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जज बनीं ट्रांसजेंडर ने सुनाई दर्दनाक दास्तां, ’50 रुपए में बेच देती थी जिस्म, लोग बुलाते थे कंडोम मौसी’

दर्दनाक दास्तां सुनाते हुए सुमी दास कहती हैं, 'मेरे सामने पेट भरने की चुनौती थी। मेरी सुंदरता से लोग मेरी तरफ आकर्षित होते थे।'

ट्रांसजेंडर समुदाय (प्रतीकात्मक तस्वीर)

लाइब्रेरी साइंस में स्नातक की पढ़ाई करने वाली ट्रांसजेंडर सुमी दास अब लोक अदालत की जज बन गई हैं। जलपाईगुड़ी में सुमी मौसी के नाम से चर्चित इस महिला के संघर्ष और सफलता की कहानी हैरान करने वाली है। जज बनने के बाद अब वे अपने जैसे पीड़ित लोगों को उनका सम्मान और रोजगार दिलाने में मदद कर रही हैं।

14 की उम्र में छोड़ दिया था घरः सुमी का संघर्ष जन्म के कुछ समय बाद ही शुरू हो गया था। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट में सुमी दास के हवाले से लिखा गया है कि उनका जन्म एक लड़के के रूप में हुआ था लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि उनके हाव-भाव और बोलचाल का अंदाज सबकुछ लड़कियों जैसा था। रिपोर्ट के मुताबिक सुमी का कहना है, ‘धीरे-धीरे मुझमें शारीरिक परिवर्तन भी होने लगा। अकेली संतान होने के चलते मां-बाप बहुत प्यार करते थे लेकिन जब उन्हें लगा कि मैं औरों से अलग हूं तो वे भी उपेक्षित करने लगे। स्कूल में बच्चे मुझ पर हंसते थे। बाद में परेशान होकर 14 साल की उम्र में मैंने घर छोड़ दिया।’

’50 रुपए में बेच देती थी जिस्म’: दर्दनाक दास्तां सुनाते हुए सुमी दास कहती हैं, ‘मेरे सामने पेट भरने की चुनौती थी। मेरी सुंदरता से लोग मेरी तरफ आकर्षित होते थे। कुछ दिनों बाद मैं भी अपने समाज के लोगों के साथ जलपाईगुढ़ी स्टेशन पर जाने लगी। वहां 50 रुपए में मैं अपना शरीर दूसरों के हवाले कर देती थी। इससे पेट की भूख तो मिट जाती थी लेकिन सम्मान की भूख मिटाने के लिए मैंने एक एनजीओ में नौकरी कर ली। एनजीओ प्रोजेक्ट के तहत मुझे कंडोम बांटने होते थे, थोड़े दिन बाद लोग मुझे कंडोम मौसी के नाम से ही पुकारने लगे।’

डेढ़ दर्जन ट्रांसजेंडरों को दिलाया रोजगारः सुमी बताती हैं कि उन्होंने इग्नू से लाइब्रेरी साइंस में स्नातक किया। फिर लगा कि उनके जैसे लोगों को जिन्हें को समाज में सम्मान नहीं मिल पाता उनके लिए भी कुछ करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने कूचबिहार में ट्रांसजेंडर को सम्मान दिलाने के लिए एक संस्था से जुड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने ट्रांसजेंडरों को अंग्रेजी सिखाने से रोजगार दिलाने तक का काम शुरू किया। उनकी मेहनत के चलते करीब डेढ़ दर्जन ट्रांसजेंडर सम्मान के साथ खुद का काम कर रहे हैं।

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