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80 साल की शीला दीक्षित कराएंगी कांग्रेस की नैय्या पार, चुनावी आहट पर अजय माकन पहुंचे पूर्व सीएम के द्वार

दिल्ली कांग्रेस विधान सभा की बीस सीटों के उप चुनाव के मुख्य मुकाबले में शामिल होने की अंतिम तैयारी में दिल्ली की लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित का साथ पाने जुगत में लगी है।

Author नई दिल्ली | February 9, 2018 12:39 AM
दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित

दिल्ली कांग्रेस विधान सभा की बीस सीटों के उप चुनाव के मुख्य मुकाबले में शामिल होने की अंतिम तैयारी में दिल्ली की लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रही शीला दीक्षित का साथ पाने जुगत में लगी है। कारण चाहे जो रहे हों लेकिन उनके धुरविरोधी माने जाने वाले प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन का उनसे दिल्ली का राजनीति में सक्रिय सहयोग मांगने के लिए उनके घर पर जाना, एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना मानी जा रही है। दीक्षित ने कहा कि उनकी ओर से कोई बंदिश नहीं है, पार्टी जो जिम्मेदारी देगी वे उसे निभाने की कोशिश करेंगी। प्रदेश अध्यक्ष ने उनसे सहयोग मांगा, उन्हें अच्छा लगा। 2013 का विधान सभा चुनाव में पार्टी और खुद उनके हारने के बाद दिल्ली कांग्रेस की राजनीति में उन्हें और उनके सांसद पुत्र संदीप दीक्षित को हाशिए पर डाल दिया गया। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा बनने पर दिल्ली की राजनीति से उनकी विदाई मान ली गई।
लेकिन शीला दीक्षित जब भी दिल्ली के मामलों में बोली, उसे गंभीरता से लिया गया।

पिछले दिनों दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अधिकारियों और खास कर आईएएस अधिकारियों के नकारा बताने के बयान को दीक्षित ने गलत बताया और कहा कि वे इन्हीं अधिकारियों के बूते दिल्ली में काफी बदलाव कर पाई। ऐसा तब भी हुआ जब केन्द्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार थी।2015 के विधान सभा चुनाव में पार्टी की बूरी गति होने के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने पार्टी को मुख्य धारा में बनाए रखा और कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं को सड़क पर लाते रहे। पिछले साल निगम चुनाव के समय पार्टी में भारी बगावत हो गई। प्रदेश अध्यक्ष से नाराज होकर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ,पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष बरखा सिंह, अंबरीष गौतम आदि की शिकायत पार्टी नेतृत्व ने नहीं सुना और वे भाजपा में चले गए। पूर्व मंत्री अशोक कुमार वालिया पार्टी से अलग होते-होते रह गए। माकन ने पहले डा. वालिया को सक्रिय किया और उनके इलाके में उप चुनाव की तैयारी की शुरूवात के तौर पर उनके इलाके में सफल सम्मेलन किया।

सबसे अजूबा तो शीला दाक्षित के साथ हुआ। कांग्रेस की सरकार जाने के साथ ही वे दिल्ली की राजनीति से किनारा किए जाने लगे। शीला दीक्षित पूर्वी दिल्ली का लोक सभा चुनाव हारने के बाद प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थी। उनके अगुवाई में 1998 का विधान सभा चुनाव कांग्रेस लड़ी। चुनाव जीतने और मुख्यमंत्री बनने के काफी दिनों बाद तक उन्हें बाहरी बताकर दिल्ली के कांग्रेस नेता उन्हें हटाने की मुहीम चलाते रहे। उनमें वे नेता भी शामिल थे जिनके प्रयास से वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुई थी। हालात ऐसे बन गए कि उन्हेंने दिल्ली की राजनीति में हाई कमान के बूते नए नेता खड़े किए। उनमें अभी के अध्यक्ष अजय माकन और अरविंद सिंह लवली जैसे प्रमुख थे। माकन की तेजतर्रार छवि ने उनको दीक्षित से अलग किया। आरोप लगे कि उन्होंने भाजपा के वोट विभाजित करने के लिए अरविंद केजरीवाल की अपने पुत्र के माध्यम से मदद की जो बिजली पानी के मुद्दे पर कांग्रेस के वोट बैंक को ही हड़प गए। तीसरे कार्यकाल में वे कुछ ही लोगों की सुनती थी और कांग्रेस का एक धड़ा मानता है कि कांग्रेस के हाशिए पर जाने का बड़ा कारण भी वही बनी थी।
2015 के विधान सभा चुनाव में शीला दीक्षित की कोई भूमिका नहीं थी।

पार्टी नेतृत्व के संबधों के चलते वे कार्यक्रमों में दिख जाती थी। यह अपने आप में अजीब था कि जिसके कार्यकाल की उपलब्धियों के आधार पर कांग्रेस वोट मांग रही थी वे चुनाव प्रचार में कहीं नहीं दिख रही थी।आप के नेता चाहे जो आरोप लगाएं या दावा करें लेकिन यह सत्य है कि शीला दीक्षित ने 15 साल के अपने कार्यकाल में दिल्ली की सूरत बदल दी। उनके पास भी वही अधिकार थे जो केजरीवाल के पास के थे लेकिन वे और उनके ज्यादातर मंत्री इन्हीं अधिकारियों के बूते दिल्ली के हर इलाके में मेट्रो को पहुंचा दिया और दिल्ली को फ्लाई ओवर का शहर बना दिया। इसके अलावा लंबी सूची उन कामों की भी है जो आसानी से मौजूदा अधिकारों में कोई राज्य सरकार नहीं कर सकती है।

पिछले दिनों राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग की सिफारिशों के आधार पर गैर कानूनी तरीके से संसदीय सचिव बनाए गए आम आदमी पार्टी(आप) के बीस विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के बाद उन सीटों पर उप चुनाव की संभावना बढ़ गई है। आप राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ अदालत गई है। संयोग से ये सीटें दिल्ली के हर इलाके में हैं और दिल्ली के हर वर्ग के मतदाताओं का मिजाज का अंदाजा इन उप चुनावों से लगने वाला है। दिल्ली का राजनीतिक पार्टियां इसके चलते ज्यादा सक्रिय हैं। इसे मिनी आम चुनाव माना जा रहा है। इन सीटों से आप सरकार की सेहत पर कोई अंतर नहीं आने वाला है लेकिन उप चुनाव हारने पर साख खोने का भय उनके सामने है। माना जाता है कि आप के पास कांग्रेस का मूल वोट चला गया है, उसे वापस लौटाने के लिए कांग्रेस हर प्रयास कर रही है। शीला दीक्षित को सक्रिय करने का प्रयास भी उसी कड़ी का एक हिस्सा माना जा रहा है।

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