लोगों को समझाया गया कि वैक्सीन के साथ उसका सर्टिफिकेट इनके लिए कितना जरूरी है।

USAID and Momentum

Disclaimer: मोमेंटम रूटीन इम्युनाइजेशन ट्रांसफारमेशन एंड इक्विटी प्रोजेक्ट को भारत में जॉन स्नो इंडिया प्रा. लि. ने लागू किया है। USAID का इसे सपोर्ट है। भारत सरकार ने भी प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी दी है। प्रोजेक्ट का ध्येय सरकार की उन लोगों तक पहुंचने में सहायता करना है जो वैक्सीन लेने से हिचकते हैं। हाशिए पर मौजूद इन लोगों को देश के 18 सूबों में वैक्सीन दी जानी है। इसके लिए स्वयं सेवी संगठनों से तालमेल कर प्रोग्राम को आगे बढ़ाया जा रहा है। (विज‍िट करें: https://usaidmomentum.org/)

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First published on: 28-09-2022 at 05:37:58 pm
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