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राजनीतिक पदों पर आसीन सहित भ्रष्टाचार के आरोपियों को जब्त होगी संपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च सार्वजनिक और राजनीतिक पदों पर आसीन लोगों सहित भ्रष्टाचार के आरोपियों की संपत्ति जब्त करने संबंधी बिहार और ओडीशा के दो कानूनों की संवैधानिक वैधता की पुष्टि की है।

Author नई दिल्ली | Published on: December 14, 2015 12:12 AM

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च सार्वजनिक और राजनीतिक पदों पर आसीन लोगों सहित भ्रष्टाचार के आरोपियों की संपत्ति जब्त करने संबंधी बिहार और ओडीशा के दो कानूनों की संवैधानिक वैधता की पुष्टि की है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक आपदा राष्ट्रीय आर्थिक आतंक बन गया है और दूसरी तरह से इस पर काबू पाने की जरूरत है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति अनिल आर दवे के पीठ ने उड़ीसा विशेष अदालत कानून 2006 और बिहार विशेष अदालत कानून 2009 की वैधता बरकरार रखी है।

दोनों राज्यों की विधान सभाओं ने ये कानून पारित किया था, जिसके तहत विशेष अदालतें गठित करने और संपत्ति जब्त करने की अनुमति देने का प्रावधान है। अदालत ने कहा कि ये कानून संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करते हैं। पीठ ने कहा कि एक तरह से भ्रष्टाचार तो राष्ट्रीय आर्थिक आतंक बन चुका है। इस सामाजिक आपदा पर अलग तरीके से काबू पाने की आवश्यकता है और इसलिए विधायिका ने कठोर प्रावधानों के साथ विशेष कानून बनाया।

अदालत ने कहा कि इन कानून के तहत विशेष अदालतों की स्थापना संविधान के अनुच्छेद 247 का उल्लंघन नहीं है। पीठ ने आरोपियों को दोषी ठहराए जाने से पहले ही उनकी संपत्ति जब्त करने संबंधी प्रावधानों को संविधान के प्रावधान का हनन करने वाला बताते हुए इसकी संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपने फैसले में इस संबंध में टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि संपत्ति या धन जब्त करने संबंधी दोनों कानूनों के अध्याय तीन के प्रावधान से न तो संविधान के अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 20 (1) और न ही अनुच्छेद 21 का हनन होता है।

शीर्ष अदालत ने याचिकार्ताओं की यह दलील भी अस्वीकार कर दी कि दोषी ठहराए जाने से पहले ही संपत्ति जब्त करना तो मुकदमे से पहले ही सजा देने जैसा है। पीठ ने कहा कि इस कानून के प्रावधानों का निशाना वे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति अर्जित है। जो उस अवधि का अपराध है और ऐसा विशिष्ट अपराध नहीं है जहां भ्रष्टाचार के लिए सबूत की जरूरत हो।

अदालत ने यह दलील भी ठुकरा दी कि उन पर मुकदमा चलाने के लिए एक विशेष वर्ग का सृजन किया जा रहा है जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है। शीर्ष अदालत के पहले के फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि अनैतिक तरीके से अर्जित संपत्ति उन लोगों की ऊर्जा नष्ट करती है जो ईमानदारी में यकीन करते हैं और इतिहास गवाह है कि वे कितना सहते हैं।

 

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