Save the Children With the Use of Mobile-Laptops - बच्चों को बचाएं मोबाइल-लैपटॉप के ज्यादा इस्तेमाल से - Jansatta
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बच्चों को बचाएं मोबाइल-लैपटॉप के ज्यादा इस्तेमाल से

तकनीक का सही और गलत इस्तेमाल बच्चों को बताना चाहिए। अगर अभिभावक बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप जैसे गैजेट्स का इस्तेमाल करके पढ़ाते भी हैं तो उन्हें 20 से 30 मिनट तक ही स्क्रीन का सहारा लेना चाहिए। डॉक्टर हेमेंद्र शर्मा ने बताया कि बच्चों को सवा से एक फुट की दूरी की स्क्रीन पर काम करना चाहिए और एलुमनेशन भी कम रखना चाहिए।

Author February 14, 2018 6:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मीना

डॉक्टर राजेश सागर के मुताबिकबड़ों से ही बच्चे सीखते हैं। अगर वे गैजेट पर ज्यादा वक्त बिता रहे हैं तो यह माता-पिता की गलती है। उन्हें बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे मैदान में खेलें, न कि स्क्रीन पर। कई बार अभिभावक रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल जैसे गैजेट दे देते हैं, उन्हें लगता है कि इससे बच्चा चुप हो जाएगा, लेकिन माता-पिता को ऐसा न करके बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए। तकनीक का सही और गलत इस्तेमाल बच्चों को बताना चाहिए। अगर अभिभावक बच्चे को मोबाइल या लैपटॉप जैसे गैजेट्स का इस्तेमाल करके पढ़ाते भी हैं तो उन्हें 20 से 30 मिनट तक ही स्क्रीन का सहारा लेना चाहिए। डॉक्टर हेमेंद्र शर्मा ने बताया कि बच्चों को सवा से एक फुट की दूरी की स्क्रीन पर काम करना चाहिए और एलुमनेशन भी कम रखना चाहिए। अगर बच्चे 20 से 30 मिनट से ज्यादा समय स्क्रीन के सामने बिताते हैं तो उन्हें कई समस्याएं हो सकती हैं।

दो साल के योगांश ने रो-रो कर पूरा घर सिर पर उठा रखा था, लेकिन जैसे ही उसके सामने ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ का वीडियो आया वह तुरंत खुश हो गया। योगांश की मां लक्ष्मी कहती हैं कि ये जब भी रोता है तो मोबाइल से ही चुप होता है। लक्ष्मी गृहिणी हैं और घर में काम करने के दौरान वह योगांश को मोबाइल दे देती हैं। वह कहती हैं कि मुझे मालूम है कि बच्चों को मोबाइल नहीं देना चाहिए लेकिन मेरे पास इसे चुप कराने का कोई और रास्ता नहीं है।
हाल ही में आए एक निजी कंपनी के सर्वे के मुताबिक भारत में लगातार नौनिहाल द्वारा मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। भारत में 30 फीसद बच्चे प्रतिदिन छह घंटे स्क्रीन देखने में समय बिताते हैं। शोध में यह भी सामने आया कि 57 फीसद अभिभावक बच्चों की कमजोर दृष्टि से परेशान हैं।
टेक्नोलॉजी अपार्टमेंट की निवासी अनीता सात साल की बेटी तनुष्का से परेशान हैं। तनुष्का जब भी खाना खाती है तब वह यू-ट्यूब पर कार्टून देखने लग जाती है। अनीता उसे जबरन खाना खिलाती हैं। वे कहती हैं कि तनुष्का स्कूल से आते ही सीधे मोबाइल पकड़ती है। उसे खाना खिलाना मुश्किल हो जाता है।
गुस्सा और आंखों पर बढ़ता दबाव

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मनोवैज्ञानिक डॉक्टर राजेश सागर ने बताया कि आजकल के बच्चे अधिकतर समय गैजेट्स के साथ बिताते हैं, जिससे उनके मानसिक स्तर पर असर पड़ता है। बच्चों में चिड़चिड़ापन और भूख व नींद की कमी जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। अगर बच्चे शारीरिक मेहनत नहीं करेंगे तो फिर उन्हें मोटापा घेर सकता है। पांच साल की पीहू नर्सरी में पढ़ती है और निगाह कमजोर होने से चश्मा लगाती है। पीहू की मां अलका का कहना है कि जब वह दो साल की थी तभी से मोबाइल के साथ खेलती थी। मैं घर के काम में लगी रहती थी और इसे बहलाने के लिए मोबाइल दे देती थी और अब इसकी आंखें कमजोर हो गई हैं। हमें इसका दुख है। पीहू बताती है कि वह मोबाइल का लॉक खोलना, फोटो खींचना व फोन करने जैसे काम कर लेती है। पीहू की मां मेकअप आर्टिस्ट हैं, जिससे वे उसे ज्यादा समय नहीं दे पाती हैं और जब भी वह काम से वापस आती हैं तब पीहू सबसे पहले मोबाइल लेती है।

नेत्र विशेषज्ञ हेमेंद्र शर्मा ने बताया कि बच्चे अगर छोटी स्क्रीन पर बहुत देर तक काम करते हैं तो उनकी आंखों पर दबाव पड़ता है। बच्चे लगातार स्क्रीन पर देखते रहते हैं जिससे उनकी आंखों में सूखापन हो जाता है क्योंकि वे पलकें नहीं झपकाते हैं। कई बार यह सूखापन स्थायी बन जाता है। दूसरा इससे सिरदर्द की समस्या भी हो जाती है। अगर बच्चा एक ही अवस्था में बैठता है तो उसका शारीरिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। उन्होंने बताया कि हमारे पास कुछ साल पहले 3 से 5 साल के बच्चों के अभिभावक उनकी आंखों की समस्या लेकर आते थे, लेकिन अब यह उम्र घटकर लगभग 10 से 12 महीने हो गई है।

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