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उत्तराखंड के विकास में योगदान दें वैज्ञानिक : राज्यपाल

राज्यपाल ने बदलते पर्यावरण और बढ़ते वैश्विक तापमान से हिमालयी क्षेत्र की खेती पर पड़ने वाले प्रभाव के कारणों को खोजने पर जोर दिया।

Author देहरादून | Published on: February 26, 2016 11:21 PM
उत्तराखंड के राज्यपाल डा कृष्णकांत पाल (फाइल फोटो)

उत्तराखंड के राज्यपाल डा कृष्णकांत पाल ने शुक्रवार को भारत के कृषि वैज्ञानिकों विशेषकर गोबिंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से कहा है कि वे उत्तराखंड के लिए पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य और अनुकूल पर्वतीय कृषि के विकास में योगदान दें।

विश्वविद्यालय में पर्वतीय कृषि परिदृश्य विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन के मौके पर राज्यपाल पाल ने कहा कि पंतनगर विश्वविद्यालय को अपने ज्ञान और अनुभव का सदुपयोग करते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के कृषि उन्नयन के लिए शोध और विकास पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

राजभवन से जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक, उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों से किसानों का पलायन रोकने के लिए वहां पैदा होने वाले झंगोरा, मडुवा जैसे पौष्टिक मोटे अनाज, राजमा, भट्ट और सोयाबीन जैसी दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हरसंभव कोशिश करनी होगी। पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य उत्पादों और फलों की बाजार में अच्छी मांग का जिक्र करते हुए पाल ने कहा कि सेब, नाशपाती जैसे फलों और खुबानी जैसे सूखे मेवे आदि के साथ ही प्राकृतिक रूप से वनों से प्राप्त होने वाले काफल, अखरोट, चिलगोजा आदि फलोत्पादों के व्यावसायिक दोहन को भी प्रोत्साहित करना होगा।

उन्होंने कहा कि पहाड़ पर मसालों और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। राज्यपाल ने बदलते पर्यावरण और बढ़ते वैश्विक तापमान से हिमालयी क्षेत्र की खेती पर पड़ने वाले प्रभाव के कारणों को खोजने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे बदलते पर्यावरण का पर्वतीय कृषि पर कुप्रभाव को कम किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि टिकाऊ खेती के लिए कृषि और वनभूमि के संतुलन पर भी ध्यान देने की जरूरत है ताकि दोनों में सामंजस्य बना रहे। स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण और भंडारण इकाइयों की स्थापना पर भी बल दिया।

राज्यपाल ने पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों को परंपरागत खेती के अलावा पशुपालन, मौनपालन और बेमौसमी सब्जी आदि क्षेत्रों में काम करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ये किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई की कि विपणन और व्यापार, सब्जी और पुष्प उत्पादन, भूमि और जल संवर्धन, फसलों का सुधार और जलवायु अनुकूल फल जैसे विषयों पर चर्चा से निकलने वाले निष्कर्ष किसानों के लिए उपयोगी साबित होंगे। इस मौके पर राज्यपाल ने विश्वविद्यालय की ओर से विकसित और केंद्रीय समिति द्वारा जारी बासमती धान की नई प्रजाति पंत बासमती-1 और पंत बासमती-2 के पांच जनक वैज्ञानिकों को भी सम्मानित किया।

इसमें डा. सुरेन्द्र सिंह, डा. इंद्रदेव पांडेय, डा. एमके नौटियाल, डा. एमके कर्णवाल, डा. डीसी बसखेती और उनके दो सहायक जैनेन्द्र प्रसाद और श्रवण कुमार शामिल थे।

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