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आश्रय गृह मामला : सुप्रीम कोर्ट ने बिहार व केंद्र से जवाब मांगा, पीड़िताओं की फोटो या बातचीत दिखाने पर रोक

शीर्ष अदालत ने कहा कि पटना निवासी रणविजय कुमार नामक एक व्यक्ति की चिट्ठी मिलने के बाद वह बेहद आहत थी क्योंकि इसमें मुजफ्फरपुर घटनाओं की कथित पीड़ितों का बार बार इंटरव्यू किए जाने के मुद्दे को उठाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट। (express photo)

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में राज्य वित्तपोषित एक एनजीओ की ओर से संचालित एक आश्रय गृह में नाबालिग लड़कियों के कथित यौन शोषण की घटनाओं पर केंद्र और बिहार सरकार से गुरुवार को जवाब मांगा। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता के पीठ ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया और आश्रय गृह में कथित यौन शोषण की शिकार लड़कियों का मीडिया द्वारा बार-बार साक्षात्कार लिए जाने पर चिंता जताई। पीठ ने बिहार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और पीड़िताओं की तस्वीरों का रूप बदलकर भी इन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर प्रसारित करने पर रोक लगाई। अदालत ने मीडिया को कथित यौन शोषित पीड़िताओं का साक्षात्कार नहीं करने का निर्देश देते हुए कहा कि उन्हें बार-बार अपने अपमान को दोहराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। सीबीआइ को आश्रय गृह में फोरेंसिक जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई सात अगस्त को होगी। पीठ ने कहा कि यह गंभीर चिंता की बात है कि कथित पीड़ितों का कई बार इंटरव्यू लिया गया और उन्हें उस घटना को दोहराने के लिए बाध्य किया गया। पीठ ने पूछा कि क्या इसी तरह हम अपनी लड़कियों से पेश आते हैं? पीठ ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को किसी भी रूप में इन पीड़ितों की तस्वीरें प्रसारित या प्रकाशित करने से रोकते हुए मीडिया से कहा कि आश्रय गृह में यौन शोषण की शिकार कथित पीड़ितों का इंटरव्यू नहीं लिया जाए।

पीठ ने कहा- अब इसकी जांच सीबीआइ को सौंपी जा चुकी है। क्या इन लड़कियों से कैमरे के सामने पूछताछ की जाएगी? सबके लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा। उन्हें उस वेदना से मुक्ति दिलानी होगी। यह भयावह है। पीठ ने इसके साथ ही केंद्र और बिहार सरकार को नोटिस जारी कर उनसे इस घटना के बारे में जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति लोकूर ने कहा कि आप एक बच्चे से जिस तरह बात करते हैं, वह एक वयस्क के साथ बात करने से भिन्न होता है। मैंने एक क्लिप देखा। आप कथित बलात्कार की शिकार वयस्क से इस तरह बात नहीं करते। ऐसा करने के अलग तरीके होते हैं। उन्होंने कहा कि कथित पीड़ितों का इस तरह इंटरव्यू करना ही क्यों चाहिए? अधिवक्ता अपर्णा भट को इस मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया गया है। उन्होंने न्यायालय से यह निर्देश देने का अनुरोध किया कि कथित पीड़ितों का कोई भी मीडिया इंटरव्यू नहीं होना चाहिए। इस पर पीठ ने सवाल किया कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का क्या होगा? तब मीडिया कहेगा कि सुप्रीम कोर्ट उन पर प्रतिबंध लगा रहा है। पीठ ने थाईलैंड की हाल की उस घटना का जिक्र किया जिसमे एक गुफा में फुटबाल टीम के बच्चे और उनके कोच कई दिन फंसे रहे। पीठ ने कहा कि गुफा से सुरक्षित बाहर निकाले जाने के बाद 15 से 20 दिन तक उनसे इंटरव्यू की अनुमति नहीं दी गई थी। उन सभी का एक संयुक्त इंटरव्यू ही हुआ था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि पटना निवासी रणविजय कुमार नामक एक व्यक्ति की चिट्ठी मिलने के बाद वह बेहद आहत थी क्योंकि इसमें मुजफ्फरपुर घटनाओं की कथित पीड़ितों का बार बार इंटरव्यू किए जाने के मुद्दे को उठाया गया था। पीठ ने कहा कि उसने पुलिस को जांच करने से नहीं रोका है और यदि वह कथित पीड़ितों से सवाल करना चाहती है तो उसे पेशेवर काउंसिलर और बंगलुरु स्थिति राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्था और तंत्रिका विज्ञान व टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के योग्यता प्राप्त बाल मनोचिकित्सकों की मदद लेनी होगी। बिहार सरकार के वित्त पोषित एनजीओ के प्रमुख ब्रजेश ठाकुर द्वारा चलाए जाने वाले एक केंद्र पर 30 से अधिक लड़कियों के साथ कथित रूप से बलात्कार किया गया। टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंस (टीआइएसएस), मुंबई द्वारा अप्रैल में राज्य के समाज कल्याण विभाग को सौंपी गई एक आॅडिट रिपोर्ट में लड़कियों के कथित यौन शोषण के बारे में बताया गया था। बीते 31 मई को ठाकुर समेत 11 लोगों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। टीआइएसएस की आॅडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि आश्रय गृह में कई लड़कियों ने यौन शोषण की शिकायत की थी। इन शिकायतों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल का गठन किया गया था। मुजफ्फरपुर में एनजीओ द्वारा संचालित आश्रय गृह को काली सूची में डाला गया है और लड़कियों को पटना व मधुबनी के आश्रय गृहों में स्थानांतरित किया गया है।

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