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राजनीति में न हो अपराधियों का प्रवेश : सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई में गैर सरकारी संगठन पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने दावा किया कि 2014 में संसद में 34 फीसद सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले थे। यह पूरी तरह असंभव है कि संसद राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कोई कानून बनाएगी।

Author Published on: August 10, 2018 3:34 AM
आम्रपाली ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट ने तगड़ा झटका दिया है. (फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

गंभीर अपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे लोगों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के लिए दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार से सुनवाई शुरू हुई। अदालत ने टिप्पणी की कि राजनीतिक व्यवस्था में अपराधीकरण का प्रवेश नहीं होना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अधिकारों का बंटवारा करने के सिद्धांत का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि अदालतों को लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए और कानून बनाने के संसद के अधिकार के दायरे में नहीं जाना चाहिए। संविधान पीठ ने कहा, ‘यह लक्ष्मण रेखा उस सीमा तक है कि हम कानून घोषित करते हैं। हमे कानून बनाने नहीं हैं, यह संसद का अधिकार क्षेत्र है।’ संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आरएफ नरिमन, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा शामिल हैं।

केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि यह विषय पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। यह एक अवधारणा है कि दोषी ठहराए जाने तक व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है। जजों ने मंत्रियों की ओर से ली जाने वाली शपथ से संबंधित सांविधान के प्रावधान का हवाला देते हुए जानना चाहा कि क्या हत्या के आरोप का सामना करने वाला व्यक्ति भारत के संविधान के प्रति निष्ठा बनाए रखने की शपथ ले सकता है। इस पर वेणुगोपाल ने कहा, ‘इस शपथ में ऐसा कुछ नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि आपराधिक मामले का सामना कर रहा व्यक्ति संविधान के प्रति निष्ठा नहीं रखेगा। यही नहीं, संविधान में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का प्रावधान है। दोष साबित होने तक एक व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है।’

सुनवाई में गैर सरकारी संगठन पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने दावा किया कि 2014 में संसद में 34 फीसद सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले थे। यह पूरी तरह असंभव है कि संसद राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कोई कानून बनाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीति के अपराधीकरण के सवाल पर शीर्ष अदालत को ही विचार करना चाहिए। तीन सदस्यीय खंडपीठ ने आठ मार्च, 2016 को इस मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजा था। इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि वृहद पीठ इस सवाल पर विचार करेगा कि क्या आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे विधि निर्माता को दोषी ठहराए जाने पर अथवा आरोप निर्धारित होने पर अयोग्य घोषित किया जा सकता है?

भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय ने भी चुनाव सुधारों और राजनीति को अपराधीकरण और सांप्रदायीकरण से मुक्त करने का केंद्र और अन्य को निर्देश देने के अनुरोध के साथ याचिका दायर कर रखी है। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने आपराधिक मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे विधायकों और सांसदों के मुकदमों की सुनवाई एक साल में पूरा करने का निचली अदालतों के लिए समय सीमा तय की थी। शीर्ष अदालत ने सांसदों और विधायकों की संलिप्तता से संबंधित आपराधिक मुकदमों की दैनिक आधार पर सुनवाई पर जोर दिया था।

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