Swami Avimukteshwaranad Saraswati News: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और भारतीय जनता पार्टी के बीच तनाव अब बढ़ गया है। उनके समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व वाली यूपी सरकारों के साथ-साथ केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली यूपीए सरकार के साथ भी मतभेद रहे थे।

पिछले हफ्ते स्वामी सरस्वती प्रयागराज में 11 दिनों के धरने के बाद वाराणसी में अपने मठ लौट आए। उन्होंने यह धरना प्रयागराज में 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर त्रिवेणी संगम में स्नान करने से कथित तौर पर स्थानीय प्रशासन द्वारा रोके जाने के विरोध में दिया था। उनसे प्रयागराज मेला अथॉरिटी ने शंकराचार्य की उपाधि के इस्तेमाल के संबंध में पूछताछ की थी।

माघ मेले से लौटने के दो दिन बाद 30 जनवरी को स्वामी सरस्वती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गौ माता को राज्य माता घोषित करने और गौमांस के निर्यात को रोकने के लिए 40 दिन का अल्टीमेटम दिया। सरस्वती ने कहा कि माघ मेले का विवाद खत्म हो चुका है और अगले साल के मेले में ही इस पर चर्चा होगी। उन्होंने आगे कहा कि अब मुख्यमंत्री की बारी है कि वे उनकी मांगों को पूरा करें और हिंदू होने का प्रमाण दें।

कौन हैं अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?

56 साल के सरस्वती यूपी के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव के रहने वाले हैं। उनका मूल नाम उमाशंकर पांडे है। वह पढ़ाई के लिए गुजरात चले गए जहां वह द्वारका शारदापीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के संपर्क में आए जिन्होंने उन्हें काशी (वाराणसी) में संस्कृत का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। वाराणसी में पढ़ाई के दौरान सरस्वती ने छात्र राजनीति में प्रवेश किया। वे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में छात्र संघ के उपाध्यक्ष के रूप में एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुने गए और बाद में एबीवीपी के उम्मीदवार के तौर पर इसके अध्यक्ष बने। 2000 में उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली और उन्हें एक नया नाम मिला, आनंदस्वरूप। 2003 में उन्हें संन्यास दीक्षा मिली और उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नाम मिला।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक 12 सितंबर 2022 को पूरा हुआ। यह स्वरूपानंद सरस्वती के देहांत के एक दिन बाद था। अविमुक्तेश्वरानंद के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी योगिराज सरकार ने कहा, “स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की लिखित इच्छा के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिश पीठ का शंकराचार्य और सदानंद सरस्वती को द्वारका पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया।” उन्होंने आगे कहा कि स्वरूपानंद सरस्वती के देहांत के 24 घंटे के अंदर ही यह राज्याभिषेक पूरा किया गया क्योंकि पीठ को खाली नहीं छोड़ा जा सकता था।

मेला प्रशासन ने जारी किया था नोटिस

संगम में मौनी अमावस्या स्नान को लेकर चल रहे विवाद के बीच, माघ मेला अथॉरिटी ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए स्वामी सरस्वती को नोटिस जारी कर उनसे यह स्पष्टीकरण मांगा है कि वे शंकराचार्य उपाधि का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। 19 जनवरी को जारी अपने नोटिस में मेला अथॉरिटी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक दीवानी अपील के बारे में बताया। नोटिस में कहा गया कि चूंकि याचिका पर अभी तक कोई और आदेश पारित नहीं हुआ है, इसलिए जब तक सुप्रीम कोर्ट इस अपील का निपटारा नहीं कर देता या अभिषेक के संबंध में कोई और आदेश पारित नहीं कर देता, तब तक किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में अभिषेक नहीं किया जा सकता।

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इसके जवाब में स्वामी सरस्वती की टीम ने कहा कि वे मेला अथॉरिटी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे और उस पर शंकराचार्य और उनके शिष्यों की सदियों पुरानी परंपराओं में दखल देने का आरोप लगाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले पर योगिराज सरकार ने कहा, “स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने पहले स्वरूपानंद सरस्वती के ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में राज्याभिषेक को चुनौती दी थी और बाद में उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद जी के राज्याभिषेक को चुनौती दी, लेकिन उनकी हालिया याचिका पर कोई अंतिम आदेश नहीं आया है।”

पहले की सरकारों से भी रहे टकराव

स्वामी सरस्वती एक मुखर संत रहे हैं। वह अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग सरकारों की आलोचना करते हुए बयान देकर अक्सर सुर्खियों में रहते थे। जनवरी 2025 में प्रयागराज के महाकुंभ मेले में हुई भगदड़ के मद्देनजर सरस्वती ने इस घटना के लिए आदित्यनाथ सरकार को दोषी ठहराया था। इसमें करीब 30 लोगों की मौत हो गई थी। जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर के अभिषेक से पहले, अविमुक्तेश्वरानंद ने न केवल समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया, बल्कि निर्माणाधीन मंदिर के लिए अभिषेक समारोह आयोजित किए जाने पर आपत्ति भी जताई।

एक साल पहले उन्होंने उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप लगाया था। इसे उन्होंने घोटाला करार दिया था। अखिलेश यादव ने स्वामी सरस्वती से फोन पर बात कर माघ मेले के विवाद पर सपा का समर्थन देने का आश्वासन दिया, लेकिन सितंबर 2015 में उन्हीं की सरकार के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की थी, जिनमें अविमुक्तेश्वरानंद भी शामिल थे। उन्होंने वाराणसी में दशाश्वमेध घाट के पास गोदौलिया चौराहा को रोक दिया था और गणेश की मूर्ति को विसर्जित करने की मांग कर रहे थे।

पुलिस कार्रवाई के विरोध में संतों और अन्य स्थानीय नेताओं द्वारा निकाले गए प्रदर्शन के दौरान वाराणसी में हिंसा और आगजनी भड़क उठी थी, जिसके बाद अजय राय राहुल गांधी से मिलने दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे। लौटने पर राय को वाराणसी एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लिया गया।

किसी विशेष राजनीतिक दल के समर्थक नहीं सरस्वती- संजय पांडे

अविमुक्तेश्वरानंद के एक अन्य मीडिया प्रभारी संजय पांडे ने कहा, “वह (सरस्वती) किसी विशेष राजनीतिक दल के न तो समर्थक हैं और न ही विरोधी। उन्होंने मायावती सरकार के दौरान रानी भवानी मंदिर के विध्वंस का विरोध किया था। उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान भगवान गणेश की मूर्ति के अपमान का विरोध किया था। योगी आदित्यनाथ सरकार के पहले कार्यकाल में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विकास के दौरान उन्होंने मूर्तियों और मंदिरों की रक्षा के लिए मंदिर बचाओ आंदोलन चलाया था। उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के खिलाफ गंगा आंदोलन का नेतृत्व किया था। इसके अलावा, उन्होंने राहुल गांधी को प्राचीन संस्कृत ग्रंथ मनुस्मृति का कथित तौर पर अपमान करने के आरोप में हिंदू धर्म से बहिष्कृत कर दिया था।”

पांडे ने बताया कि स्वामी सरस्वती ने रामसेतु रक्षा आंदोलन शुरू किया था और गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग को लेकर गंगा सेवा अभियान भी चलाया था। उन्होंने दावा किया, “यूपीए सरकार ने गंगा की मांग को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने राम मंदिर के निर्माण के लिए भी संघर्ष किया था।”

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