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शशिप्रभा तिवारी की रिपोर्ट: कामदेव के पुष्प वाणों से व्यग्र नायिका के भाव

चिन्मय मिशन में आयोजित अरंगेत्रम समारोह में नृत्यांगना अदिति बालासुब्रहम्णयन ने प्रस्तुति दी। उन्होंने नृत्य का आरंभ अलरिपु से किया।
चिन्मय मिशन में आयोजित अरंगेत्रम समारोह में नृत्यांगना अदिति बालासुब्रहम्णयन ने प्रस्तुति दी।

चिन्मय मिशन में आयोजित अरंगेत्रम समारोह में नृत्यांगना अदिति बालासुब्रहम्णयन ने प्रस्तुति दी। उन्होंने नृत्य का आरंभ अलरिपु से किया। इसके तहत परंपरागत पेशकश में लयात्मक अंग संचालन और पद संचालन पेश किया। के शिवकुमार रचित संगीत पर उन्होंने नृत्य किया। दूसरी प्रस्तुति राग कान्हड़ा और आदि ताल में निबद्ध थी। केएन दंडायुध पिल्ले की रचना पर आधारित नृत्य में अदिति ने भरतनाट्यम के तकनीकी पक्ष को पेश किया। उन्होंने रागम के सरगम व तालम के आवर्तनों और खालीपन को भरते हुए अपनी प्रस्तुति को सजाया। उन्होंने वरणम में भाव और रस का समावेश किया।

केएन दंडायुद्ध पिल्ले की रचना ‘स्वामी ये वर सुल्लडी सखी ए कुमार स्वामी’ की नृत्य रचना गीता चंद्रन ने की थी। यह राग पूर्वी कल्याणी और आदि ताल में निबद्ध थी। वरणम को गायिका सुधा रघुरामन ने पल्लवी, अनुपल्लवी और स्थायी भाव के अंदाज में गाया। उसी के अनुरूप नायिका के भावों को पिरोया गया। नायिका अपनी सखी से कहती है कि सखी, उसके प्रिय कार्तिकेय जो शिव-पार्वती के पुत्र हैं, मोर पर सवार हैं, उसे वह ले आए। स्थायी भाव में कामदेव के पुष्प वाणों से व्यग्र नायिका के भावों को शिष्या अदिति ने चित्रित किया। इस वरणम में नायिका के अभिसारिका भावों को दर्शाया गया। इसमें जतीस और तीनमानम का प्रयोग प्रभावकारी था।

कवि पापनाशन शिवन की पद्म पर आनंद तांडव को अदिति ने नृत्य में समाहित किया। वहीं, अरुणाचल कविराय की कृति पर निंदास्तुति पेश की। रचना ‘श्रीरंगनाथ एनपल्ली कुडिरैया’ में भगवान रंगनाथ से भक्त पूछता है कि वह क्यों आराम कर रहे हैं। वह राम हैं, वह ताड़का का वध कर, शिव धनुष को तोड़, परशुराम से संवाद, सीता को तलाशते, मारीच को मार कर व रावण से युद्ध कर थक गए हैं। इसलिए वह थककर आराम कर रहे हैं। उन्होंने अपने नृत्य का समापन तिल्लाना से किया। राग रागेश्वरी और आदि ताल में निबद्ध तिल्लाना लालगुड़ी जयरामन की थी। शिव के रूप को दर्शाते हुए, लयात्मक अंग, पद और हस्त संचालन पेश कर नृत्यांगना ने समां बांध दिया। इस प्रस्तुति में संगतकार के तौर पर नटुवंगम पर गुरु गीता चंद्रन, गायन पर सुधा रघुरामन, बांसुरी पर जी रघुरामन और मृदंगम पर एमवी चंद्रशेखर मौजूद थे।

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