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संगीतः गायन और वादन की जुगलबंदी

किराना घराने के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद आशिक अली खां ने अपने एकल सारंगी वादन के लिए जितना नाम कमाया संगतकार के तौर पर भी उन्होंने उतनी ही मकबूलियत हासिल की।

Author नई दिल्ली | April 15, 2016 2:00 AM
किराना घराने के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद आशिक अली खां (File Pic)

किराना घराने के मशहूर सारंगी वादक उस्ताद आशिक अली खां ने अपने एकल सारंगी वादन के लिए जितना नाम कमाया संगतकार के तौर पर भी उन्होंने उतनी ही मकबूलियत हासिल की। अपने जमाने के नामी गिरामी गायकों और तबला/पखावज वादकों के साथ उन्होंने संगत की तो एकल सारंगी वादन भी हर बड़े जलसे में किया। सन 1928 में जन्मे आशिक अली खां का इंतेकाल 1999 में हुआ। उनकी पहली बरसी के मौके पर उनके नाम से एक समाजसेवी ट्रस्ट की स्थापना करके उनके परिवार ने एक सालाना जलसे की शुरुआत की जो रवायत आज तक बदस्तूर कायम है। इस अवसर पर संगीत के समर्पित साधकों को उनकी संगीत सेवा के लिए उस्ताद आशिक अली खां स्मृति सम्मान से नवाजा भी जाता है।

आशिक अली खां की बरसी के मौके पर पिछले सप्ताह इस ट्रस्ट का वार्षिक सम्मान और संगीत समारोह कमानी सभागार में आयोजित किया गया था। गिरिजेश कुमार के शास्त्रीय गायन, उस्ताद राशिद मुस्तफा थिरकवा और शारिक मुस्तफा के तबला वादन और सुश्री शोवना नारायण के कथक नृत्य ने इस शाम क्रमश: गायन वादन और नृत्य की नुमाइंदगी की। आशिक अली खां की याद में स्थापित संगीत भूषण अवार्ड विदुषी सुमित्रा गुहा, पं. केशव तालेगांवकर और पं. बलराम सिंह को, ताल सम्राट अवार्ड पं. गोविंद चक्रवर्ती और मंजू खां को व संगीत सेवक अवार्ड गुलाम मोहम्मद खां को प्रदान किया गया।

गिरिजेश कुमार उस्ताद आशिक अली खां के सुपुत्र और शागिर्द आरिफ अली खां से तालीम पा रहे हैं लेकिन इस शाम उनके गाने में किराना घराने वाली चैनदारी नहीं दिखी। राग पूरिया धनाश्री का चुनाव तो वक्त के मुताबिक था लेकिन विलंबित एकताल में बंधा बड़ा ख्याल बमुश्किल पंद्रह मिनट में निपटा डाला। मेहमान कलाकारों की मेजबानी में उन्होंने अपना गाना महज हाजिरी लगाने के लिहाज से मुख्तसर अंदाज में पेश किया। हारमोनियम पर उनके उस्ताद आरिफ अली खां और तबले पर आनंद भट्ट ने उनकी मुनासिब हौसला आफजाई की।
राशिद मुस्तफा थिरकवा और शारिक मुस्तफा ने इसके बाद अपनी तबला जुगलबंदी में गाने की सारी कसर पूरी कर डाली।

अपने जीते जी किंवदंती बन चुके उस्ताद अहमद जान थिरकवा के भतीजे और शागिर्द राशिद मुस्तफा के पास जाहिर है अपने घराने की नायाब चीजों का खजाना है और शारिक भी उन्हीं के बेटे और शागिर्द हैं। लिहाजा तीनताल से उन्होंने अपना तबला वादन शुरू किया। फिर मध्य और द्रुत लय में तबले के दूसरे बाजों की भी बेहतरीन चीजें शामिल थीं। राशिद मुस्तफा ने विलंबित लय को काबू में रखते हुए जिस कसाव के साथ पेशकार से अपनी बेहतरीन पेशकश का आगाज किया था उसमें आलाप वाला इत्मीनान और सुकून था। उनका मिजाज बनाने में आरिफ अली खां के हारमोनियम का भी हाथ था।

राशिद मुस्तफा थिरकवा का तो क्या कहना लेकिन शारिक की भी तारीफ करनी पड़ेगी। पहले तो यह कि वह जुगलबंदी वाले अंदाज में अपने गुरु पिता की बराबरी में न बैठ कर हारमोनियम वादक की तरह उनके बाजू में बैठे और फिर पूरे समय उनका अनुगमन ही किया। कहीं भी उनसे आगे बढ़कर अपना जलवा दिखाने की गुस्ताखी नहीं की यानी उन्होंने घरानेदार तालीम ही नहीं, तहजीब भी हासिल की है।

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