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गोदाम में रहकर और NGO से मिले टुकड़ों पर काटे चार महीने, मुंबई में बिना नौकरी, बिना पैसे के फंसे थे 70 लोग, ट्रेन में मिली जगह तो छलक पड़े आंसू

देश में कोरोनावायरस संक्रमण के केस बढ़ने के बाद पीएम मोदी ने मार्च के आखिर में लॉकडाउन का ऐलान कर दिया था, इसके बाद से ही लाखों की संख्या में लोग जहां-तहां फंस गए थे।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र मुंबई | Updated: August 1, 2020 10:02 AM
Shramik Special Trains, Migrant Labourersदेश में श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चार महीने पहले ही शुरू की गईं, इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग घर नहीं पहुंच पाए। (एक्सप्रेस फोटो)

भारत में पिछले करीब 6 महीनों से कोरोना का कहर जारी है। शुरुआती चरण में संक्रमण को रोकने के लिए पीएम मोदी ने देशभर में लॉकडाउन लगाने का ऐलान तक कर दिया था। इससे कोरोना की रफ्तार कुछ कम जरूर हुई, लेकिन प्रवासी मजदूरों पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा। लाखों की संख्या में प्रवासी पैदल या सरकार द्वारा चलाई गई श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से निकले। हालांकि, इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग महीनों से जहां-तहां फंसे थे। ऐसा ही मामला है झारखंड के रहने वाले अली हुसैन अंसारी का, जिन्होंने इसी शुक्रवार को हजारीबाग जाने के लिए मुंबई से ट्रेन पकड़ी।

मुंबई के एक गारमेंट फैक्ट्री गोडाउन में लोडर का काम करने वाले अंसारी का कहना है कि यही गोदाम उनका और हजारीबाग के उनके पांच साथियों का घर था। ये सभी लोग जनवरी में मुंबई आए थे। हालांकि, लॉकडाउन खत्म होने के बाद जब आम ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया, तब न तो उनके पास इससे जाने के पैसे बचे और न ही शहर के खुलने के बावजूद उन्हें कहीं काम ही मिला।

अंसारी के मुताबिक, वे मुंबई में 9 हजार रुपए की तनख्वाह पर काम कर रहे थे। लेकिन ढाई महीने काम करने के बाद मार्च के दूसरे हफ्ते में मुंबई पूरी तरह बंद होनी शुरू हो गई। आखिरकार 22 मार्च से देश में ही लॉकडाउन का ऐलान कर दिया गया। अंसारी के मुताबिक, वे काफी किस्मतवाले रहे कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें गोदाम में सोने के लिए जगह मिल गई। इस दौरान खाने के लिए उन्हें इलाके में राशन और खाना बांटने वाले सामाजिक समूहों पर निर्भर रह कर गुजारा करना पड़ा।

लॉकडाउन के दौरान अंसारी की झारखंड लौटने की सभी कोशिशें असफल रहीं। हालांकि, इस गुरुवार को उन्हें फोन आया, जिसमें उन्हें पता चला कि उनका नाम एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए तय है, जो कि 70 अन्य यात्रियों को लेकर बांद्रा टर्मिनस से झारखंड के गिरडीह जाएगी। उनके साथ हजारीबाग से मुंबई आए लोग भी साथ ही लौटेंगे।

अंसारी के मुताबिक, उन्होंने और अन्य लोगों ने लॉकडाउन से पहले ही ट्रेन के जरिए घर लौटने की कोशिश की। इसमें कुछ बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे। हालांकि, भीड़ की वजह से वे ट्रेनों में चढ़ ही नहीं पाए। इन लोगों के लिए निजी वाहन का इंतजाम करने का विकल्प भी नहीं था, क्योंकि इसके लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे लोग अपने घर लौट रहे थे, हमें बिना पैसा कमाए ही गोदाम में रहना पड़ा। हम आगे भी रुकते, लेकिन काम शुरू होने के अभी कोई आसार नहीं हैं।

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