जब दिग्वजिय को मिली अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को मुख्यमंत्री बनवाने की जिम्मेदारी

बहुमत वाली कांग्रेस पार्टी के विद्याचरण शुक्ल सीएम बनने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। मोतीलाल वोरा भी पीछे नहीं थे। ऐसे में पार्टी में अपने चाणक्य दिग्विजय सिंह को यह जिम्मेदारी दी कि वो अजीत जोगी को विधायक दल का नेता चुनवाएं।

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दिग्विजय और जोगी के बीच 1993 से ही कटुता थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जोगी को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनवाने की जिम्मेदारी दी गई थी। (एक्सप्रेस फोटो)

कहा जाता है कि राजनीति सही समय और अवसर का खेल है। जिसने सही समय और सही अवसर को भांप लिया वही विजेता बनता है। इसके ढेरों उदाहरण हमारे देश में देखे जा सकते हैं। ऐसा ही एक वाकया है छत्तीसगढ़ का। अक्टूबर 2000 में मध्यप्रदेश का बंटवारा होना तय हुआ। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। उनके मंत्रिमंडल में 13 मंत्री छत्तीसगढ़ अंचल से थे। श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, राजेंद्र शुक्ल, मोतीलाल वोरा, रमेश बैस, नंदकुमार साय, लखीराम अग्रवाल और बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं की मध्यप्रदेश की सक्रिय राजनीति में भागीदारी अब समाप्त हो रही थी।

पत्रकार दीपक तिवारी ने अपनी किताब ‘राजनीतिनामा मध्यप्रदेश’ में राज्य के बंटवारे के समय हुई उठापटक और झूमाझटकी को बड़े से अपनी किताब में लिखा है। 31 दिसंबर की सुबह छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा हुई और यह नाम था अजीत जोगी का। हालांकि दावेदारी में कई और नाम भी चल रहे थे, लेकिन सत्ता की चाबी जोगी को मिली। दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त था और छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति थी। ऊपर से गुटबाजी के चलते भाजपा के एक दर्जन विधायक भी कांग्रेस में चले गए थे। ऐसे में भाजपा के पास विकल्प नहीं था और कांग्रेस को केवल सीएम का नाम तय करना था।

बहुमत वाली कांग्रेस पार्टी के विद्याचरण शुक्ल सीएम बनने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे। उनके भाई श्यामाचरण भी मुख्यमंत्री बनने के लिए बेकरार थे। मोतीलाल वोरा भी पीछे नहीं थे। ऐसे में पार्टी में अपने चाणक्य दिग्विजय सिंह को यह जिम्मेदारी दी कि वो अजीत जोगी को विधायक दल का नेता चुनवाएं। दिग्विजय और जोगी के बीच 1993 से ही कटुता थी, क्योंकि उस समय पूरी कोशिश करके भी जोगी सिंह को सीएम बनने से रोक नहीं पाए थे। लेकिन संख्या बल का गणित दिग्गी राजा के साथ था। नए राज्य में जोगी के समर्थक विधायकों की संख्या केवल दो थी। वहीं श्यामाचरण के पास केवल सात विधायक थे।

 

सबसे ज्यादा विधायकों का बल दिग्विजय के पास था, इसीलिए पार्टी ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी थी कि राज्य का पहला मुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग से होगा और अजीत जोगी इसके लिए सबसे बेहतर नाम और चेहरा थे। 31 अक्टूबर की सुबह अजीत जोगी के नाम की घोषणा होते ही विद्याचरण नाराज हुए और अपने फार्म हाउस चले गए। पार्टी पर्यवेक्षक बनकर आए गुलाम नबी आजाद और प्रभा राव, दिग्विजय सिंह को लेकर उन्हें मनाने पहुंचे। लेकिन वहां जो झूमाझटकी हुई थी, उसे पूरे देश में टीवी पर देखा था। तब दिग्विजय ने पत्रकारों से कहा था कि राजनीति में सब चलता है।

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