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तख्ती मेरे नाम की, मकान की मालिक

शादी से पहले पिता और शादी के बाद पति के घर के अलावा कुछ घर ऐसे भी होते हैं जो महिलाओं की मेहनत से कमाए पैसे से खरीदे जाते हैं और महिलाओं के नाम पर होते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक घर खरीदने के फैसलों में 74 फीसद महिलाओं की भागीदारी होती है वहीं, देश भर में 32 फीसद एकल महिलाएं घर की खरीदार भी हैं। रजिस्ट्री के कागज पर अपने मालिकाना हक का नाम देखना जितना सुखद होता है उतना चुनौती भरा भी।

Author नई दिल्ली | Updated: July 18, 2019 1:56 PM
जया श्वेता और स्वाती की कहानी

मीना

अपनी कमाई से अपना घर खरीदने का सपना किसका नहीं होता। मेरा भी था। मैंने काफी समय से सोच रखा था कि मेरे घर के बाहर मेरे नाम की नेमप्लेट हो। मैं अपने घर की मालकिन बनूं और आज यह अरमान पूरा हो गया है। 2018 में मैंने अपनी कमाई से थ्री बीएचके फ्लैट ग्रेटर नोेएडा में लिया है। इस घर को देखकर लगता ही नहीं है कि मेरा अपना घर का सपना पूरा हो गया है। यह कहना है श्वेता जया का। श्वेता पेशे से पत्रकार हैं। वे कहती हैं कि बचपन से सुना था कि लड़की का घर या तो मायका होता है या ससुराल। पर उसका अपना घर कहां है? हम कमाते भी हैं। घर में भी मदद करते हैं। पर हमारा अपना कुछ भी नहीं है। ये मुझे नहीं चाहिए था। यही वजह रही कि मैंने 2018 में ग्रेटर नोएडा में थ्री बीएचके फ्लैट लिया।

अभी उसकी ईएमआइ भर रही हूं। मेरा वेतन घर की ईएमआइ में चला जाता है और पति की तनख्वाह से घर का खर्च चलता है, लेकिन ये घर मेरे नाम पर है। इस घर में नामित मेरी मां हैं। श्वेता का कहना है कि लड़कियां शादी के बाद माता-पिता से दूर जरूर चली जाती हैं लेकिन कुछ लड़के माता-पिता के पास रहते हुए भी उनका साथ नहीं देते। इसी डर की वजह से मैंने 2014 में शादी से पहले दिल्ली में न्यू अशोक नगर में पापा और मम्मी के लिए घर दिलवाया। पैसे पापा ने दिए थे। पर घर कहाँ खरीदना है? उसकी पूरी भागदौड़ मेरी थी। मम्मी और पापा दोनों सेवानिवृत्त हैं। एक भाई विदेश चला गया था पढ़ने के लिए। एक बहन शादी के बाद अपनी ससुराल में रहती थी। मैं और मेरी बहन दिल्ली में नौकरी कर रहे थे। पापा और मम्मी इलाहाबाद में थे। उनकी देखभाल हम लोग दिल्ली से नहीं कर पाते थे। इसलिए मैंने पापा को दिल्ली में घर खरीदने का विचार दिया था।

जब उस घर में पहली बार गई तो लगा कि पापा और मम्मी बहुत दूर नहीं हैं। अब वो मेरे पास हैं। मैंने ग्रेटर नोएडा वाले घर में खूब पौधे लगाएं हैं। मेरे घर में जो भी मेहमान आता है उसे पौधा ही गिफ्ट करती हूं। अक्सर लोग कहते हैं कि लड़की है इसकी तो शादी हो जाएगी। ये मम्मी-पापा की क्या देखभाल करेगी। लेकिन मैंने अपनी मां और पापा के लिए पहले घर खरीदवाया था। बाद में अपने लिए लिया। वे कहती हैं कि मुझे लगता है कि हर लड़की के पास अपने नाम का अपना घर होना चाहिए क्योंकि वो आपकी संपत्ति है।

लगा कि दुनिया जीत ली

दिल्ली में एक निजी कंपनी में काम करने वाली स्वाति का कहना है कि नौकरी में तो आगे बढ़ रही थी पर जीवन ठहरा हुआ था। मन में सवाल था कि कुछ समय बाद मैं खुद को कहां पाऊंगी। मैंने खुद के लिए क्या किया है? इन्हीं सवालों के जरिए मैं इस नतीजे पर पहुंची कि मेरा अपना खुद का घर होना चाहिए। मैंने मध्यप्रदेश के बैतूल में 1300 वर्गफुट जमीन खरीदी थी। अब शादी और नौकरी की वजह से दिल्ली आ गई हूं। अब उस जमीन को व्यवसाय के लिए इस्तेमाल करूंगी। पर सच बताऊं जब पहली बार मेरे नाम की रजिस्ट्री मेरे हाथ में आई तो लग रहा था कि मैंने दुनिया जीत ली है। मैं अपने खानदान की पहली लड़की हूं जिसने अपना घर खुद खरीदा। ये सब मैंने अपने विकास के लिए किया।

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