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दिल्ली मेरी दिल्ली: मुश्किल की घड़ी

रामबाबू शर्मा के अध्यक्ष रहते तो वे प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर तक नहीं जाती थीं और दिल्ली कांग्रेस के कार्यक्रमों में उन्हें बुलाया भी नहीं जाता था।

Author January 14, 2019 3:07 AM
शिला दीक्षित लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं हैं।

-बेदिल

बीस साल पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहीं शीला दीक्षित को एक बार फिर दिल्ली की कमान सौंप दी गई है। वे लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और अपवादों को छोड़कर उनके बाद जो भी प्रदेश अध्यक्ष रहा, उससे उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा। रामबाबू शर्मा के अध्यक्ष रहते तो वे प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर तक नहीं जाती थीं और दिल्ली कांग्रेस के कार्यक्रमों में उन्हें बुलाया भी नहीं जाता था। जयप्रकाश अग्रवाल, अरविंदर सिंह लवली और अजय माकन से भी उनके संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित राजीव भवन बनवाने में भी रामबाबू शर्मा ने उनकी मदद कम ही ली। अब दीक्षित उसी दफ्तर की प्रमुख बन गई हैं। उनका राजनीतिक कद तो काफी बड़ा है, लेकिन अभी भी दिल्ली कांग्रेस के सभी धड़ों को साथ लाने के लिए उन्हें खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।

बयानों का मतलब
राजनीति में न कोई दोस्त होता है न कोई दुश्मन, न कुछ हमेशा के लिए अच्छा होता और न कुछ बुरा। जो होता है वह है मौकापरस्ती। इसकी एक बानगी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के हाल में दिए गए दो बयानों में देखी जा सकती है। केंद्र सरकार की ओर से सवर्ण जातियों के गरीब २परिवारों को 10 फीसद आरक्षण दिए जाने के मामले में केजरीवाल ने चार दिन पहले किसी के ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे इस बात से सहमत हैं कि सरकार को संसद का सत्र बढ़ाकर तुरंत संविधान संशोधन लाना चाहिए, नहीं तो इसे केवल चुनावी जुमला माना जाएगा। वहीं संविधान संशोधन हो जाने के बाद केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा, ‘कई लोगों से मेरी बात हुई। सबको लग रहा है कि यह भाजपा की चाल है। बेहद खतरनाक।’ अब केजरीवाल को केंद्र सरकार की इस पहल का समर्थक माना जाए या विरोधी। वैसे आप अपनी सहूलियत से इसका अर्थ निकालने के लिए स्वतंत्र हैं।

अध्यक्ष का जलवा
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के खिलाफ भले ही भाजपा के कई दिग्गज सक्रिय हों, लेकिन पार्टी नेतृत्व में अभी भी उनका ओहदा कम नहीं हुआ है। दिल्ली में शुक्रवार और शनिवार को हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक का आयोजक राज्य होने के नाते स्वागत आदि की जिम्मेदारी दिल्ली भाजपा की ही थी। मनोज तिवारी ने अपने स्वागत भाषण के जरिए प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष को गदगद कर दिया। दोनों नेता जिस गर्मजोशी से मनोज तिवारी से मिले, उससे वह और उनके समर्थक काफी उत्साहित दिखे। वैसे प्रधानमंत्री की अन्य सभाओं की तरह वहां भी नारे तो केवल प्रधानमंत्री के ही लग रहे थे।

अधिकारियों की आफत
दिल्ली पुलिस की सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिकारियों के हाथ-पांव फूले हुए थे। पारदर्शिता होने के कारण माना जाता है कि मीडिया कहीं से भी और किसी भी बिंदु पर सवाल कर अधिकारियों को घेर सकती है। दो से तीन घंटे की कॉन्फ्रेंस के दौरान किन अधिकारियों की बारी कब आए, कहना मुश्किल होता है। यही हुआ भी, जब एक थानाध्यक्ष की कार्यशैली के बारे में सवाल किया गया तो आयुक्त बगलें झांकने लगे और संबंधित क्षेत्र के आला अधिकारियों का चेहरा तो देखने लायक हो गया।

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