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सोलो: अब दुनिया की निगाहों में लद्दाख का खास पौधा

प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, ‘लद्दाख में सोलो नाम का एक पौधा पाया जाता है। जानकारों का कहना है कि यह पौधा हाई ऐल्टिट्यूड पर रहने वालों के लिए, बर्फीली जगहों पर तैनात सुरक्षाबलों के लिए संजीवनी का काम करता है।

Author नई दिल्ली | Updated: August 13, 2019 2:01 PM
सोलो एक जड़ी बूटी है, जो कि ’देश में लद्दाख ही एकमात्र जगह है जहां सोलो उगाई जाती है। यहां के स्थानीय वैद्य और आयुर्वेदिक डॉक्टर इस पौधे से दवाइयां बनाते हैं। वे मुख्यत: सोलो कारपो (सफेद) का प्रयोग करते हैं। ’ये पौधे 15 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर उगते हैं। लद्दाख में ये खारदुंग-ला, चांगला और पेजिला इलाको में मिलते हैं। ’लद्दाख के लोग इस पौधे के पत्तेदार भाग की सब्जी बनाते हैं, जिसे ‘तंगथुर’ कहते हैं। यह व्यंजन स्थानीय लोगों के बीच खासा प्रचलित है।

लद्दाख का एक खास पौधा अच्छी-खासी चर्चा में है। अनुच्छेद 370 के प्रावधान खत्म किए जाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीविजन पर देश को संबोधित करने के दौरान इस पौधे का जिक्र करते हुए इसे संजीवनी बूटी बताया। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, ‘लद्दाख में सोलो नाम का एक पौधा पाया जाता है। जानकारों का कहना है कि यह पौधा हाई ऐल्टिट्यूड पर रहने वालों के लिए, बर्फीली जगहों पर तैनात सुरक्षाबलों के लिए संजीवनी का काम करता है। कम ऑक्सीजन वाली जगह में इम्यून सिस्टम को संभाले रखने में इसकी भूमिका है। सोचिए, ऐसी चीज दुनिया भर में बिकनी चाहिए या नहीं? ऐसे अनगिनत पौधे, जड़ी-बूटियां जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बिखरी हुई हैं। उनकी पहचान होगी, बिक्री होगी तो वहां के किसानों को लाभ होगा।’

क्या है सोलो जड़ी-बूटी? सोलो नाम की यह औषधीय बूटी लद्दाख में पाई जाती है। यह साइबेरिया की पहाड़ियों में भी मिलती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक चमत्कारी जड़ी-बूटी है, जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली को ठीक कर सकती है। यह जड़ी बूटी रेडियोधर्मिता से भी बचाव करती है। वैज्ञानिकों ने इस जड़ी-बूटी को ‘रोडियोला’ नाम दिया है। रोडियोला ठंडे और ऊंचाई वाली जगहों पर पाई जाती है। स्थानीय लोग रोडियोला को सोलो कहते हैं और इसकी पत्तियों का सब्जियों में प्रयोग करते हैं।

लेह स्थित डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ हाई एल्टीट्यूड रिसर्च (डीआइएचएआर) ने सोलो के इस्तेमाल पर शोध कर रखा है। डीआइएचएआर के निदेशक आरबी श्रीवास्तव के मुताबिक, ‘रोडियोला एक आश्चर्यजनक पौधा है, जो रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है, कठिन जलवायु की स्थितियों में शरीर को अनुकूल बनाता है और रेडियोधर्मिता से बचाव करता है। इस पौधे में सीकोंडरी मेटाबोलाइट्स और फायटोएक्टिव तत्व पाएं जाते हैं, जो विशिष्ट हैं।’ यह जड़ी बूटी बम या बॉयोकेमिकल लड़ाई से पैदा हुए गामा रेडिएशन के प्रभाव को कम करती है। लेह स्थित डीआरडीओ की प्रयोगशाला दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर स्थित कृषि-जानवर शोध प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला में रोडियोला पर एक दशक से शोध हो रहा है।

आरबी श्रीवास्तव का कहना है, ‘इस पौधे की एडेप्टोजेनिक क्षमता सैनिकों और कम दवाब और कम ऑक्सीजन वाले वातावरण में अनुकूल होने में मदद कर सकती है, साथ ही इस पौधे में अवसाद-रोधी और भूख बढ़ाने वाला गुण भी है।’ इस बूटी की मदद से भूख न लगने की समस्या को दूर किया जाता है। साथ ही यह बूटी याददाश्त को भी बेहतर करती है। इसका इस्तेमाल अवसाद की दवा के तौर पर भी किया जाता है। अमेरिकी सरकार की एजंसी ‘नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लीमेंट्री एंड इंटिग्रेटिव हेल्थ’ (एनसीसीआइएच) ने डीआरडीओ की शोध एजंसी से संपर्क साधा है। अमेरिकी एजंसी ने हाल में जारी अपने बयान में बताया है कि सोलो पौधों पर कुछ शोध हुआ है, जिससे यह अनुमान लगाया गया इसके सेवन से मानसिक तनाव दूर करने में मदद मिलती है।

मुख्य तौर पर सोलो की तीन प्रजातियां हैं। सोलो कारपो (सफेद), सोलो मारपो (लाल) और सोलो सेरपो (पीला)। सोलो कारपो (सफेद) का औषधीय उपयोग ज्यादा होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती उम्र के प्रभाव से बचने में भी यह जड़ी-बूटी मददगार है। यह आॅक्सीजन में कमी के दौरान न्यूरॉन्स की रक्षा करती है। डीआरडीओ की प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने अपने संस्थान की दो एकड़ जमीन में सोलो की खेती की है और इस पर लगातार शोध जारी है।

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