अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के लिए खास रहा बीता साल - Jansatta
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अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा के लिए खास रहा बीता साल

कुल 25 उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ जहां बीता साल इसरो के लिए व्यस्तता भरा रहा, वहीं परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जापान के साथ परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर के अलावा असैन्य जिम्मेदारी समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई..

Author नई दिल्ली | January 1, 2016 9:08 PM
इसरो इस मई में एक ऐसा स्पेश शटल लॉन्च कर सकता है जो पूरी तरह मेड-इन-इंडिया होगा। (representative photo)

कुल 25 उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ जहां बीता साल इसरो के लिए व्यस्तता भरा रहा, वहीं परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में जापान के साथ परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर के अलावा असैन्य जिम्मेदारी समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई। ये मुद्दे ऐसे थे, जो कि इस क्षेत्र के विकास को अवरुद्ध कर रहे थे। इस साल दो नए सचिवों ने पदभार भी संभाला। ये सचिव थे, परमाणु ऊर्जा विभाग के शेखर बसु और अंतरिक्ष विभाग के ए एस किरण कुमार। इसरो के उपग्रहों में दो संचार उपग्रह- जीसैट 6 और जीसैट 7 थे। इसके अलावा इसरो के उपग्रहों में इआरएनएसएस-1 डी शामिल था, जो कि भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली के अंतरिक्षीय खंड के सात उपग्रहों में से चौथा उपग्रह था। इस वर्ग के तीन उपग्रहों- आइआरएनएसएस-1 ए, 1 बी और 1 सी को पहले सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया था। भारत ने अपनी पहली अंतरिक्ष अनुसंधान वेधशाला एस्ट्रोसैट उपग्रह का भी प्रक्षेपण किया। अंतरिक्ष वेधशाला भारत के अलावा सिर्फ अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ और जापान के ही पास है।

बीते साल इसरो द्वारा विदेशी उपग्रहों के प्रक्षेपण में हासिल की गई सफलता सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। बीते साल भारत की अंतरिक्ष संस्था ने सिंगापुर के छह, अमेरिका के चार, ब्रिटेन के पांच, कनाडा का एक और इंडोनेशिया का एक उपग्रह प्रक्षेपित किया। इसके साथ ही इसरो के लिए एक नए युग का भी उदय हो गया। भारत को वर्ष 1973 और 1997 में परमाणु परीक्षण करने के बाद से अमेरिका की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था, जिसके कारण इसका अंतरिक्ष कार्यक्रम बाधित हुआ था।

भारत के पहले अंतरग्रही अभियान मंगलयान की सफलता समेत विभिन्न कार्यों के लिए इसरो को गांधी शांति पुरस्कार और अमेरिका की नेशनल स्पेस सोसाइटी की ओर से स्पेस पायनियर अवॉर्ड दिया गया। हालांकि बीते साल इसरो विवादों के घेरे में भी आया। सितंबर में एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने एंट्रिक्स की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स से विवादास्पद एंट्रिक्स-देवास मामले में 67.2 करोड़ डॉलर का भुगतान देवास को करने के लिए कहा।

करार किए जाने के तरीके और इसके क्रियान्वयन के तरीकों के बारे में कई शिकायतें आई थीं। वर्ष 2011 में केंद्र ने एंट्रिक्स कॉरपोरेशन और बंगलुर आधारित देवास मल्टीमीडिया के बीच के विवादास्पद करार को खत्म कर दिया था। दूसरी ओर परमाणु क्षेत्र में लंबित पड़े हुए कई बड़े मुद्दों का हल निकल आया। वर्ष 2015 में गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा से पहले भारत ने घरेलू और विदेशी पक्षकारों की असैन्य परमाणु क्षति जिम्मेदारी कानून 2010 से जुड़ी चिंताओं पर गौर किया था। इसके बाद एक परमाणु बीमा पूल बनाया गया और इसका संचालन शुरू किया गया।

संसद के शीत सत्र में परमाणु ऊर्जा कानून 1962 में संशोधन पारित किया गया, जिसके बाद एनपीसीआइएल अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (पीएसयू) के साथ संयुक्त उपक्रम में शामिल हो सकती है। इससे भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन को विस्तार मिलेगा। इस क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं कई लंबित मुद्दों को आगे बढ़ाने की दिशा में सक्रियता दिखाई। इनमें से एक मामला जापान के साथ परमाणु सहयोग समझौता करने के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करना शामिल था।

मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने अरेवा और एनपीसीआइएल के बीच एक पूर्व-अभियांत्रिकी समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य जैतापुर परमाणु बिजली संयंत्र को रफ्तार देना है। श्रीलंका के साथ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए एक असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए। इससे परमाणु तकनीक जैसे क्षेत्रों में दक्षेस देश के मदद का मार्ग खुल गया है। भारत ने पश्चिम बंगाल के हरिपुर के स्थान पर रूस को रिएक्टर बनाने का स्थान आंध्रप्रदेश में मुहैया कराकर इस मुद्दे को सुलझा लिया है। हरिपुर में स्थानीय लोगों के विरोध के चलते यह कदम उठाया गया। कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र की पांच और छह इकाई के निर्माण के लिए भी भारत और रूस के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए गए ।

यूरेनियम को लेकर भारत की चिंताओं पर भी पर्याप्त गौर किया गया। वर्ष 2015 में परमाणु ऊर्जा विभाग ने परमाणु ईंधन का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर दर्ज किया। एक बड़ी सफलता के तौर पर ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को 13 नवंबर को क्रियांवित किया गया। कनाडा, कजाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया से ईंधन आपूर्ति के प्रबंध भारत में परमाणु शक्ति के प्रसार में मदद करके ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देंगे। भारत को कनाडा से यूरेनियम की पहली खेप प्राप्त हो चुकी है जबकि ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम के निर्माण के प्रयास जारी हैं। हालांकि परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत आने वाले सार्वजनिक उपक्रम यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को अनिवार्य मंजूरियों के अभाव में बंद कर दिया गया।

अंतरिक्ष क्षेत्र में, तय उपग्रहों के प्रक्षेपण के अलावा, इसरो यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा घोषित और पड़ोसी देशों को उपहार स्वरूप दिए जाने वाले दक्षेस उपग्रह को दिसंबर 2016 में प्रक्षेपित कर दिया जाए। भारत को इस परियोजना के लिए अभी पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों से अधिकार पत्र लेना है।

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