पश्चिम बंगाल बीजेपी के नेता सौमित्र खान ने दावा किया है कि टीएमसी के करीब 20 सांसद ‘भगवा कैंप’ के संपर्क में हैं और बीजेपी नेतृत्व से सहमति मिलने पर वह पार्टी बदल सकते हैं। हालांकि टीएमसी की तरफ से उनके इस दावे को ‘फर्जी’ करार दिया गया है।
पश्चिम बंगाल के 42 लोकसभा सांसदों में से 29 टीएमसी से हैं जबकि बीजेपी के 12 हैं। इसके अलावा एक सांसद कांग्रेस पार्टी का है।
तीन बार के लोकसभा सांसद सौमित्र खान ने मंगलवार को मीडिया से कहा, “टीएमसी के 20 सांसद हमार संपर्क में हैं। अगर पार्टी नेतृत्व चाहेगा तो वे पाला बदलने के लिए तैयार है। अगर बीजेपी चाहेगी तो पूरी टीएमसी अगले कुछ दिनों में खत्म हो जाएगी।”
क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून?
दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार, अयोग्यता से बचने के लिए किसी भी संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों को एक साथ दल बदलना जरूरी है। इस समय टीएमसी के कुल 29 लोकसभा सांसद हैं। ऐसे में अगर टीएमसी के 19-20 से कम सांसद पाला बदलते हैं तो उनकी लोकसभा सदस्यता जाने की पूरी संभावना है।
सौगत राय बोले- ऐसा कुछ नहीं होगा
सौमित्र खान के दावे को फर्जी करार देते हुए टीएमसी के सांसद सौगत राय ने कहा कि BJP पत्रकारों को जो कुछ भी बता रही है, वह पूरी तरह से मनगढ़ंत है। ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।
चुनाव परिणाम बाद खुलकर सामने आई टीएमसी की फूट
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद से ही टीएमसी से खुलकर ‘विरोध’ के सुर सामने आ रहे हैं। द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कम से कम 18 बड़े नेता (सांसद, विधायक और पूर्वी मंत्री शामिल) सार्वजनिक तौर पर टीएमसी के काम करने के तरीके की आलोचना कर चुके हैं। इनके पीछे टीएमसी के दर्जनों प्रवक्ता, 100 से ज्यादा पार्षद और अनगिनत पंचायत अधिकारी खड़े हैं।
रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि मुस्लिम बहुल्य माल्दा और मुर्शिदाबाद के सात विधायक कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक दे चुके हैं। इसके अलावा टीएमसी के दो सांसद सीधे तौर पर राहुल गांधी को अप्रोच कर चुके हैं।
इसके अलावा सूत्रों का यह भी दावा है कि बारासत की टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार पहले ही पार्टी में पद छोड़ चुकी हैं। इसके अलावा उलुबेरिया पुरबा के रीताब्रत बनर्जी, एंटली के संदीपन साहा और बेलेघाटा के कुणाल घोष की गतिविधियां भी संदेह पैदा करते हैं।
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टीएमसी के 91 पार्षदों ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसे पार्टी के लिए संगठनात्मक तौर पर एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
