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राजस्थान: रोजाना 6 बच्चियां यौन उत्पीड़न की शिकार

2017 में यह आंकड़ा हर रोज चार बच्चियों का था। पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो 2018 में प्रदेश भर में बलात्कार के 4335 मामले दर्ज हुए, जिनमें 2213 मामले बच्चियों से बलात्कार के थे।

Author जयपुर | Published on: May 29, 2019 3:00 AM
2017 में यह आंकड़ा हर रोज चार बच्चियों का था।

राजस्थान में बच्चियों से बलात्कार रोकने के तमाम प्रयास बेकार होते दिखाई दे रहे हैं। प्रदेश में बीते साल यानी 2018 में ही स्थिति भयावह रही। आंकड़ों की बात करें तो इस साल हर रोज छह बच्चियां यौन उत्पीड़न की शिकार हुईं वहीं 2017 में यह आंकड़ा हर रोज चार बच्चियों का था। पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो 2018 में प्रदेश भर में बलात्कार के 4335 मामले दर्ज हुए, जिनमें 2213 मामले बच्चियों से बलात्कार के थे। इनमें से कई बच्चियां अबोध थीं। प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में लिंगानुपात में काफी सुधार हुआ है बावजूद इसके बच्चियों से बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के कारण राजस्थान को शर्मसार होना पड़ा है।
पुलिस ने 2018 के बलात्कार के दर्ज 4335 मामलों में से 2157 को सही मानते हुए आरोपियों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया है। वहीं इनमें 542 मामलों में पुलिस जांच कर रही है और करीब 1636 मामलों को झूठा मान अंतिम रिपोर्ट (एफआर) लगा दी है।

पुलिस ने जिन मामलों को बंद किया है उनमें से आधे से अधिक मामलों में पीड़िताओं की तरफ से फिर से जांच की गुहार पुलिस के आला अफसरों से लगाई गई है। राज्य अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश भर में 6 जिलों में बच्चियों से बलात्कार की घटनाएं 100 से ज्यादा हुई हैं। इनमें अलवर और जयपुर जिलों में सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। पिछले साल अलवर में 196 बच्चियों से बलात्कार हुआ तो जयपुर जिले में 184 बालिकाओं को दरिंदगी का शिकार होना पड़ा। वहीं जोधपुर में 131, भरतपुर में 116, उदयपुर में 104 और बारां जिले में 101 मामले दर्ज हुए। प्रदेश के कुछ जिले ऐसे भी रहे जहां छोटी बच्चियों से दुष्कर्म की घटनाएं कम दर्ज हुई। इनमें बूंदी में 28, करौली में 26, राजसमंद में 23, सवाई माधोपुर में 21, झुंझुनूं में 19, जैसलमेर में 16, बांसवाडा में 15, दौसा में 14 और जालोर जिले में 12 मामले ही दर्ज हुए।

राजस्थान में लिंगानुपात सुधरने पर सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपा ले पर यहां महिलाओं की सुरक्षा का सवाल लगातार गहराता जा रहा है। इस दिशा में महिला बाल विकास विभाग, राज्य महिला आयोग और पुलिस की संवेदनशीलता कहीं नजर नहीं आती है। लिंगानुपात सुधार को समाज की जागरुकता का नतीजा माना जाता है। शिक्षा का स्तर सुधरने के साथ ही लोग अब बेटे और बेटी को एक समान मान कर उनकी परवरिश कर रहे है। महिला बाल विकास मंत्री ममता भूपेश का कहना है कि सरकार की योजनाओं की बदौलत बेटियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उनका कहना है कि नई सरकार बालिकाओं से बलात्कार की घटनाओं पर सख्ती से कार्रवाई करेगी।

ऐसी घटनाओं को होने से रोकने के लिए बालिकाओं के लिए भी जागरुकता कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे। विद्यालयों में बालिकाओं को सचेत रहने की सीख देने वाले कार्यक्रमों को शुरू किया जाएगा। महिला सुरक्षा के बारे में जो स्थितियां है वो चिंताजनक है। इनमें सुधार के लिए सरकार की तरफ से पुलिस, महिला और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर कार्ययोजना बनाई जाएगी। राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष सुमन शर्मा का कहना है कि महिला प्रताड़ना के मामलों में बढ़ोतरी को लेकर कई स्तरों पर सुधार के प्रयास की जरूरत है। बालिकाओं से बलात्कार का मामला सामने आते ही संवेदनशील तरीके से फौरन कार्रवाई की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में पुलिस की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। प्रताड़ित महिलाओं को सुरक्षा देने के साथ ही उन्हें सामाजिक स्तर पर भी मान्यता देने की आवश्यकता है जिसके लिए महिला और सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा।

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