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चांद सी जिंदगी पर तीन तलाक का ग्रहण

इस्लाम की शरीयत और उसके रहनुमा मौलानाओं की राय चाहे जो हो, लेकिन ‘तीन तलाक’ के दर्द से गुजर चुकीं खातूनों के लिए ये तीन लफ्ज उनकी ‘जमीर पर पत्थर मारने’ जैसा है।

Author नई दिल्ली | May 12, 2017 00:16 am
भारतीय मुसलिम महिलाएं

इस्लाम की शरीयत और उसके रहनुमा मौलानाओं की राय चाहे जो हो, लेकिन ‘तीन तलाक’ के दर्द से गुजर चुकीं खातूनों के लिए ये तीन लफ्ज उनकी ‘जमीर पर पत्थर मारने’ जैसा है। ये तीन लफ्ज उनके लिए इतनी दहशत पैदा करते हैं कि ‘चांद बी’ जैसी खातून दुबारा शादी-शुदा जिंदगी में कदम रखने से ही तौबा करती हैं। चांद बी और शायद उन जैसी तमाम तलाकशुदा खातूनों की जिंदगी का फैसला इस खौफ से गुजरता है कि कहीं ‘वो तीन लफ्ज’ उन्हें फिर से न सुनने को मिले। इस्लाम के नाम पर इस ‘कुरीति’ की शिकार चांद बी तलाक लेने के नियमों में बदलाव चाहती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि तलाक, हलाला और खुला के जो नियम हैं उनमें महिलाओं के हकों की कोई बात है ही नहीं, यहां तक कि शरीयत का अमल कर तीन तलाक तो दे दिए जाते हैं लेकिन इस्लाम के मुताबिक निकाह के वक्त कबूल किए गए मेहर से उन्हें लौटाने से कतराते हैं। तलाक, तलाक, तलाक…. खजूरी खाज के एक कस्बेनुमा मोहल्ले में रहने वाली चांद बी से बात कर इन तीन लफ्जों से हुई पीड़ा की गहराई का एहसास होता है। 28 साल की चांद बी ने अपना ‘खान’ उपनाम छोड़ दिया है जब से पति ने उसे तीन तलाक का फरमान सुनाया। चांद एक 11 साल की बच्ची स्नेहा की भी मां है, लेकिन अभी खुद वह उम्र के उस पड़ाव पर है जहां आजकल लड़कियां शादी कर घर बसाने की तैयारी कर रही होती हैं। लेकिन चांद का कहना है, ‘एक बार सब्र और आत्मविश्वास टूट गया वह वापस नहीं आ पाता, हालांकि घर वालों ने काफी कोशिश की, लेकिन अब तो यही दहशत रहता है कि वो भी वही तीन लफ्ज न कह दे, खिलौना समझ हमारा इस्तेमाल करे और वही चीज फिर से न दुहराए’। इसलिए, एक गैरसरकारी संगठन सेवा भारती में काम करने वाली चांद बी का पूरा ध्यान अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाने पर है।

चार बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी चांद बी की शादी 2003 में उत्तर प्रदेश के रामपुर के जरी-कढ़ाई का काम करने वाले अजीम खान से हुई थी, उस वक्त वह बारहवीं कर रही थीं। चांद बी के मुताबिक, निकाह के तुरंत बाद ही ससुराल वालों का रवैया उनके प्रति ठीक नहीं रहा, फिर वह पति के साथ दिल्ली आ गई, लेकिन कमाई के बावजूद पति खर्चे नहीं देता था, इसी बीच बेटी का जन्म हुआ जिसे लेकर वो फिर पति के साथ रामपुर गई, लेकिन उसे वहां मारा पीटा गया, पुलिस केस हुआ, उसके बाद काफी बीमार हालत में दिल्ली लौटी एक अतिसाधारण परिवार से आने वाली चांद बी के मायके के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे, तो उन्होंने सेवा भारती में 3200 रुपए की नौकरी शुरू की। उन्होंने रख-रखाव भत्ते और साथ रहने के लिए कोर्ट कचहरी भी की लेकिन बकौल बी, ‘3200 रुपए में मैं दिल्ली से यूपी तक भाग-दौड़ करती रही, कोर्ट-कचहरी की, लेकिन मुझे न मेहर मिला, न शादी में दिया गया सामान। न घर बचा, आखिर में मिला तो केवल तीन तलाक’। इतनी लंबी जिंदगी अकेले कैसे गुजारेंगी के सवाल पर चांद बी कहती हैं कि उन तीन शब्दों से ज्यादा डर लगता है, ये तीन शब्द रोकते हैं, घर में अगर जिक्र चल गया कि चांद के लिए रिश्ता आया है तो रात को बिस्तर पर लेटते ही पूरा इतिहास दुहरा जाता है आंखों के सामने, जो खत्म होता है तीन शब्द पर आकर, छह-सात सालों की भाग-दौड़ और धक्के खाने के बाद मुझे इन शब्दों के अलावा कुछ नहीं मिले।

अपनी बच्ची के मासूम सवालों और लालन-पालन का बोझ कंधे पर उठाए चांद बी तलाक के नियमों में बदलाव चाहती हैं। वो कहती हैं कि उनके कानून में औरतों कोे लिए कोई हक नहीं, नशे की हालत में तलाक, गुस्से में तलाक, कभी भी तलाक दे देते हैं। अगर कोई मर्द अपने तीन लफ्जों पर अफसोस कर बीवी को वापस चाहता है तो उसे हलाला से गुजरना होगा, यानी तलाकशुदा औरत किसी दूसरे मर्द से शादी करेगी, उसे तलाक देगी और फिर उसका शौहर उससे दुबारा शादी कर सकता है। चांद बी के मुताबिक, ‘चोट तो औरत के जमीर पर ही लगती है न। हमारे कानून में लड़की के लिए कहीं नहीं सोचा गया, रहने की मर्जी भी आदमी पर, छोड़ने की मर्जी भी आदमी पर। हम तो अपनी मर्जी से रह भी नहीं सकते, छोड़ भी नहीं सकते।’ खुला के नियम पर चांद कहती हैं,‘ इसमें भी औरत की अपनी मर्जी नहीं चलती, अलीम लोग हालात पढ़ते हैं और फैसला करते हैं। औरत को कोई अधिकार नहीं, सात शादियां वो करता है, तलाक वो देता है, हलाला उसके कहे पर होता है’।

शरीयत की बात पर चांद कहती हैं कि उसके मुताबिक तो हमारे पैंगबर ने सात शादियां की लेकिन किन हालात में यह कोई नहीं देखता, पैगंबर की एक ही बीबी हमउम्र थी, बाकी बड़ी थीं, कोई विधवा, कोई शादीशुदा नहीं, उन्होंने शादी इसलिए की कि उन औरतों को पनाह मिले, कोई गलत नजर न डाले। लेनिक उस समय के हालात कुछ और थे, लेकिन आज लोग इतिहास को जायज मानकर शौकिया और एय्याशी में यह सब कर रहे हैं। इतना ही नहीं दहेज का भी खुल कर लेन-देन हो रहा है, जबकि शरीयत में तो ऐसा नहीं है।
हालात के थपेड़े से मजबूत बनी चांद बी फिर शादी के झंझटों में नहीं पड़ना चाहती, लेकिन कहती हैं कि यदि इस तीन तलाक के नियमों में बदलाव आएगा तो उन्हें बहुत खुशी होगी, बाकि पूर्व शौहर के करतूतों का जवाब तो वह अपने दम पर बेटी को काबिल बना कर दे ही देंगी।

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