बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के सात महीने बाद राज्य यूनिट में उसके डिजिटल आउटरीच कैंपेन को लेकर मुश्किलें बढ़ रही हैं। कई सीनियर नेता इस पहल की प्रक्रिया और नतीजे दोनों पर सवाल उठा रहे हैं। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (BPCC) के अध्यक्ष राजेश राम के नेतृत्व में राज्य कांग्रेस ने 11 अप्रैल को ‘सृजन साथी’ जनसंपर्क प्रोग्राम शुरू किया। इसका मकसद संगठन को मजबूत करना और एक पारदर्शी और मज़बूत डिजिटल सिस्टम बनाना है, जो संघनात्मक पदों को जमीनी काम और एक्टिव हिस्सेदारी से जोड़ेगा।
कांग्रेस द्वारा जारी एक पत्र में राजेश राम ने टारगेट तय किए कि राज्य और ज़िला लेवल पर अलग-अलग संगठनात्मक पदों के लिए चुने जाने के लिए इच्छुक पदाधिकारियों को क्या टारगेट पूरे करने होंगे।
सृजन साथी बनने के लिए 50 रुपये फीस
इस प्रोग्राम के तहत कांग्रेस के उम्मीदवारों को पार्टी समर्थकों को ‘सृजन साथी’ के तौर पर पंजीकरण करना होगा, जिसमें हर एक से 50 रुपये लिए जाएंगे। ये राशि पार्टी की 10 रुपये की मेंबरशिप फ़ीस से ज़्यादा है। राज्य यूनिट में नियुक्ति अलग-अलग उम्मीदवारों द्वारा पंजीकरण किए गए ऐसे समर्थकों की संख्या के आधार पर होनी चाहिए।
मोबाइल एप्लिकेशन से मॉनिटर किए जाने वाले इस डिजिटल कैंपेन का मकसद कांग्रेस नेतृत्व को राज्य भर के जमीनी वर्कर्स और जनता से जोड़ना है। मौजूदा कांग्रेस सदस्यों के साथ-साथ जो सदस्य नहीं हैं, वे भी 50 रुपये देकर और ऐप के ज़रिए रजिस्टर करके ‘सृजन साथी’ के तौर पर एनरोल कर सकते हैं।
कांग्रेस का क्या है तर्क?
50 रुपये की फीस का बचाव करते हुए राजेश राम ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि यह मेंबरशिप ड्राइव नहीं थी, बल्कि पार्टी के उभरते नेताओं को मिल रहे सपोर्ट के लेवल का अंदाज़ा लगाने का एक तरीका था। हालांकि, पार्टी के अंदर आलोचना करने वालों का आरोप है कि यह प्रोग्राम असल में आर्थिक क्षमता को संगठनात्मक नियुक्ति के लिए एक ज़रूरी क्राइटेरिया बनाता है।
राजेश राम के पत्र के मुताबिक, बिहार कांग्रेस उपाध्यक्ष के पद के लिए एक नेतृत्व की सिफारिश तब की जाएगी जब ‘3,000 सृजन साथी’ जनरल सेक्रेटरी के लिए 2,000, सेक्रेटरी के लिए 1,000 और डिस्ट्रिक्ट-लेवल के पदाधिकारी के पद के लिए 200 ‘सृजन साथी’ पंजीकृत किए जाएंगे।
कांग्रेस नेताओं ने उठाए सवाल
राज्य के कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह पहल पार्टी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की बताई गई सोच के खिलाफ है। एक सीनियर कांग्रेस नेता ने कहा, “एक तरफ राहुल गांधी पार्टी को सोच पर चलाने की बात करते हैं। दूसरी तरफ बिहार कांग्रेस में ऐसा लग रहा है कि संगठनात्मक पोस्ट की बिक्री हो रही है।”
नेता ने आगे कहा, “जिसके पास भी काफी पैसा है, वह 2,000-3,000 लोगों को एनरोल कर सकता है और सीनियर पोस्ट पर दावा कर सकता है। अगर कोई 3,000 लोगों को पंजीकृत करने के लिए 1.5 लाख रुपये खर्च करता है और लिस्ट जमा करता है, तो वह बिना किसी और चेक एंड बैलेंस के उपाध्यक्ष के तौर पर रिकमेंडेशन के लिए पात्र हो जाता है।”
खड़गे को दी गई जानकारी
सूत्रों ने कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के ऑफिस को इस झगड़े के बारे में बता दिया गया है। पार्टी के एक सीनियर सांसद ने खड़गे के सामने ‘सृजन साथियों के लिए ज़्यादा फीस’ का मुद्दा उठाया है, जिसके बारे में पता चला है कि उन्होंने हैरानी जताई है और कहा है कि वह इस मामले को देखेंगे।
एक और कांग्रेस नेता ने कहा, “जो लोग हाल ही में पार्टी में शामिल हुए हैं, उन्हें संगठन में ऊंचे पद मिल रहे हैं क्योंकि वे पैसे खर्च कर सकते हैं, जबकि जिन्होंने सालों तक काम किया है, उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।”
तारिक अनवर ने किया विरोध
बिहार के कटिहार से लोकसभा सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि वह इस कार्यक्रम के ख़िलाफ हैं क्योंकि यह पार्टी के नियमों का उल्लंघन करता है। तारिक अनवर ने कहा, “मैं इस कार्यक्रम के ख़िलाफ़ हूं। संगठन में बदलाव के नाम पर ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो इसके लायक नहीं हैं। यह इस आधार पर पद बांटने जैसा है कि कोई कितने सदस्य बना सकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम को एकतरफ़ा रूप से शुरू करने से पहले बिहार कांग्रेस के किसी भी वरिष्ठ नेता से सलाह नहीं ली गई।
50 रुपये की फ़ीस के बारे में पूछे जाने पर तारिक अनवर ने कहा, “यह पूरी तरह से गलत है और पार्टी के नियमों के ख़िलाफ़ है।” वहीं इस आलोचना का जवाब देते हुए राजेश राम ने कहा कि यह पहल AICC नेतृत्व द्वारा मंज़ूर किया गया एक पायलट प्रोजेक्ट है। उन्होंने कहा, “यह सदस्यता अभियान नहीं है। यह संगठन में सुधार की प्रक्रिया है। अगर कोई महासचिव बनना चाहता है, तो 2,000 लोग 50 रुपये देकर और बिहार कांग्रेस मोबाइल ऐप पर डिजिटल प्रक्रिया पूरी करके उस व्यक्ति का समर्थन करते हैं। इससे हमें यह पता चलता है कि किसी उम्मीदवार को कितना समर्थन हासिल है। पहले, पदाधिकारी बनने के लिए कोई ठोस पैमाना नहीं था। लोगों को दिल्ली या पटना में नेताओं की पैरवी करनी पड़ती थी। हमने उस सिस्टम को खत्म कर दिया है।”
राजेश राम ने विरोध करने वाले नेताओं पर साधा निशाना
राजेश राम ने कहा, “यह पदों की बिक्री नहीं है, बल्कि एक नया नेतृत्व तैयार करने की कोशिश है। यह एक पायलट प्रोजेक्ट है जिसे AICC की मंज़ूरी मिली है और भविष्य में इसे दूसरी जगहों पर भी लागू किया जा सकता है। यह बिहार कांग्रेस में मौजूदा डेलीगेट-आधारित सिस्टम को भी चुनौती देता है, इसीलिए कुछ नेता इसका विरोध कर रहे हैं।”
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लगता है कि बिहार कांग्रेस आलाकमान की प्राथमिकता में है ही नहीं। पिछले आठ साल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तो चार बदल गए, पर अपनी टीम कोई नहीं बना पाया। पढ़ें पूरी खबर
