Punjab News: सिधक को रसोई का सामान चाहिए। उसकी सभी सहेलियों के पास रसोई का सामान है और जब रसोई में खाना बना रहे उसके दादाजी उसे नजर अंदाज करते हैं, तो वह चिढ़ जाती है। वह कहती है, “दारजी को कोई परवाह नहीं है।” इसके बजाय, उसके दादाजी उसे गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए कहते हैं।

ना-ना करते हुए भी सिधक परेड देखती है और एक महिला फाइटर पायलट को अपने राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते हुए देखती है। फिर वह अपनी सारी नाराजगी भूल जाती है। वह पूछती है, “ये कितने बड़े होते हैं? क्या मैं भी इन्हें उड़ा सकती हूं?” ठीक वैसा ही जैसा उसके दादाजी चाहते थे। सिधक किचन सेट के बारे में सब कुछ भूल जाती है और इसके बजाय उसे “गिफ्ट” के तौर पर एक छोटा फाइटर जेट मिलता है।

‘अ गिफ्ट फॉर सिधक’ नाम की कहानी सातवीं क्लास के सिलेबस का हिस्सा

‘अ गिफ्ट फॉर सिधक’ नाम की कहानी पंजाब के सरकारी स्कूलों में 7वीं क्लास के सिलेबस का हिस्सा है। यह राज्य सरकार के उस कैंपेन का भी हिस्सा है जिसका मकसद जेंडर से जुड़े पुराने ख्यालों को बदलना और जेंडर से जुड़ी भूमिकाओं को नए सिरे से परिभाषित करना है।

पंजाब शिक्षा विभाग ने 2021 में एनजीओ ब्रेकथ्रू और अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब साउथ एशिया के साथ मिलकर ‘जेंडर सेंसिटाइजेशन’ को नियमित पाठ्यक्रम में शामिल किया था और इस बदलाव का असर अब कहानी के पन्नों पर साफ दिखाई देता है।

लड़कियों को रसोई के सेट और लड़कों को कार या हवाई जहाज उपहार में देने से लैंगिक भूमिकाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को समझाने से लेकर इतिहास के हाशिये पर धकेल दी गई महिलाओं को उजागर करने तक, नए पाठ्यक्रम का उद्देश्य एक ही है। बहुत कम उम्र से ही लैंगिक पूर्वाग्रहों को समझना, उन पर सवाल उठाना और उनका मुकाबला करना।

ये प्रयास खासकर अंग्रेजी और सामाजिक अध्ययन के पाठ्यक्रम में दिखाई देते हैं। इनमें ‘सिधक के लिए एक उपहार’ जैसी कहानियां शामिल हैं। साथ ही, रजिया सुल्ताना और नूर जहां जैसी ऐतिहासिक महिलाओं को भी एक नए और अलग नजरिये से समझने की कोशिश की गई है।

पंजाब शिक्षा विभाग की लैंगिक संवेदनशीलता पाठ्यक्रम की प्रमुख सुनीता प्रभाकर ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ये प्रयास सिर्फ छात्रों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी हैं। उन्होंने कहा, “सिर्फ पढ़ाने का मटीरियल या किताबें बदलाव नहीं ला सकतीं। हमने शिक्षकों को ट्रेनिंग दी है कि क्लासरूम में ऐसे सबक कैसे सिखाए जाएं। अब करिकुलम में ऐसी कहानियां भी शामिल हैं जो बताती हैं कि परिवारों को महिलाओं के करियर के सपनों का समर्थन कैसे करना चाहिए और पुरुषों को भी घर के कामों में कैसे हिस्सा लेना चाहिए।”

सबसे ज्यादा बदलाव कक्षा 6 से 8 की किताबों में किए गए

सबसे ज्यादा बदलाव कक्षा 6 से 8 की किताबों में किए गए हैं, हालांकि कुछ टॉपिक कक्षा 9 से 12 में भी शामिल हैं। कक्षा 6 की इंग्लिश की किताब में ‘अ फॉरगॉटन विश’ (एक भूली-बिसरी इच्छा) नाम का एक चैप्टर है। इसमें बताया गया है कि शादीशुदा औरतें भी अपने माता-पिता की देखभाल कर सकती हैं और वे कोई “बोझ या अजनबी” नहीं होतीं। इसमें ख्वाहिश नाम की एक शादीशुदा औरत अपनी “बेबे” की देखभाल करना चाहती है, जबकि उसकी मां का मानना ​​है कि शादीशुदा औरतों को अपने पति के घर रहना चाहिए। यह सोच तब बदलती है जब बेबे बीमार पड़ जाती है और उसका बेटा विदेश से वापस नहीं आ पाता।

अब ख्वाहिश ही जिम्मेदारी संभालती है। वही अपनी मां की आंखों की सर्जरी करवाती है और वही उनकी देखभाल करती है। कक्षा 8 की अंग्रेजी की किताब का एक अध्याय छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि कठोर सामाजिक मानदंडों के कारण कुछ विवाहित महिलाएं किन अवसरों से वंचित रह जाती हैं।

‘स्मैशिंग द ग्लास सीलिंग’ नाम का यह चैप्टर परमजीत और गीत की कहानी बताता है। परमजीत एक घरेलू कामगार की बेटी थी और गीत वह महिला थी जिसके घर पर परमजीत की मां काम करती थी। 25 साल बाद जब वे दोबारा मिलती हैं, तो उनकी जिंदगी बिल्कुल अलग-अलग रास्तों पर जा चुकी होती है। गीत, जो मास्टर डिग्री वाली एक काबिल महिला है, अब एक हाउसवाइफ है और उसका परिवार उसके काम करने को पसंद नहीं करता। वहीं कम पढ़ी-लिखी परमजीत का अपना कंप्यूटर का बिजनेस है और वह अब एक आत्मविश्वास से भरी महिला है।

यह कहानी शुरुआत में ही कहानी का मिजाज तय कर देती है। अध्याय में कहा गया है, “आम तौर पर लोग सोचते हैं कि महिलाएं अपना खुद का व्यवसाय नहीं कर सकतीं, लेकिन उत्कृष्टता और प्रतिभा लिंग पर आधारित नहीं होती। भले ही कोई लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, उससे केवल परिवार की देखभाल करने की ही उम्मीद की जाती है।” अध्याय में यह भी कहा गया है, “उन्हें अपनी योग्यता साबित करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है।”

हम नजरिये को बदलने की कोशिश कर रहे हैं- सुनीता प्रभाकर

पंजाब शिक्षा विभाग की सुनीता प्रभाकर बताती हैं कि इस तरह के पाठ सरकारी स्कूलों में क्यों खास हैं। प्रभाकर कहती हैं, “चूंकि सरकारी स्कूलों के ज्यादातर बच्चे कमजोर आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, इसलिए उनके करियर के विकल्प भी सीमित और पूर्वाग्रह से भरे होते हैं। लड़कियों को लगता है कि ज्यादा से ज्यादा वे टीचर या नर्स बन सकती हैं। हम इसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं।”

किताबों में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक यह है कि छात्रों को इतिहास और उसमें शामिल महिलाओं को देखने का तरीका सिखाया जा रहा है। खास तौर पर, किताबों में रजिया सुल्तान (जो 1236 से 1240 में हटाए जाने तक दिल्ली सल्तनत की सुल्तान थीं) और नूरजहां (मुगल बादशाह जहांगीर की मुख्य बेगम और जिन्हें अक्सर मुगल तख्त के पीछे की असली ताकत माना जाता है) की भूमिकाओं पर जोर दिया गया है।

अध्यायों में कहा गया है कि नूर जहां केवल जहांगीर की पत्नी नहीं थीं और रजिया सुल्ताना केवल सुल्तान शम्स उद-दीन इल्तुतमिश की बेटी नहीं थीं। रजिया सुल्ताना पर आधारित अध्याय के अंत में छात्रों से कुछ सवाल पूछे गए हैं। जैसे—रजिया सुल्ताना की हत्या क्यों हुई? अगर रजिया आज के समय में जीवित होतीं, तो दिल्ली की पहली महिला शासक बनने में उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता? उन्होंने उस समय महिलाओं के बारे में बनी किन पुरानी सोच और मान्यताओं को चुनौती दी?

यह अध्याय इस प्रश्न का उत्तर भी देता है, “उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि पुरुष एक महिला नेता की बात मानना ​​और उनका अनुसरण करना नहीं चाहते थे। सेनापति एक महिला के अधीन अपना जीवन व्यतीत नहीं करना चाहते थे। रजिया सुल्ताना पहली महिला मुस्लिम शासक थीं। उन्होंने बचपन से ही सैन्य युद्ध का प्रशिक्षण लिया। उन्होंने पर्दा त्याग दिया, जिससे रूढ़िवादी समाज को गहरा सदमा लगा। लोग मानते हैं कि पुरुष जन्मजात नेता होते हैं और महिलाओं को शासन और राजनीति में आने के लिए बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। ऐतिहासिक रूप से, महिलाओं को ऐसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।”

इसी तरह नूर जहां पर आधारित अध्याय में बताया गया है कि वह मुगल युग की सबसे प्रेरणादायक महिला थीं। उन्होंने अपने पति के साथ खुले तौर पर शासन करके पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दी।

जहांगीर के शासन की असली ताकत नूर जहां थी

अध्याय में कहा गया, ““उन्होंने उनके राज्य के प्रशासन में गहरी रुचि ली। जहांगीर हर मामले में उनकी सलाह लेते थे। शिकार करने से लेकर आदेश और सिक्के जारी करने, इमारतों की रूपरेखा तैयार करने तक, हर काम में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनका नाम जनमानस और इतिहास में अंकित हो। अपने पति के बंदी बनाए जाने के बाद उन्होंने उन्हें रिहा करवाया। उन्होंने इस धारणा को तोड़ा कि पुरुष महिलाओं से बेहतर रणनीतिकार होते हैं। जहांगीर के शासन की असली ताकत वही थीं। समाज अक्सर महिलाओं को केवल सुंदरता और कर्तव्य की वस्तु के रूप में देखता है, लेकिन उन्होंने इस धारणा को चुनौती दी।”

एनजीओ ब्रेकथ्रू की राज्य स्तरीय परियोजना प्रमुख रश्मी द्विवेदी का मानना ​​है कि लैंगिक संवेदनशीलता लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए है। उन्होंने कहा, “हम बच्चों की आकांक्षाओं को बदलने पर काम कर रहे हैं। अगर कोई महिला शादी करती है, तो माता-पिता सोचते हैं कि उसका अपनी पत्नी के घर रहना सामाजिक मानदंडों के खिलाफ है। कुछ महिलाओं को आज भी शादी के बाद काम करने की अनुमति नहीं है। हम यह सब पाठ्यक्रम के माध्यम से बता रहे हैं। अब हमारा ध्यान इस बात पर नहीं है कि ये महान महिलाएं (जैसे नूर जहां और रजिया सुल्तान) किसकी बेटी या पत्नी थीं, बल्कि उन पहचानों पर है जिन्हें उन्होंने गढ़ा।”

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