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वैज्ञानिकों ने खोजा कई लाख हेक्टेयर धान की फसल को बचाने का तरीका

देश में हर साल चार करोड़ हेक्टेयर जमीन से अधिक पर धान (चावल) की खेती होती है। जिसमें से करीब 20 फीसद फसल फंगल (कवक) से संबंधित रोगों की वजह से खराब हो जाती है।

Author नई दिल्ली | December 1, 2017 2:11 AM
धान का खेत

देश में हर साल चार करोड़ हेक्टेयर जमीन से अधिक पर धान (चावल) की खेती होती है। जिसमें से करीब 20 फीसद फसल फंगल (कवक) से संबंधित रोगों की वजह से खराब हो जाती है। इस कई लाख हेक्टेयर धान की फसल को बचाने के लिए राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान (एनआइपीजीआर) के वैज्ञानिकों ने एक जीवाणु की पहचान की है। एनआइपीजीआर के 19वें स्थापना दिवस के मौके पर संस्थान के निदेशक डॉ. रमेश वी सोंटी ने यह जानकारी दी। डॉ. सोंटी के मुताबिक कवक की वजह से फसलों विशेषकर धान की फसल में कई विनाशकारी रोग हो जाते हैं। जिससे फसल की बहुत बर्बादी होती है। राइजोक्टोनिया सोलानी नामक कवक की वजह से धान की फसल में शीथ ब्लाइट रोग हो जाता है। एनआइपीजीआर के वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी झा और उनकी टीम ने कवक को खाने वाले एक जीवाणु की खोज की है। डॉ. झा के मुताबिक यह जीवाणु धान की चार-पांच दिन की पौध से प्राप्त किया गया है।

यह जीवाणु धान के पौधों को राइजोक्टोनिया सोलानी से सुरक्षा प्रदान करता है। उनकी जांच में पाया गया कि जीवाणु कवक को मारने के लिए एक विशेष प्रोटीन का स्राव करता है। इस तकनीक का डॉ. झा की टीम ने पेटेंट हासिल कर लिया है। उनके मुताबिक अभी इसका प्रयोगशाला में सफल प्रयोग किया गया है। व्यवसायिक रूप से इसका इस्तेमाल करने में अभी कुछ समय और लग सकता है। डॉ. झा ने बताया कि यह प्रोटीन न सिर्फ पौधों के कवकों का नाश करता है बल्कि मनुष्य में होने वाले कवकों को भी खत्म करता है। भविष्य में इसका उपयोग मनुष्यों में होने वाली विभिन्न बीमारियों के इलाज में भी काम आ सकता है। यह शोध हाल ही में नेचर कम्युनिकेशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

चावल के उत्पादन में फास्फोरस उर्वरक को कम करना
अधिक पैदावार के लिए भारत में फास्फोरस उर्वरकों का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। जिसका ज्यादातर हिस्सा पानी में घुल कर तालाबों के पानी को दूषित करता है। एनआइपीजीआर के वैज्ञानिक डॉ. जितेंदर गिरि और उनकी टीम ने चावल के एक जीन की पहचान की है जो धान के पौधों को एक प्रोटीन के स्राव को मजबूर करता है जो जैविक फास्फोरस का अजैविक फास्फोरस में बदल देता है। डॉ. गिरि का कहना है कि इससे फास्फोरस उर्वरक का उपयोग धीरे-धीरे कम होगा।

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