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उत्तर प्रदेश: पानी को मोहताज सारस ने बदला आशियाना

एशिया में सबसे ज्यादा सारस अगर कहीं पाए जाते हैं तो वो इटावा, मैनपुरी, समान पक्षी विहारद्ध और सरसईनावर वेट लैंड इलाका है।

Author इटावा | April 22, 2016 1:13 AM
साईबेरियन सारस (एएफपी फोटो)

पानी की कमी से इंसान ही नहीं जूझ रहा बल्कि पक्षी भी जूझ रहे हैं। सबसे ज्यादा मुसीबत है, उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी सारस के लिए। इसका कारण यह है कि सारस को खेत खलिहान में कहीं भी मन माफिक पानी नहीं मिल रहा है। इसके चलते सारस बड़े पैमाने पर गायब हो रहे हैं। अगर भौगौलिक हालात की स्थितियों को सही मानें तो कभी 500 की तादात में नजर आने वाले सारस पक्षी अब मात्र 25 या फिर 30 में ही सिमट गए हैं।

एशिया में सबसे ज्यादा सारस अगर कहीं पाए जाते हैं तो वो इटावा, मैनपुरी, समान पक्षी विहारद्ध और सरसईनावर वेट लैंड इलाका है। लेकिन जहां इस मौसम में कभी 500 की तादाद में सारस दिखाई देते थे अब वहां पानी की कमी के चलते सिर्फ 25-30 सारस ही बचे हैं। ज्यादातर यहां से पलायन कर कहीं और चले गए हैं। सरसईनावर वेट लैंड में सारसों के लिए 108 हेक्टेयर भूमि ऐसी थी जिसमें पानी भरा रहता था। लेकिन अब ये सिकुड़ कर सिर्फ 28 हेक्टेयर बची है और उसमें भी पानी नहीं है। ऐसे में सारस पक्षी यहां से जाने को मजबूर हो गया। सारस का प्रेम अटूट होता है जो एक बार जोड़ा बनने के बाद कभी बिछड़ता नहीं है।

सरसईनावर के रामलखन का कहना है कि सैकड़ों की तादाद में दिखने वाले सारस अब कुछ दर्जन भर रह गए हैं और इ सका सबसे बड़ा कारण पानी है। अब पानी कम बरसता है और नदी और नहरों में भी पानी नहीं है। ऐसे में ये यहां से चले गए हैं। अगर पानी की पूर्ति हो जाए तो ये यहां सुरक्षित रह सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। पर्यावरण के लिए काम कर रही संस्था सोसायटी फॉर कंजरवेशन आफ नेचर के सचिव राजीव चौहान का कहना है कि इस बार सारस की प्रजाति पर पानी न होने के कारण गंभीर संकट आ गया है। ऐसा पहली बार हुआ है जब 500 से अधिक तादाद में दिखने वाला सारस आज सिर्फ उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। सरकार ने भले ही इस ओर ध्यान दिया और इन्हें बचाने के लिए संगोष्ठी का आयोजन किया लेकिन धरातल पर इन्हें बचाने का कोई कार्यक्रम नहीं दिख रहा है।

इस मौसम में जब इन्हें पानी की जरूरत है लेकिन इन्हें पानी नहीं मिल पा रहा है। ये पानी की तलाश में यहां से गए है। जब इटावा और मैनपुरी का ये इलाका वर्षों से इन सारसों के लिए मुफीद रहा है लेकिन इनके प्राकृतिक आवासों में लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। सारस ने दुनियाभर में इटावा जिले की पहचान करा रखी है। उत्तर प्रदेश के ताल तलैयों में पांच हजार सारस स्वच्छंद रूप से वास करते देखे जाते रहे हैं। लेकिन सूखे की वजह से ये अब पहले की तरह खेतों में नहीं देखे जा रहे हैं। दुनिया में सबसे ऊंचा सारस उड़ने वाला पक्षी किसानों का मित्र है। करीब 12 किलो वजन वाले सारस की लंबाई 1.6 मीटर तथा जीवनकाल 35 से 80 वर्ष तक होता है।

सारस वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनूसूची में दर्ज है। देश में सारस की छह प्रजातियां हैं। इनमें से तीन प्रजातियां इंडियन सारस, क्रेनए डिमोसिल क्रेन व कामन क्रेन है। दुनिया भर में सारस पक्षियों की अनुमानित संख्या आठ हजार है। इनमें अकेले इटावा में 2500 और मैनपुरी में करीब 1000 सारस हैं। उल्लेखनीय है कि अग्रेंज कलक्टर एओ ह्यूम के समय में इस क्षेत्र में साइबेरियन क्रेन भी आते थे जिसको देखने के लिए अब भरतपुर पक्षी विहार जाना पड़ता था। इस क्षेत्र में वर्ष 2002 में आखिरी बार साइबेरियन क्रेन का एक जोड़ा देखा गया था।

सारस पक्षी के प्रजनन को प्रभावित होने का अनुमान इटावा के प्रभागीय वन निदेशक कन्हैया पटेल भी लगा रहे हैं। उनका कहना है कि पानी की कमी ने सारस पक्षी की दिशा को बदल दिया है। पानी की तलाश में सारस पक्षी इधर उधर भटक रहे हैं लेकिन वो बाद में अपने पूर्ववर्ती क्षेत्र में ही आ जाएंगे। इसी साल फरवरी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के गांव सैफई में सारस सरंक्षण को लेकर इंटरनेशल स्तर की सारस कांफ्रेंस हो चुकी है। इस कांफ्रेंस में इस बात का सवाल उठाया गया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गांव के पास स्थापति सैफई हवाई पट्टी ने सारस को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।

अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सैफई के पास स्थित बंजराहार क्षेत्र में वैटलैंड था जो सारस के लिए मुफीद था। अब वहां हवाई पट्टी है। इसके अलावा मैनपुरी के समान व इटावा के सरसई नावर भी सारस के केंद्र हैं जहां वेटलैंड में कमी आ रही है। इसी कांफ्रेंस में राज्य के पूर्व मुख्य वन्य जीव संरक्षक मोहम्मद अहसान ने साफ किया था कि उत्तर प्रदेश में वेटलैंड क्षेत्र में काफी तेजी से गिरावट आई है। यहां पर दो तिहाई वेट लैंड क्षेत्र घट गया है। वर्ष 1998 में उत्तर प्रदेश में 70.07 हैक्टेयर क्षेत्रफल में वेटलैंड था जो अब घट कर 26.66 हैक्टेयर रह गया है। वेटलैंड क्षेत्र का उपयोग कृषि व विकास के कार्यों में किया जा रहा है। इसके लिए हमें कार्य योजना बनानी होगी। हालांकि सारसों को लेकर इटावा व मैनपुरी का क्षेत्र सारस कैपिटल के रूप में जाना जाता है। छोटे-छोटे वेटलैंड समाप्त हो रहे हैं जो सारस संरक्षण के लिए ठीक नहीं हैं। प्रदेश में सूखे की स्थिति ने भी वेटलैंड पर प्रभाव डाला है परंतु हम केवल नहरों के ऊपर ही वेटलैंड पर निर्भर हो गए हैं।

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