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नृत्यः शिव के रूपों की सजीव शाम

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शिव क्षेत्र नृत्य रचना का आयोजन किया गया।
पार्वती के भाव पेश करते भरतनाट्यम नर्तक सत्यनारायण राजू।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शिव क्षेत्र नृत्य रचना का आयोजन किया गया। इस नृत्य समारोह में भरतनाट्यम नर्तक सत्यनारायण राजू और कथक नर्तक अभिमन्यु लाल ने शिरकत की। अभिमन्यु लाल ने अपनी गुरु गीतांजलि लाल की नृत्य रचना पेश की जबकि सत्यनारायण राजू ने शृंगार शिव पेश किया।
अभिमन्यु की पहली प्रस्तुति विश्वनाथ अष्टकम पर आधारित थी। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक ग्रंथ के अनुसार यह रचना महर्षि व्यास की मानी जाती है। पर इसे रूप दिया आदि शंकराचार्य ने। अष्टकम के श्लोक ‘गंगा तरंग रमणीय जटाकलापम’ पर भगवान विश्वनाथ और पावर्ती के रूपों को हस्तकों और भंगिमाओं से अभिमन्यु ने निरूपित किया। उन्होंने शिव के अर्धनारीश्वर रूप का सुंदर चित्रण किया।

इसमें लास्य और तांडव का अच्छा समायोजन था। उन्होंने मार्कण्डेय ऋषि और भगवान शिव के प्रति भक्ति प्रसंग पेश कर, प्रस्तुति को और भावोत्पादक बना दिया। नृत्य के क्रम में उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास रचित रूद्राष्टकम के अंश पर भक्त के भाव दिखाए। उन्होंने भजन ‘दर्शन देहो शंकर महादेव’ पर भावों को सहज और सरल अंदाज में रखा। भजन राग यमन कल्याण और तीन ताल में निबद्ध था। अपनी प्रस्तुति के अगले अंश में नर्तक अभिमन्यु लाल ने जयपुर घराने की तकनीकी बारीकियां पेश कीं। इसमें तीन ताल विलंबित लय में पैर का काम आकर्षक था। परण ‘धा-गे-किट-त-धा’ के बोल पर पैर का काम पेश किया। इसमें उड़ान के साथ चक्कर का अच्छा प्रयोग किया। द्रुत लय में तोड़े, टुकड़े और तिहाइयों का समायोजन था।

भरतनाट्यम नर्तक सत्यनारायण राजू ने तंजौर के शिव मंदिर वृहदेश्वर से संबंधित रचना को अपनी प्रस्तुति का आधार बनाया। उन्होंने वरणम की तर्ज पर इसे प्रस्तुत किया। नृत्य के आरंभ में वृहदेश्वर की स्तुति को रचना ‘वृहदेश्वरम अवलंबे तंजावुर वासिनिम’ में पेश किया। अगले चरण में उन्होंने अभिनय के जरिए नायिका पार्वती के भाव विवेचित किए। नायिका पार्वती शिव के सर्प और बाघांबर धारी रूप से भयभीत हो जाती हैं। वह शिव से प्रणय निवेदन करती हैं। नर्तक सत्यनारायण ने शिव-पार्वती संयोग शृंगार के भाव बखूबी उकेरे। उनके अभिनय में सरलता, सहजता और मार्मिकता थी। इस प्रस्तुति के लिए आठ रागों-तोड़ी, शंकराभरणम, पंतुवराली, अठाना, भैरवी, कल्याणी, बसंत और मुखारी का चयन किया गया था।

दक्षिण भारत में साहित्य और कला की सुदृढ़ परंपरा रही है। इसी का परिणाम है कि त्रिमूर्ति-मुत्थुस्वामी, संत त्यागराज और श्यामा शास्त्री ने जिन साहित्य को रचा उसे संगीत और नृत्य के जरिए कलाकारों ने जन-जन तक पहुंचाया। उसी समृद्ध परंपरा का परिणाम है कि भरतनाट्यम नर्तक सत्यनारायण राजू जैसे कलाकार अपने नृत्य प्रस्तुति से चमत्कृत कर देते हैं। उन्होंने सधा हुआ नृत्य पेश किया। कथक प्रस्तुति के संगत कलाकारों में विधा लाल, योगेश गंगानी, राजेश पांडे, सलीम कुमार और ऋषि शामिल थे, जबकि भरतनाट्यम के लिए संगत किया शंकुतला प्रभात, डीएस श्रीवत्स, लिंगराजू और रघुनंदन ने।

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