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उपराज्यपाल को दिल्ली का मुखिया बताने के फैसले पर रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

अरविंद केजरीवाल नीत आप सरकार को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया...

Author नई दिल्ली | September 10, 2016 3:40 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

अरविंद केजरीवाल नीत आप सरकार को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उपराज्यपाल प्रशासनिक प्रमुख हैं जिनकी सभी प्रशासनिक फैसलों के लिए पूर्व रजामंदी की जरूरत है। हाई कोर्ट के चार अगस्त के फैसले के खिलाफ आप सरकार की सात अपीलों पर केंद्र से छह हफ्तों में जवाब मांगते हुए शीर्ष अदालत ने उपराज्यपाल नजीब जंग के उस हालिया फैसले पर भी रोक से इनकार किया जिसमें दिल्ली सरकार के पिछले आदेशों व 400 से अधिक फाइलों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था।

सरकारी फाइलों की जांच के उपराज्यपाल के हालिया फैसले का जिक्र होने पर न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एनवी रमण के पीठ ने कहा- हर दिन कुछ आदेश दिए जाएंगे, हम प्रतिदिन के आधार पर आदेश नहीं दे सकते। पीठ ने कहा कि कोई रोक नहीं। हम इन मामलों में अंतिम सुनवाई के लिए 15 नवंबर की तारीख तय करते हैं। पीठ ने साथ ही अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी की इन शुरुआती आपत्तियों पर सहमति नहीं जताई कि कई आधारों पर अपीलों को खारिज किया जाना चाहिए। इसमें से एक आधार यह है कि मुख्य सचिव या सचिव की जगह याचिकाओं का अनुमोदन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के हलफनामे द्वारा किया गया।

रोहतगी ने कहा कि यह कामकाज के नियमों के खिलाफ है। हाई कोर्ट में हलफनामा सचिव की शपथ पर सौंपा गया, लेकिन यहां इसमें उपमुख्यमंत्री की शपथ है। केवल इसलिए कि आप उपमुख्यमंत्री हैं, आप नियम नहीं तोड़ सकते। एनसीटी द्वारा दायर एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) पर विचार कैसे हो सकता है? एक मंत्री केंद्र शासित प्रदेश का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है। अगर यह मान भी लें कि वे हलफनामे में शपथ लेने के लिए सक्षम हैं, एसएलपी दायर करने पर उपराज्यपाल द्वारा फैसला किया जाना चाहिए।
हालांकि अदालत ने कहा कि यह महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, जहां शीर्ष अदालत के फैसले की जरूरत है। रोहतगी ने कहा कि नौ जजों का पीठ स्पष्ट रूप से कह चुका है कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है। पीठ ने संकेत दिए कि वह दलीलें सुनने के बाद इस मामले को बड़े पीठ के पास भेज सकता है। दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल ने कहा कि केंद्र और उपराज्यपाल के बीच स्वामी और सेवक का संबंध है। उन्होंने निर्वाचित सरकार के हाथ बांध दिए हैं और याचिका पर हस्ताक्षर से लोक सेवकों के इनकार ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां मंत्री को शपथपत्र में शपथ लेनी पड़ी।

दलीलें शुरू करते हुए वेणुगोपाल ने कहा कि पूरा मामला यह है कि अपील दायर करने के लिए उपराज्यपाल की अनुमति जरूरी है क्योंकि कोई अधिकारी हस्ताक्षर करना नहीं चाहता। उन्होंने कहा कि इसका भविष्य की सभी सरकारों पर प्रभाव पड़ेगा। भविष्य के सभी संबंध सीधे प्रभावित होंगे। उपराज्यपाल के पास दिल्ली पर शासन करने की कोई योग्यता नहीं है। उनका स्वामी और सेवक का संबंध है। वे केवल केंद्र के कर्मचारी हैं और किसी भी क्षण केंद्र द्वारा पद छोड़ने के लिए कहा जा सकता है। हाई कोर्ट के फैसले का परिणाम यह है कि केंद्र ने उपराज्यपाल के जरिए शासन का जिम्मा संभाला है और निर्वाचित सरकार को कुछ अंतरिम बंदोबस्त बनाकर छोड़ा है।

सुनवाई के दौरान रोहतगी ने कहा कि दिल्ली राज्य है या केंद्र शासित प्रदेश, नौ जजों के पीठ का फैसला इस बारे में स्थिति स्पष्ट कर चुका है। अगर मामले बड़े पीठ को भेजे जाएंगे तो इसे सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों के पीठ द्वारा सुना जाएगा। उन्होंने कहा कि 1996 में एनडीएमसी बनाम पंजाब प्रदेश मामले में अदालत के नौ जजों के पीठ ने दिल्ली को कर उद्देश्यों के लिए केंद्र शासित प्रदेश बताया था। इससे पहले दिल्ली सरकार ने अपीलों की जल्द सुनवाई की मांग की थी, जिसके बाद इन पर शुक्रवार को सुनवाई हुई।

दिल्ली सरकार ने दो सितंबर को सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए उसने छह भिन्न याचिकाएं दायर की हैं और राष्ट्रीय राजधानी को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर जो दीवानी मुकदमा दायर किया था उसे वापस ले लिया है। अदालत ने आप सरकार को दीवानी मुकदमा वापस लेने की इजाजत दे दी थी। साथ ही इसमें शामिल मुद्दों को विशेष अनुमति याचिकाओं में उठाने की मंजूरी भी दे दी थी। हाई कोर्ट ने चार अगस्त को अपने फैसले में कहा था कि दिल्ली से संबंधित विशेष संवैधानिक नियम के अनुच्छेद 239 ए के कारण केंद्र शासित प्रदेश से संबंधित अनुच्छेद 239 का प्रभाव कम नहीं होगा इसलिए प्रशासनिक मामलों में उप राज्यपाल की मंजूरी अनिवार्य है।

आप ने कहा, फैसले से झटका नहीं

उपराज्यपाल की शक्तियों पर दिल्ली हाई कोर्ट के चार अगस्त के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाने से मना करने पर आम आदमी पार्टी ने साहस का परिचय देते हुए कहा कि इसे झटका नहीं माना जाना चाहिए और पार्टी की न्यायपालिका में पूरी आस्था है। आप के दिल्ली संयोजक दिलीप पांडेय ने कहा- इसे झटका बताना गलत होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे की उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
’शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उपराज्यपाल प्रशासनिक प्रमुख हैं। उनकी सभी प्रशासनिक फैसलों के लिए पूर्व रजामंदी की जरूरत है। ’सुप्रीम कोर्ट ने नजीब जंग के उस हालिया फैसले पर भी रोक से इनकार किया जिसमें दिल्ली सरकार के पिछले आदेशों व 400 से अधिक फाइलों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था।

सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है और यह भी कहा है कि वह वृहद पीठ को याचिका भेजने पर भी विचार कर सकता है। पार्टी की न्यायिक कार्यवाही में पूरी आस्था है। दिल्ली सरकार ने हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ छह अपील दायर की है जिसमें उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी का प्रशासनिक प्रमुख नियुक्त किया गया था। अदालत ने इन पर केंद्र से शुक्रवार को जवाब मांगा। हालांकि शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के चार अगस्त के फैसले के लागू होने पर रोक लगाने से मना कर दिया और कहा कि इसकी बजाय वह 15 नवंबर को मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगी। पीठ ने कहा कि वह दलीलों को सुनने के बाद वृहद पीठ को याचिकाएं भेजने पर विचार कर सकता है।

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