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आंकड़ों से फंसे

मामला कोई भी हो आंकड़ों की घपलेबाजी करने में सरकारी विभाग पीछे नहीं है।

मामला कोई भी हो आंकड़ों की घपलेबाजी करने में सरकारी विभाग पीछे नहीं है। सरकारी तंत्र को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि उसके अपने आंकड़े कितने विरोधाभासी हैं, लेकिन उनके अपनी आंखों पर ऐसा पर्दा डाल रखा है जो सब कुछ अच्छा है दिखाता है। पिछले दिनों दिल्ली में एक ऐसी ही बानगी कोरोना के मामलों में भी देखने क ो मिली। यहां दिल्ली सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके दावा किया गया कि दिल्ली में पहली खुराक का टीकाक रण सौ फीसद हो गया है।

इसका मतलब यह हुआ कि दिल्ली में रहने वाला हर योग्य नागरिक टीके की एक खुराक ले चुका है अब कोई नहीं बचा जिसने कम से कम एक खुराक न ली हो। लेकिन इस बीच कोरना के मामले बढ़ने लगे व मौतें भीं। इस पर दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि कोरोना से मरने वाले 75 फीसद लोगों ने टीके की एक भी खुराक नहीं ली थी। अब टीके लगाने वाले चकरा गए कि आने वाले दिनों में वो भी कहीं रिकार्ड से गायब न हो जाएं। सवाल ये है कि सरकार के आंकड़े सही मानें या नियत!

जब टूटी उम्मीद

सत्ता के गलियारों में हर कोई चहलकदमी करना चाहता है, जिसके लिए वो हथकंडे आजमा कर देखता है। पिछले कुछ समय से राजनीतिक पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए कुछ लोग काकी भागदौड़ कर रहे थे लेकिन टिकट की घोषणा होने के बाद उनकी उम्मीद भी टूटती जा रही है। कुछ ऐसे रहे जो विधायकी का जुनून लेकर एक दल से दूसरे दल पर छलांग लगा रहे थे लेकिन अब उनकी हालत न खुदा ही मिला न विसाल ए सनम जैसी हो गई है।

दिल्ली से सटे यूपी के नोएडा में बेदिल को पता चला है कि कहने को मेयर के समतुल्य मानी जाने वाली एक फेडरेशन के शीर्ष पद पर दूसरी बार काबिज रहे एक बड़े नाम ने हाल ही में सपा का दामन बड़े जोर के साथ इस दावे के साथ थामा था कि उन्हें यहां से विधायकी की टिकट मिल जाएगी। बाकायदा पूरे शहर समेत संस्था के कार्यालय पर भी पार्टी का झंडा और होर्डिंग लगाए गए थे। लेकिन टिकट की घोषणा के बाद उनकी उम्मीद टूट गई और जब पता चला है कि प्रदेश में सत्ताधारी दल से इतर दूसरे दल का हाथ थाम लिया तो प्राधिकरण समेत अन्य सरकारी महकमों में भी उनकी छवि पर असर पड़ा। अब जाहिर है जल में रहकर मगर से बैर करेंगे तो नुकसान ही होगा।

चुनाव में चिंता

चुनाव में चिंता होना आम बात है उनके लिए जो मैदान में उतरते हैं। लेकिन दिल्ली में मामला में कुछ अलग है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और दिल्ली की एक बड़ी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले कुछ नेताओं को इन राज्यों में भेजा गया है। करीब एक दर्जन से ज्यादा नेता तो ऐसे हैं जो दिल्ली में होने वाले नगर निगम चुनाव के लिए अपना दावा ठोंक रहे हैं। अब ऐसे में अपने क्षेत्र में समय न दे पाने वाले नेता दूसरे राज्यों में जाकर जिम्मेदारी देख रहे हैं। उनके लिए यह दोहरी मुसीबत से कम नहीं है। क्योंकि पहले ही दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी ने परेशानी बढ़ा रखी है, ऊपर से दावेदारी भी पक्की नहीं है।

तू डाल मैं पात

दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को लागू किया है जिससे राजधानी में शराब की दुकानें बढ़ने की आशंका थी। नीति के बाद से असर दिखने भी लगा और अब कई इलाकों में रंगरोगन के साथ नई शराब की दुकानें खुल रही हैं। इसको विपक्षी पार्टियों ने मुद्दा बना लिया है। अब तो निगम में अपनी सत्ता के सहारे दुकानों को सील भी किया जा रहा है। लेकिन एक पार्टी का शराब के खिलाफ मोर्चा भी इसमें ज्यादा सफल नहीं है। क्योंकि एक तरफ विरोध बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ दुकानें खुल रही हैं। बेदिल को पता चला कि एक पार्टी इसे निगम चुनाव का अहम मुद्दा बनाना चाह रही है लेकिन लोगों का साथ मिल पाना मुश्किल है।

भागदौड़ पर विराम

दिल्ली नगर निगम के चुनाव के लिए निगम नेताओं में दौड़ भाग काफी महीने पहले ही शुरू हो गई थी, लेकिन दिल्ली में अभी एक पार्टी में नेता न तो बाहर जा रहे हैं और न ही अंदर आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड और अन्य राज्यों की तरह दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी नेता ‘अपना फायदा’ देखते हुए ही पार्टी की अदला-बदली कर रहे हैं।

कुछ समय पहले तक दो महत्त्वपूर्ण पार्टी के नेताओं का आने-जाने का सिलसिला चालू था। लेकिन जैसे ही एक पार्टी प्रमुख ने यह कहना शुरू कर दिया कि दूसरे दलों के नेता पहले पार्टी की सदस्यता लें उसके बाद हमारी समिति तय करेगी कि उन्हें चुनाव लड़ाना चाहिए या संगठन में पद देना चाहिए। इसके बाद जैसे भागदौड़ पर विराम लग गई है। क्योंकि कोई भी मोहल्ले का नेता अपनी छवि समिति के हाथ में डालकर उसे अपना भाग्यविधाता नहीं बनाना चाहता है। लेकिन कहा जा रहा है कि यह दोबारा तब शुरू होगा जब पार्टी प्रमुख दूसरे दलों से आने वालों को चुनाव लड़ने की हरी झंडी देंगे।

आरोप-प्रत्यारोप

चुनाव आने की सुगबुगाहट से कुछ हो न हो नेताओं पर आरोप-प्रत्यारोप जरूर हो जाते हैं। राजधानी में सत्ता पर काबिज पार्टी के नेता और विधायक विपक्ष के नेताओं पर हर दिन किसी ना किसी मुद्दे को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं। बीते कुछ दिनों से विपक्ष के नेताओं और निगम पार्षदोें पर जिस प्रकार से आरोप लगाए जा रहे हैं। मानो आरोप लगाने को लेकर पार्टी के अंदर होड़ सी लगी हुई है। कभी विधायक तो कभी निगम पार्षद भ्रष्टाचार का कच्चा चिठा लेकर आते हैं और निगम की सत्ता में काबिज पार्टी पर गंभीर आरोप मड़ कर चलते बनते हैं।

हालांकि, आरोपों को खारिज करने के लिए विपक्ष के प्रवक्ताओं ने भी मोर्चा भलिभांति संभाल रखा है। इस बीच किसी दिन यदि कोई नेता या फिर पार्षद भ्रष्टाचार की पोल नहीं खोलता तो उस दिन पार्टी के वरिष्ठ नेता सोशल मीडिया पर कमान संभाल लते हैं। इससे एक बात तो तय है कि निगम के चुनाव भले ही अपने निर्धारित समय पर हों पर दोनों पार्टियों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया है। अब आगामी महीने में होने वाले चुनाव में ही तय हो पाएगा कि दिल्ली की जनता पर इन आरोपों का क्या प्रभाव पड़ता है।
बेदिल

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