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10 करोड़ रुपए महीने के कारोबार पर पड़ेगा असर

सरोगेसी के लिए सरकार ने जो पहल की है उसे स्वागत योग्य कदम तो बताया जा रहा है लेकिन इसके कई पहलुओं पर व्यापक बहस के बाद ही कड़े प्रावधान करने की जरूरत बताई जा रही है।

Author नई दिल्ली | August 26, 2016 2:19 AM
प्रतीकात्नक तस्वीर

सरोगेसी के लिए सरकार ने जो पहल की है उसे स्वागत योग्य कदम तो बताया जा रहा है लेकिन इसके कई पहलुओं पर व्यापक बहस के बाद ही कड़े प्रावधान करने की जरूरत बताई जा रही है। भले ही अमदाबाद किराए की कोख के गढ़ के रूप में स्थापित हो चुका है और दिल्ली में उतने बड़े पैमाने पर सरोगेसी का कारोबार नहीं फैला हो। फिर भी इसका बड़ा नेटवर्क यहां भी बन गया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली-एनसीआर में ही इस पर काम करने वाले करीब ढाई सौ केंद्र बन गए हैं। इस विधेयक को अगर राज्यसभा में भी मंजूरी मिलती है तो एनसीआर में करीब 10 करोड़ रुपए महीने के कारोबार पर असर पड़ेगा।

इस कानून की दरकार लंबे समय से महसूस की जा रही थी। जानकारों की राय में भारत जैसे देश में इस तरह के प्रयोग को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। वहीं अभी भी दिल्ली जैसे इलाके में ऐसी महिलाएं या दंपति आते हैं जिन्हें बच्चा न होने की वजह से तलाक जैसी नौबत का सामना करना पड़ रहा है। प्रगतिशील महिला संगठन की महासचिव पूनम कौशिक का कहना है कि इस तरह के कड़े कानून की बड़ी जरूरत है। दिल्ली में वीपी सिंह कैंप, मदनपुर खादर सहित कई इलाके हैं जहां बड़े पैमाने पर अंडाणुओं को दान करवाने या सरोगेसी के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं या दबाव डाला जाता है। महिलाओं के बीच काम करने वाले कुछ स्वयंसेवी संगठन भी इसके लिए गरीब महिलाओं को मोटी रकम का लालच देकर इसमें आने का दबाव डालते हैं।

उसके बाद नौ-दस महीने के लिए वह महिला गायब हो जाती थी। वे बताती हंै कि मुंबई में एक महिला की सरोगेसी प्रक्रिया के दौरान मौत हो गई थी। हैदराबाद में एक महिला का अपहरण करने के बाद सरोगेसी कराया गया था। इसी तरह के गलत प्रयोगों के कारण थाईलैंड में पूरी तरह से सरोगेसी प्रतिबंधित है। इसे हतोत्साहित करने के लिए अनाथ बच्चों के गोद लिए जाने की प्रक्रिया को सरल व त्वरित करने की दरकार है। सरोगेसी दिल्ली में अभी उतना नहीं है जितना गुजरात या महाराष्ट्र में। आइवीएफ तकनीक बहुत बड़ा कारोबार बना हुआ है। सरोगेसी में आइवीएफ तकनीक की मदद भी लेनी पड़ती है। वे बताती हैं कि एक महिला ऐसी आई जिसकी तीन बेटी है और एक सरोगेसी से भी चाहिए, इस पर लगाम लगाना जरूरी है।

एम्स में काम कर चुके व महाराष्ट्र में आइवीएफ सेंटर चला रहे डॉक्टर अमोल का कहना है कि मौजूदा विधेयक में कई प्रावधान हैं जिन पर बड़ी बहस की दरकार है। विदेशी व व्यावसायिक इसेतमाल पर तो रोक लगनी चाहिए, लेकिन जरूरतमंदों को रास्ता मिलना चाहिए। वे कहते हैं कि महिलाएं रिश्तेदारों के ताने सुन कर तंग होकर ही बच्चे पैदा करने को मजबूर होती हैं। ऐसे में सरोगेट का रिश्तेदार होने की शर्त व्यावाहरिक नहीं होगी। क्योंकि लोग रिश्तेदारों से यह कमियां छुपाते हैं। दूसरे जिसके गर्भाशय नहीं हो उसके शादी के पांच साल तक इंतजार करने का अर्थ नहीं है। या जो मेडिकली अनफिट है वह क्या करे? एक अन्य डॉक्टर ने बताया कि लोग तो कड़े कानून की तोड़ निकालना जानते हैं। कितने सेंटर इसलिए नेपाल या बांग्लादेश में खोल लिए गए हैं। ताकि क्लिनिकल पार्ट वहां व केयर वाले काम भारत में हो सकें।
हरियाणा में उत्तर भारत का पहला सरोगेसी केंद्र ‘वंश सरोगेट’ खोलने वाले बजरंग का कहना है कि आज भी एक मामला उनके पास आया है जिसमें 28 साल की लड़की को इसलिए तलाक दिया जा रहा है कि वह मां नहीं बन सकती। उसका केस महिला आयोग में भी गया। गांवों में बच्चे के लिए दूसरी शादियो का चलन आज भी है।

रिश्तेदार लोग आज के समय में खून नहीं देते तो कोख कौन देगा? वे कहते हैं कि महिला आयोग ने जो अपनी तरह से कह दिया बस उसी के आधार पर कानून बना दिया जा रहा है। वे बताते हैं कि आइवीएफ के तीन चक्र व सरोगेट मदर के लिए तीन से चार लाख सहित कुल करीब दस लाख का खर्च एक सरोगेसी पर आता है। वे बताते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक करीब 10 करोड़ महीने का कारोबार दिल्ली में प्रभावित होगा। इसके लिए न केवल अस्पताल बल्कि स्वयंसेवी संगठनोें व कानूनी जानकारों व मनोवैज्ञानिकों के नेटवर्क की जरूरत होती है। वे खुद दिल्ली के चार-पांच बड़े अस्पतालों के पैनल पर हैं। वे कहते हैं कि कानून की दरकार 16 सालों से महसूस की जा रही थी।

लेकिन भारतीय चिकित्सा परिषद ने इसके लिए अभी तक दिशानिर्देश तक नहीं दिए थे। आइवीएफ तकनीक की जरूरत एक बड़ी आबादी को विभिन्न कारणों से पड़ने लगी है। सरकार को इसके आसान बनाने की दिशा में काम करने की दरकार है। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की डॉक्टर रंजना कुमारी ने कहा कि महिला आयोग के साथ हमने एक शोध किया था जिसमें इस प्रयोग के हालात का जायजा लिया गया था। उसी आधार पर हमने यह कानून बनाने की जरूरत पर बल दिया था। यह कानून जरूरतमंदों की मदद व गलत उपयोग पर रोक के लिए हो इसलिए इसके प्रावाधानों को खंगालने की जरूरत है।

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