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युवाओं को कोरोना टीका के पैसे क्यों ले रहे हैं, 35000 करोड़ का क्या किया? आपकी नीति मनमानी, बेतुकी- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकारा, हाईकोर्ट से भी लताड़

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को मुफ्त टीकाकरण और उससे नीचे की उम्र के लोगों के लिए भुगतान प्रणाली देने की केंद्र की नीति 'प्रथम दृष्टया मनमाना और तर्कहीन' है।

भारत में कोरोना संक्रमण से लाखों मौतें हुई हैं। (Express photo by Nirmal Harindran)

देश में कोरोना का प्रकोप अब भी थमा नहीं है। इसी बीच राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में वैक्सीन की कमी देखने को मिल रही है। जिसके चलते 18 से 44 वर्ष के लोगों का टीकाकरण रूका हुआ है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाई है। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को मुफ्त टीकाकरण और उससे नीचे की उम्र के लोगों के लिए भुगतान प्रणाली देने की केंद्र की नीति ‘प्रथम दृष्टया मनमाना और तर्कहीन’ है।

कोर्ट ने टीकाकरण नीति के तहत 2021-22 के बजट में कोविड-19 टीका खरीद को लेकर निर्धारित 35,000 करोड़ रुपये के कोष में से खर्च की गयी राशि के बारे में विस्तृत जानकारी देने को कहा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र की उदारीकृत टीकाकरण नीति पर भी गंभीर सवाल उठाए। यह नीति राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों और निजी अस्पतालों को देश में सेंट्रल ड्रग्स लैबोरेटरी (सीडीएल) द्वारा मंजूर मासिक खुराक में से 50 प्रतिशत खुराक पूर्व-निर्धारित कीमत पर खरीदने की अनुमति देती है।

न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एल. एन. राव और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की एक विशेष पीठ ने कहा , ‘‘वित्त वर्ष 2021-22 के केंद्रीय बजट में टीकों की खरीद के लिए 35,000 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। उदारीकृत टीकाकरण नीति के संदर्भ में, केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया जाता है कि इस कोष को अब तक कैसे खर्च किया गया है और 18-44 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के टीकाकरण के लिए उनका उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता है।’’

न्यायालय ने केंद्र से इस बारे में भी स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया कि सरकार के टीकों के आपातकालीन उपयोग की मंजूरी ने निर्माताओं के जोखिम को कम किया है, ऐसे में कीमत निर्धारण में इस कारक को शामिल किया जाना चाहिए। न्यायालय ने कुछ और मुद्दों पर भी केन्द्र से स्पष्टीकरण देने को कहा है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भारतीय संविधान में यह परिकल्पित है कि जब कार्यपालिका की नीतियां नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं तो अदालतें खामोश नहीं रह सकतीं। न्यायालय ने यह टिप्पणी केन्द्र की इस दलील के संदर्भ में की कि कोविड-19 के प्रबंधन के बारे में उसके फैसलों में अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि वह नागरिकों के जीवन के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जारी रखेगा और यह देखेगा कि जो नीतियां हैं, वे तार्किकता के अनुरूप हैं या नहीं।

पीठ ने कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा है और नीति-निर्माण कार्यपालिका के एकमात्र अधिकार क्षेत्र में है। पीठ ने 31 मई को दिये अपने आदेश में कहा, ‘‘हमारे संविधान में यह परिकल्पित नहीं है कि जब कार्यपालिका की नीतियां नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं तो अदालतें मूक दर्शक बनी रहें। न्यायिक समीक्षा और कार्यपालिका द्वारा तैयार की गई नीतियों के लिए संवैधानिक औचित्य को परखना एक आवश्यक कार्य है, और यह काम न्यायालयों को सौंपा गया है।’’ इस आदेश को बुधवार को उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

न्यायालय ने कहा कि वर्तमान में वह विभिन्न हितधारकों को महामारी के प्रबंधन के संबंध में संवैधानिक शिकायतों को उठाने के लिए एक मंच प्रदान कर रहा है। पीठ ने कोविड प्रबंधन पर स्वत: संज्ञान मामले में अपना आदेश पारित किया।

वहीं दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि कोरोना वैक्सीन बनाने की क्षमता को बाधित कर रहे अधिकारियों पर नरसंहार का आरोप लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इस वजह से कई मौतें हुई हैं। अदालत ने कहा कि भारत में बहुत गुंजाइश और बुनियादी ढांचा उपलब्ध है जिसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

जस्टिस मनमोहन और नाजमी वजीरी की पीठ ने कहा, ‘टीकों के निर्माण के लिए बहुत सारी गुंजाइश और बुनियादी ढांचा उपलब्ध है। इस अप्रयुक्त (जिसे इस्तेमाल न किया गया हो) क्षमता का उपयोग करना होगा। आपके अधिकारियों को इसका एहसास नहीं हो रहा है। विदेश से लोग आ रहे हैं। आपके पास भारत में अच्छे टीके हैं। आप इन वैक्सीन निर्माताओं को पूरे भारत में ले जाएं और उन्हें बताएं कि यहां हब उपलब्ध है और इसका इस्तेमाल करें।’

उन्होंने कहा, ‘आपको अधिकारियों को बताना होगा कि यह समय इन जांचों या ऑडिट रिपोर्ट से सावधान रहने का नहीं है। इससे आज मौत हो रही है। वास्तव में कुछ लोगों पर हत्या का केस दर्ज चाहिए यदि वे इस अप्रयुक्त क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।’

अदालत ने कहा कि केंद्र पैनेसिया बायोटेक के नमूनों को मंजूरी की प्रक्रिया तेज करे जो ‘रशियन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड’ (आरडीआईएफ) के सहयोग से यहां स्पूतनिक वी टीके का निर्माण कर रहा है। पीठ ने कहा कि यदि टीके को बड़े पैमाने पर जनता को लगाने की इजाजत दे दी गई है , तो सरकार को केवल यह देखने की आवश्यकता है कि इस कंपनी के उत्पादित किए जा रहे नमूने मौजूदा मानकों के अनुरूप हैं।

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